Monday, September 11, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श-21 बौद्ध,वैष्णव,बाउल फकीर सूफी आंदोलन की जमीन ही रवींद्र की रचनाधर्मिता और यही लालन फकीर का उन पर सबसे गहरा असर। গীতাঞ্জলির গীতধারায় লালনের দর্শনের বা লালন কালামের পরিশীলিত রচনার ধারাবাহিকতা। कादंबरी की आत्महत्या ने रवींद्र को स्त्री अस्मिता का सबसे बड़ा प्रवक्ता बनाया और क्रूर जमींदार सामंत के पुत्र रवींद्र किसानों, मेहनतकशों, शूद्रों, अछूतों, आदिवासियों, मुसलमानों के हकहकूक के हक में खड़े हो गये। नरसंहार संस्कृति का धर्म और राष्ट्रवाद दोनों कृषि और किसानों के खिलाफ,बोलियों,भाषाओं और संस्कृतियों की साझा विरासत के खिलाफ है। बदनाम हिंदी पट्टी की तुलना में दूसरे गैरहिंदी प्रदेशों में धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का तांडव,सामाजिक बदलाव की जमीन गायपट्टी में ही प्रतिरोध निरंकुश फासीवाद का प्रतिरोध संभव है। मुक्बाजार में धर्म भी एक अंतहीन पाखंड है जो जाति, वर्ण ,नस्ल के आधार पर वर्ग वर्ण वर्चस्व सुनिश्चित करता है और इसीलिए कारपोरेट एकाधिकार के मुक्तबाजार में धर्मोन्माद का यह नंगा कत्लेआम कार्निवाल है,जिसे राष्ट्रवाद कहा जा रहा है। यह आस्था का नहीं,राजनीति का मामला है,सत्ता समीकरण का मामला है।यही जनसंहार संस्कृति का जायनी तंत्र है तो मनुस्मृति विधान भी। दूध घी की नदियां इसीलिए अब खून की नदियों में तब्दील हैं। पलाश विश्वास

रवींद्र का दलित विमर्श-21
बौद्ध,वैष्णव,बाउल फकीर सूफी आंदोलन की जमीन ही रवींद्र की रचनाधर्मिता और यही लालन फकीर का उन पर सबसे गहरा असर।
গীতাঞ্জলির গীতধারায় লালনের দর্শনের বা লালন কালামের পরিশীলিত রচনার ধারাবাহিকতা।
कादंबरी की आत्महत्या ने रवींद्र को स्त्री अस्मिता का सबसे बड़ा प्रवक्ता बनाया और क्रूर जमींदार सामंत के पुत्र रवींद्र किसानों, मेहनतकशों, शूद्रों, अछूतों, आदिवासियों, मुसलमानों  के हकहकूक के हक में खड़े हो गये।
नरसंहार संस्कृति का धर्म और राष्ट्रवाद दोनों कृषि और किसानों के खिलाफ,बोलियों,भाषाओं और संस्कृतियों की साझा विरासत के खिलाफ है।
बदनाम हिंदी पट्टी की तुलना में दूसरे गैरहिंदी प्रदेशों में धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का तांडव,सामाजिक बदलाव की जमीन गायपट्टी में ही प्रतिरोध निरंकुश फासीवाद का प्रतिरोध संभव है।
मुक्बाजार में धर्म भी एक अंतहीन पाखंड है जो जाति, वर्ण ,नस्ल के आधार पर वर्ग वर्ण वर्चस्व सुनिश्चित करता है और इसीलिए कारपोरेट एकाधिकार के मुक्तबाजार में धर्मोन्माद का यह नंगा कत्लेआम कार्निवाल है,जिसे राष्ट्रवाद कहा जा रहा है।
यह आस्था का नहीं,राजनीति का मामला है,सत्ता समीकरण का मामला है।यही जनसंहार संस्कृति का जायनी तंत्र है तो मनुस्मृति विधान भी।
दूध घी की नदियां इसीलिए अब खून की नदियों में तब्दील हैं।

पलाश विश्वास
पांच अक्तूबर को मैं नई दिल्ली रवाना हो रहा हूं और वहां से गांव बसंतीपुर पहुंचना है।आगे क्या होगा,कह नहीं सकते।कोलकाता में बने रहना मुश्किल हो गया है और कोलकाता छोड़ना उससे मुश्किल तो गांव लौटना शायद सबसे ज्यादा मुश्किल। मैंने जिंदगी से लिखने पढ़ने की आजादी के सिवाय कुछ नहीं मांगा और गांव के घर से अलग कहीं और घर बसाने की नहीं सोची।इसलिए आगे लिखना हो सकेगा कि नहीं,कह नहीं सकते।होगा तो भी एक बड़ा अंतराल चाहिए फिर दोबारा खड़े होने के लिए।किखने पढ़ने का नया ठिकाना जुगाड़ना सबसे जरुरी है।वैसे भी जनता के हकहकूक के हम में खड़े होकर लिखने पढ़ने की आजादी अब खतरे में हैं तो लिख पढ़कर गुजारा करने के मौके नहीं के बराबर है।बाजार से जुड़ना हमारी सेहत के मुताबिक नहीं है और बिना बाजार से जुड़े जिंदा रहने की भी आजादी नहीं है।
इसलिए रवींद्र दलित विमर्श लगातार जारी रखने की मजबूरी है।
हिंदी के पाठकों को कितना पहुंच पा रहा है यह विमर्श,हम नहीं जानते।लेकिन हिंदी वालों को खुशी होगी कि बांग्लादेश में हस्तक्षेप पर हिंदी में जारी यह रवींद्र मविमर्स बांग्लादेश में खूब पढ़ा और शेयर किया जा रहा है।
कोई अंतराल की गुंजाइश नहीं है।जितना समेट सकते हैं,समेटने की कोशिश करेंगे।पाठकों को इस बमबारी से तकलीफ हो रही होगी,हम समझते हैं।लेकिन यह तय है कि कुछ समय की बात है और फिर हमारे मोर्चे पर लंबा सन्नाटा होना है।तब तक झेलते रहें।
लालन फकीर और रवींद्र की चर्चा के मध्य हमने किसान आंदोलनों पर चर्चा की है क्योंकि साहित्य और संस्कृति का मूल आधार मनुष्य और प्रकृति के अंतर्संबंध हैं और यही धर्म कर्म का आधार भी है।
सभ्यता और मनुष्यता का विकास दुनियाभर में कृषि से हुई।
खानाबदोश कबाइली सभ्यता से पशुपालन और खेती के बाद सत्रहवीं सदी से औद्योगीकरण का सिलसिला शुरु हुआ।उत्पादन संबंधों की बुनियाद पर मनुष्य सामाजिक प्राणी बना तो कृषि आजीविकाओं और कृषि की वजह से।
औद्योगीकरण ने उस कृषि व्यवस्था को तहस नहस कर दिया है और उत्पादन संबंधों का ताना बाना सिरे से उलझ गया है।
पूंजी और मुनाफा की अर्थव्यवस्था में शहरीकरण के मार्फत जो नई सभ्यता का जन्म हुआ,उसकी जड़ें पश्चिम में हैं।
भारत ही नहीं समूची एशिया और अफ्रीका की सभ्यता का इतिहास किसानों का इतिहास है।जिसे विद्वतजनों का कुलीन तबका सिरे से नजरअंदाज कर रहा है।
विज्ञान और तकनीक से औद्योगीकरण तेज हुआ।
बाजार का विस्तार हुआ और शहरीकरण हुआ।
पूंजीवादी व्यवस्था साम्राज्यवादी व्यवस्था में बदल गयी है।
कृषि व्यवस्था का देश और पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था के राष्ट्र में बहुत अंतर है।देश जनपदों से बनता है और जनपद किसानों से बनता है।राष्ट्र जनपदों और किसानों के सफाये का तंत्र है।
देशभक्ति अपनी जमीन से जुड़ी मनुष्यता की चेतना है तो राष्ट्रवाद अंध नस्ली वर्चस्व है जो पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के साथ साथ सामंती वर्ग वर्ण वर्चस्व को मजबूत करता है।यही सभ्यता का संकट है।
अंधाधुध शहरीकरण और पूंजीवादी औद्योगीकीकरण अब आधार नंबर और आटोमेशन से लेकर रोबोटिक्स के दौर में है और इस उ्त्पादन प्रणाली में मनुष्य की कोई भूमिका नहीं है।
इस कारपोरेट मुक्तबाजार में मनुष्य कृषि व्यवस्था की तरह न उत्पादक है और न सामाजिक है।वह उपभोक्ता मात्र है और मनुष्यता के आदर्शों और मूल्यों का कोई मायने उसके लिए नहीं है।मनुष्यविरोधी प्रकृतिविरोधी नरसंहार संस्कृति है यह। नरसंहार संस्कृति का धर्म और राष्ट्रवाद दोनों कृषि और किसानों के खिलाफ,बोलियों,भाषाओं और संस्कृतियों की साझा विरासत के खिलाफ है।
मुक्बाजार में धर्म भी एक अंतहीन पाखंड है जो जाति,वर्ण,नस्ल के आधार पर वर्ग वर्ण वर्चस्व सुनिश्चित करता है और इसीलिए कारपोरेट एकाधिकार के मुक्तबाजार में धर्मोन्माद का यह नंगा कत्लेआम कार्निवाल है,जिसे राष्ट्रवाद कहा जा रहा है।यह आस्था का नहीं,राजनीति का माला ,सत्ता समीकरण का मामला है।यही जनसंहार संस्कृति का जायनी तंत्र है  तो मनुस्मृति विधान भी।
रवींद्र नाथ जमींदार थे।उनके पिता की विरासत की वजह से रवींद्रनाथ जमींदार बने।उनके पिता महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर ब्रहमसमाजी थे तो स्वभाव चरित्र से भद्रलोक बिरादरी से बाहर एक सामंती जमींदार भी थे।टैगोर की रचनाधर्मिता उनके बचपन से इस सामंती शिकंजे को तोड़ते हुए बनी।
जोड़ासांकू के ठैगोर परिवार में बच्चों की कोई आजादी नहीं थी और स्त्रियों की भी कोई आजादी नहीं थी।
ज्योतिंद्र नाथ टैगोर की पत्नी कादंबरी देवी ने आत्महत्या की तो इस मामले को रफा दफा करने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया गया।
इस प्रकरण का पर्दाफाश रवींद्र ने ही किया और कादंबरी देवी की उस मृत्यु ने रवींद्रनाथ को स्त्री स्वतंत्रता का सबसे बड़ा प्रवक्ता बना दिया।
नष्टनीड़ उपन्यास और उस पर बनी सत्यजीत रे की फिल्म चारुलता कादंबरी देवी की कुचल दी गयी स्त्री अस्मिता को नये सिरे से रवींद्र ने रचा तो आंख की किरकिरी,चोखेर बाली की विनोदिनी सामंती समाज के खिलाफ स्त्री अस्मिता का महाविस्फोट है।
महर्षि देवेंद्रनाथ क्रूर जमींदार थे।
पूर्वी बंगाल के ग्रामीण पत्रकार कंगाल हरनाथ ने जमींदार देवेंद्र नाथ टैगोर के खिलाफ अपनी पत्रिका में लगातार लिखा तो उनका भयानक उत्पीड़न हुआ।
प्रजाजनों पर अत्याचार करने के मामले में देवेंद्र नाथ टैगोर निरंकुश थे।यहीं नहीं,रवींद्र नाथ के दादा प्रिंस द्वारकानाथ टैगोर कोलकाता के फोर्ट विलियम के ठेके और शेयरबाजर से ही बड़े उद्योगपति नहीं बने,वे पश्चिमी देशों में काले गुलामों का निर्यात भी करते थे। असम के चायबागानों और पूर्वी बंगाल में आदिवासी मजदूरों को सप्लाई करना भी उनका धंधा था।
इस जमींदारी पृष्ठभूमि के जमींदार रवींद्रनाथ के किसानों और मेहनतकश तबके के हक हकूक के हक में खुलकर खड़े होने की रचनाधर्मिता में बंगाल के बाउल फकीरों के किसान आंदोलन और बंगाल के किसान समाज से जुड़ी उनकी रचनाधर्मिता की निर्णायक भूमिका रही है।
रवींद्र के मानस को सामंती जमींदारी पृष्ठभूमि से मुक्त करने में बौद्ध साहित्य,संत साहित्य और बाउलों का सबसे बड़ा योगदान है।
इसीकी परिणति गीताजंलि है।
कृषि आधारित उत्पादन संबंधों की साझा लोकसंस्कृति में विकसित उनकी रचनाधर्मिता का मुख्य स्वर सामाजिक न्याय और समानता है तो इसके लिए लालन फकीर और बंगाल की सूफी संत परंपरा और उनके आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है।किसान समाज पर सामंती शिकंजे की दैवी सत्ता और राजसत्ता और फासिस्ट नस्ली राष्ट्रवाद के विरुद्ध उनकी रचनाधर्मिता का आध्यात्म किसानों के सामुदायिक जीवन और उनकी जीवन यंत्रणा पर आधारित है,जिसे भारत में किसान आंदोलनों के इतिहास में साधू संतों पीरों फकीरों बाउलों की निर्णायक भूमिका को समझे बिना समझना मुश्किल है।
रवींद्र का यह आध्यात्म चार्बाक दर्शन से लेकर शहीदे आजम भगतसिंह की नास्तिकता में एकाकार है।
हिंदी पाठकों के सामने समूचा संत साहित्य है।यह समूचा साहित्य जनपदों की पृष्ठभूमि में भारत के किसान समाज को संबोधित बोलियों में लिखा गया साहित्य है जिसमें मीरा बाई का जीवन और साहित्य भारतीय स्त्री अस्मिता को लोक विमर्श है तो कबीरदास सूरदास रहीमदास रसखान तुकाराम नामदेव और गुरुनानक का सारा साहित्य उस सामंती दैवी सत्ता के खिलाफ जो जनपदों और किसान समाज के दमन उत्पीड़न पर बनी है और इस साहित्य में नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व के विरुद्ध न्याय और समानता का वह लोकतंत्र है जो शहरीकरण औद्योगीकीरण के आधुनिक साहित्य में सिरे से अनुपस्थित है।
संत कबीर का प्रतिरोध हो या सूफी संतों का प्रतिरोध,सत्ता की राजनीति सामाजिक शक्तियों के सामने टिक ही नहीं सकी।
आज अगर प्रतिरोध का साहित्य रचा नहीं जाता तो इसका सबसे बड़ा कारण है कि साहित्य और संस्कृति की जड़ें जनपदों से कट चुकी हैं और सामाजिक शक्तियों के एकाधिकार नस्ली वर्चस्व के निरंकुश फासिस्ट सैन्यतंत्र में खत्म होते जाना है।
किसान के साहित्य और संस्कृति से बाहर होना उत्पादन प्रणाली के कायाकल्प की कथा है और इस उत्पादन प्रणाली या राष्ट्र के विकास दर में कृषि और किसानों की कोई भूमिका न होना है।
कबीरदास ने जिस दो टुकभाषा में मूर्ति पूजा,पंडित पुरोहित मौलवी मुल्ला,पोथी पुराण,धर्मस्थल,तीर्थ,कर्मकांड,मंदिर मस्जिद और धर्म जाति अस्मिताओं का विरोध किया है,आज आजाद भारत में दाभोलकर,पनसारे कुलबर्गी,रोहित वेमुला और गौरी लंकेश की हत्या की पृष्ठभूमि में उसकी कल्पना करना असंभव है।
इनमें गौरी लंकेश लिंगायत थीं और कन्नड़ के जिन 25 साहित्यकारों के लिए सुरक्षा इंतजाम करना पड़ रहा है,वे सभी अनार्य द्रविड़ है तो उनमें भी अनेक लिंगायत आंदोलन से जुड़े हैं।
कर्नाटक में ब्राह्मण तंत्र के खिलाफ लिंगायत आंदोलन का व्यापक असर रहा है और कर्नाटक में जीवन के सभी क्षेत्रों में लिंगायत वर्चस्व है।इसके बावजूद कर्नाटक में जो हो रहा है,वह उत्तर भारत की बदनाम गायपट्टी से भयंकर है।
यहीं नहीं,जिन लेखकों पर हिंदुत्व के ब्राह्मणवादी पुनरूत्थान के खिलाफ लिखने के लिए हमले हुए,वे महाराष्ट्र और कर्नाटक के हैं तो रोहित वेमुला की हत्या तेलंगना राष्ट्रीयता और तेलंगना किसान आंदोलन की जमीन हैदराबाद में हुई।
दाभोलकर और पानसारे उस महाराष्ट्र में मारे गये जहां शिवाजी महाराज ने दिल्ली की निरकुंश सत्ता को चुनौती देकर महाराष्ट्र में ब्राह्मण तंत्र के खिलाफ शूद्रों का राज कायम किया,जहां महात्मा ज्योतिबा फूले और सावित्रबाी फूले की कर्म भूमि है,जहां से बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने जाति उन्मूलन के एजंडे के साथ समानता, न्याय और संवैधानिक हकहकूक का मिशन शुरु किया,जहां आज भी लाखों अबेंडकरी संगठन सक्रिय हैं।
कर्नाटक,महाराष्ट्र,पेरियार के तमिलनाडु और नारायण स्वामी,अयंकाली के केरल में जनपदों और किसान समाज का व्यापक हिंदुत्वकरण हुआ है वैसे ही जैसे बंगाल,बिहार और असम का।
हिंदी पट्टी में संतों के आंदोलन और सूफी आंदोलन के पीछे जो किसान समाज है, वही बंगाल के फकीर बाउल आंदोलन का किसान समाज है।
रवींद्र साहित्य का आध्यात्म और प्रेम मनुष्यता का धर्म और विश्व मानवता का दर्शन इसी जमीन की उपज है।
इस जमीन के पकाने का काम किया है बाउल फकीर आंदोलन ने।
इसी फकीर बाउल आदिवासी किसान आंदोलन के हिंदुत्वकरण से जन्मा फासिज्म का नस्ली राष्ट्रवाद,जिस कारण भारत का विभाजन हुआ और फिर फिर फिर विभाजन का खतरा देश और जनता को लहूलुहान कर रहा है।
दूध घी की नदियां इसीलिए अब खून की नदियों में तब्दील हैं।
गीतवितान में दो हजार से ज्यादा रवींद्र नाथ के गीत हैं जिनमें सैकड़ों बाउल गान से सीधे प्रभावित हैं,जिनकी एक आधिकारिक सूची भी हमने शेयर की है।
गीतांजलि की चर्चा हमेशा भारतीय आध्यात्म और रहस्यवाद,आस्था और धर्म के संदर्भ और प्रसंग में होती है।लेकिन यह आध्यात्म वैदिकी सभ्यता और ब्राह्मण धर्म का आध्यात्म नहीं है।यह बौद्ध विरासत,वैष्णव बाउल और फकीर,सूफी आंदोलन की साझा विरासत की पूर्वी बंगाल के शूद्र अछूत मुसलमान किसानों की लोकसंस्कृति है,जिसके सबसे बड़े प्रतिनिधि लालन फकीर हैं।
हिंदी के पाठक अगर गोस्वामी तुलसीदास के मर्यादा पुरुषोत्तम राम को मनुस्मृति संविधान का रक्षक मानते हैं तो वे राम चरित मानस में मनुष्यता के धर्म को समझ नहीं सकते।कबीर दास,रसखान,सूरदास,रहीम दास,तुकाराम,नामदेव और गुरु नानक की साझा विरासत को अगर नहीं समझते तो समता न्याय का विमर्श रहा दूर,भारते के संविधान ,कानून के राज,लोकतंत्र और लोक गणराज्य को बी नहीं समझेंगे और जिस राजसत्ता और धर्मसत्ता के खिलाफ जनपदों और किसान समाज की आजादी के लिए संतों गुरुओं का आंदोलन है,उसी के शिकंजे में फंसते चले जायेेंगे और सामाजिक शक्तियों की जगह फासीवादी निरंकुश नस्ली सत्ता की नरसंहार संस्कृति के शिकार हो जायेंगे।
दिल्ली की सत्ता के लिए हिंदी पट्टी बेकार बदनाम हो रही है।हिंदुत्व या इस्लामी राष्ट्रवाद,नस्ली और क्षेत्रीय राष्ट्रवाद का तांडव गैर हिंदी प्रदेशों में सबसे ज्यादा है।कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र,असम,बंगाल जैसे राज्यों में,जहां नस्ली वर्चस्व के खिलाफ,ब्राह्मणधर्म के खिलाफ सामंतवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ आदिवासियों किसानों के साथ साथ साधु संतों फकीरों बाउलों का आंदोलन चलता रहा है और समता न्याय के संघर्ष भी जहां तेज हुए हैं।
इस लिहाज से उत्तर भारत की हिंदी पट्टी में सामाजिक बदलाव बाकी भारत की तुलना में ज्यादा हुआ है और सत्ता में और जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी  दलितों, मुसलमानों, पिछडो़ं, आदिवासियों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिला है और स्त्री अस्मिता के स्वर भी इन्हीं क्षेत्रों में सबसे मुखर हैं तो इस निरंकुश नस्ली सत्ता के प्रतिरोध की जमीन भी गाय पट्टी में बनेगी।इसकी तैयारी में रवींद्र का दलित विमर्श और नस्ली राष्ट्रवाद के मुकाबले बाउल फकीरोें आदिवासियों किसानों के आंदोलन के इतिहास को समझना बेहद जरुरी है।
बांग्लादेश के कबीर हुमायूं ने गीताजंलि में लालन फकीर के असर का सिलसिलेवार विश्लेषण किया है।उनके मुताबिक लालन की रचनाओं का परिष्कार गीतांजलि में रवींद्रनाथ ने किया है।उनके इस दावे की पुष्टि दूसरे तमाम अध्ययनों से होती रही है।फिलहाल उनके आलेख में रवींद्र और लालन के गीतों का यह  तुलनात्मक अध्ययन देखें और रचनाधर्मतिा में किसान समाज की प्रासंगरिकता को समझेंः
রবীন্দ্রনাথের গীতাঞ্জলির গীতধারায় যদি আমরা আধ্যাত্মিকতার চেতনায় নিবিষ্টতায় রসাস্বাদন করি তা‘হলে আমরা দেখবো যে লালনের দর্শনের বা লালন কালামের পরিশীলিত রচনার ধারাবাহিকতা।লালনের কালামে বিনয় ও মানবীয় আমিত্ব শূন্যতার এক কৌশল মাত্র। গুরুর চরণে নিজেকে অধম ও গুরুত্বহীনভাবে তুলে ধরে গুরুকে সর্বোত্তমরূপে প্রকাশ করার এক কৌশল সাঁইজী তুলে ধরেছেন তাঁর সুরে ও কালামে। পরম আত্মাকে কল্পনা করেছেন গুরুর ভনিতায়। সেই কথাই যেন আমরা শুনতে পাই কবিগুরু রবী ঠাকুরের কন্ঠে -

‘তুমি কেমন করে গান কর যে, গুণী,
অবাক হয়ে শুনি কেবল শুনি।
সুরের আলো ভূবন ফেলে ছেয়ে,
সুরের হাওয়া চলে গগন বেয়ে,
পাষান টুটে ব্যাকুল বেগে ধেয়ে
বহিয়া যায় সুরের সুরধুনী।’



রবীন্দ্রনাথ অরূপের (নিরাকার) অপরূপ রূপে অবগাহনের নিমিত্তে অতল রূপ সাগরে ডুব দিয়েছেন অরূপ রতন (অমূল্য রতন) আশা করি, তাঁর ভাষায়-

‘রূপসাগরে ডুব দিয়েছি
অরূপ রতন আশা করি ;
ঘাটে ঘাটে ঘুরব না আর
ভাসিয়ে আমার জীর্ণ তরী ।
সময় যেন হয় রে এবার
ঢেউ-খাওয়া সব চুকিয়ে দেবার
সুধায় এবার তলিয়ে গিয়ে
অমর হয়ে রব মরি।’

লালন তাঁর একতারার তারে সুরে ও ছন্দে গেয়ে গেছেন -

‘রূপের তুলনা রূপে।
ফণি মণি সৌদামিনী
কী আর তাঁর কাছে শোভে ।
যে দেখেছে সেই অটল রূপ
বাক্ নাহি তার, মেরেছে চুপ।
পার হলো সে এ ভবকূপ
রূপের মালা হৃদয়ে জপে ।’

এই রূপের তুলনা মানবসত্ত্বায় নিহিত বস্তুমোহমুক্ত নিষ্কামী মহা মানবের স্বরূপ। যে মহা মানব সম্যক গুরুদেবের কাছে সম্পূর্ন আত্ম-সমর্পিত চিত্তে কঠিন ধ্যানব্রত অবস্থায় শিক্ষা গ্রহন করেন। যেখানে অরূপে( অস্থিত্বহীনতায়) খুঁজে ফেরে রূপের সন্ধান। যেখানে ‘নিজেকে জানা’ এর জন্য পরিপূর্ন আত্মদর্শনে ব্যাপৃত থাকে। তাই লালন ফকির দ্বিধাহীন চিত্তে প্রকাশ করেছেন -

‘যার আপন খবর আপনার হয় না।
একবার আপনারে চিনতে পারলেরে
যাবে অচেনারে চেনা ।
আত্মরূপে কর্তা হরি,
নিষ্ঠা হলে মিলবে তাঁরই ঠিকানা।
ঘুরে বেড়াও দিল্লি লাহোর
কোলের ঘোর তো যায় না ।’

ধর্ম তত্ত্বে পরমাত্মা বা ঈশ্বরকে অনুসন্ধানের জন্য বৈরাগ্য সাধন প্রক্রিয়ায় বনে-জঙ্গলে, পাহার-পর্বতে, অথবা মক্কা-কাশীতে যাওয়ার তাগিদ অনুভব করেনি লালন শাহ; তেমনি তাঁর ভাবশিষ্য রবীন্দ্রনাথ ঠাকুরও লালন দর্শনের মতোই ঈশ্বরের মহিমা খুঁজে ফিরেছেন মানুষের মাঝে। মানুষই ঈশ্বর, মানুষই দেবতা, মানুষের মাঝেই পরমাত্মার অস্থিত্ব লীন। তাই লালন শাহের কন্ঠে যেমন শুনি-

‘ ভবে মানুষ গুরুনিষ্ঠা যার।
সর্বসাধন সিদ্ধি হয় তার ।
নিরাকারে জ্যোতির্ময় যে
আকার সাকার হইল সে
যে জন দিব্যজ্ঞানী হয়, সেহি জানতে পায়
কলি যুগে হল মানুষ অবতার ।’

অপরদিকে রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর লালন শাহের ভাব দর্শনের দ্যোতনাকে আরও উচ্চমার্গ্মে তুলে ধরেছেন। মনে হয় লালনের চিন্তা-চেতনাকে শালীন ও সুন্দরভাবে তুলে ধরেছেন স্বয়ং কবিগুরু। মার্জিত ভাষার পরিশীলিত সুরের মাধুর্য দিয়ে কবিগুরু একতারার সুরের স্থানে বীণার তারে ঝংকৃত করেছেন মানব ও মানবতার মাঝেই পরমাত্মার অস্তিত্ব। সেই পরমাত্মাকে পেতে হলে আমিত্বের অহংবোধকে লীন করে দিতে হবে মানুষ-গুরু সাধনে; মানবতার পরাকাষ্ঠা দেদীপ্যমান করে। কবিগুরুর ভাষায় তা হলো -

‘ভজন পূজন সাধন আরাধনা
সমস্ত থাক পড়ে।
রুদ্ধদ্বারে দেবালয়ের কোণে
কেন আছিস ওরে।
তিনি গেছেন যেথায় মাটি ভেঙে
করছে চাষা চাষ -
পাথর ভেঙে কাটছে যেথায় পথ,
খাটছে বারো মাস।
রৌদ্রে জলে আছেন সবার সাথে,
ধূলা তাঁহার লেগেছে দুই হাতে -
তাঁরই মতন শুচি বসন ছাড়ি
আয় রে ধুলার ‘পরে।’

অপরদিকে, ফকির লালন শাহ মানবদেহে নিহিত আলোকিত সত্তার উন্মেষের ইচ্ছায় স্বীয় কন্ঠে উচ্চারন করেন -

‘মানুষ ভজলে সোনার মানুষ হবি।
মানুষ ছাড়া ক্ষ্যাপারে তুই
মূল হারাবি ।
মানুষ ছাড়া মনরে আমার
দেখিরে সব শূন্যকার
লালন বলে মানুষ আকার
ভজলে পাবি ।’

লালন ফকির তাঁর পরমাত্মার সাথে মিলনের প্রচন্ড আকাঙ্খা তাঁকে উন্মাতাল করে রাখতো, তাই সে প্রভুর সাথে মিলনের আকাঙ্খায় বেদন সুরে গেয়ে বেড়ায়-

‘ মিলন হবে কতোদিনে।
আমার মনের মানুষের সনে ।
ঐ রূপ যখন স্মরণ হয়
থাকে না লোক লজ্জার ভয়
লালন ফকির ভেবে বলে সদাই
ও প্রেম যে করে সেই জানে ।’

প্রভুর সাথে মিলনের ইচ্ছা লালনকে যেমন চাতক প্রায় জোছনালোকের প্রত্যাশায় দিন গুনতো , তেমনি প্রভুর সান্নিধ্য পাবার আশায় রবীন্দ্রনাথ ব্যাকুল হৃদয়ে গাইতেন -

‘যদি তোমার দেখা না পাই প্রভু,
এবার এ জীবনে,
তবে তোমায় আমি পাইনি যেন,
সে কথা রয় মনে ।
যেন ভুলে না যাই, বেদনা পাই
শয়নে স্বপনে।’

অথবা

‘আমার মিলন লাগি তুমি
আসছ কবে থেকে।
তোমার চন্দ্র সূর্য তোমায়
রাখবে কোথায় ঢেকে।
কত কালের সকাল-সাঁঝে
তোমার চরণধ্বনি বাজে,
গোপনে দূত হৃদয়-মাঝে
গেছে আমায় ডেকে।’

বাউল সম্রাট লালন ফকির এবং কবিগুরু রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর- এ দু’জন মহৎ-প্রাণ ও সাধুর কর্ম ও রচনার কিছু দিক নিয়ে আলোকপাত করেছি বটে। লালন শাহের প্রয়াণের সময়কালে রবীন্দ্রনাথের পূর্ণ যৌবনকাল। তখন তাঁর বয়স ২৮/২৯ বছর। যে ‘গীতাঞ্জলি’ রবীন্দ্রনাথ ঠাকুরকে এবং বাংলা ভাষাকে এনে দিয়েছে সুনাম, সম্মৃদ্ধি ও বিশ্বজনীনতা। সেই গীতাঞ্জলির প্রতিটি ‘গীত’ ধীর-স্থীরতার সাথে পাঠ করলে নিজের অজান্তে মনে হবে - এ কথাগুলোতো তাঁর পূর্ব-পুরুষ বাউল কবি ফকির লালন শাহ আগেই বলে গেছেন। অর্থাৎ, গীতাঞ্জলির গানগুলো লেখার সময় কবিগুরু প্রচন্ডভাবে বাউল কবি লালনের রচনার দ্বারা প্রভাবিত হয়েছিলেন। কিন্তু বড়ই পরিতাপের বিষয় এশিয়ার প্রথম নোভেল বিজয়ী কবিগুরু রবীন্দ্রনাথকে নিয়ে যেভাবে দুই বাংলায় বাঙালীগণ উচ্ছ্বাসিত ও উদ্বেলিত হয়ে স্মরন করেন; সেইরূপ হয়না বাউল সম্রাট লালন শাহের ক্ষেত্রে।
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Sunday, September 10, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श-20 क्या यह देश हत्यारों का है? हम किस देश के वासी हैं? भविष्य के प्रति जबावदेही के बदले घूसखोरी? गौरी लंकेश की हत्या के बाद 25 कन्नड़, द्रविड़ साहित्यकार निशाने पर! मौजूदा सत्ता वर्ग की रिश्वत खाकर भविष्य से दगा करने से इंकार करनेवाले लोग निशाने पर हैं,बाकी किसी को खतरा नहीं है। भारत के किसान हजारों साल से धर्मसत्ता और राजसत्ता के खिलाफ लड़ते रहे हैं।जिसका कोई ब्यौरा हमारे इतिहास और साहित्य में नहीं है।अब हम फिर उसी धर्मसत्ता के शिकंजे में हैं और राजसत्ता निरंकुश है।किसान और कृषि विमर्श से बाहर हैं। पलाश विश्वास

रवींद्र का दलित विमर्श-20
क्या यह देश हत्यारों का है? हम किस देश के वासी हैं?
भविष्य के प्रति जबावदेही के बदले घूसखोरी?
गौरी लंकेश की हत्या के बाद 25 कन्नड़, द्रविड़ साहित्यकार निशाने पर!
मौजूदा सत्ता वर्ग की रिश्वत खाकर भविष्य से दगा करने से इंकार करनेवाले लोग निशाने पर हैं,बाकी किसी को खतरा नहीं है।
भारत के किसान हजारों साल से धर्मसत्ता और राजसत्ता के खिलाफ लड़ते रहे हैं।जिसका कोई ब्यौरा हमारे इतिहास और साहित्य में नहीं है।अब हम फिर उसी धर्मसत्ता के शिकंजे में हैं और राजसत्ता निरंकुश है।किसान और कृषि विमर्श से बाहर हैं।
पलाश विश्वास
इंडियन एक्सप्रेस की खबर है।गौरी लंकेश की हत्या के बाद कन्नड़ के 25 साहित्यकारों को जान के खतरे के मद्देनर सुरक्षा दी जा रही है।
जाहिर है कि दाभोलकर,पनासरे,कुलबर्गी,रोहित वेमुला,गौरी लंकेश के बाद वध का यह सिलसिला खत्म नहीं होने जा रहा है।
हम किस देश के वासी हैं?
अब यकीनन राजकपूर की तरह यह गाना मुश्किल हैःहम उस देश के वासी हैं,जहां गंगा बहती है।
सत्तर के दशक में हमारे प्रिय कवि नवारुण भट्टाचार्य ने लिखा थाःयह मृत्यु उपत्यका मेरा देश नहीं है।
अब वही मृत्यु उपत्यका मेरा देश बन चुका है।शायद अब यह कहना होगा कि मेरा देश हत्यारों का देश है।सत्य,अहिंसा और प्रेम का भारत तीर्थ अब हत्यारों का देश बन चुका है,जिसमें भारतवासी वही है जो हत्यारा है।बाकी कोई भारतवासी हैं ही नहीं।
रवींद्रनाथ के लिखे भारतवर्षेर इतिहास की चर्चा हम कर चुके हैं।जिसमें उन्होंने साफ साफ लिखा है कि शासकों के इतिहास में लगता है कि भारतवर्ष हत्यारों को देश है और भारतवासी कहीं हैं ही नहीं।आज समय और समाज का यही यथार्थ है।
रवींद्र नाथ की लिखी कविता दो बीघा जमीन की भी हम चर्चा कर चुके हैं।जल जंगल जमीन के हकहकूक के बारे में उन्होंने और भी बहुत कुछ लिखा है।क्योंकि वे जिस भारतवर्ष की बात करते रहे हैं,वह समाज का मतलब जनपदों का ग्रामीण समाज है।किसानों का समाज है।ईंट के ऊपर ईंट से बनी नयी सभ्यता के मुक्तबाजार में कीट बने मनुष्यों की कथा विस्तार से उन्होंने लिखी है।
साहित्य के बारे में लिखते हुए उन्होंने सम्राट अशोक के शिला लेखों की चर्चा की है।उनके निबंध साहित्य पर हम आगे चर्चा करेंगे।
रोम में कुलीन तंत्र में आदिविद्रोही स्पार्टकस के नेतृत्व में दासों के विद्रोह के बाद करीब दो हजार साल हो गये हैं,मनुष्यों को दास बनाने का वह कुलीन तंत्र खत्म हुआ नहीं है।
जर्मनी और इंग्लैंड समेत यूरोप में राजसत्ता और धर्म सत्ता के विरुद्ध किसानों के विद्रोह के बाद सही मायने में स्वतंत्रता का विमर्श शुरु हुआ।इंग्लैंड में 1381 के किसान विद्रोह से एक सिलसिला शुरु हुआ किसानों के विद्रोह और आंदोलन का,जिसके तहत राजसत्ता और धर्मसत्ता के कुलीन तंत्र में दास मनुष्यों का मुक्ति संघर्ष शुरु हुआ।इंग्लैंड और जर्मनी के किसानों ने धर्मसत्ता को सिरे से उखाड़ फेंका।
1381 के इंग्लैंड में किसानों का वह विद्रोह का एक बड़ा कारण प्लेग से हुई व्यापक पैमाने पर मृत्यु को बताया जाता है तो दूसरा कारण सौ साल के धर्मयुद्ध क्रुसेड के लिए किसानों पर लगा टैक्स है।यह पहला युद्ध विरोधी किसान विद्रोह भी है।यूरोप की रिनेशां भी इसी धर्मयुद्ध की परिणति है।
धर्मसत्ता और राजसत्ता के कुलीन तंत्र के खिलाफ फ्रांसीसी क्रांति हुई और अमेरिकी क्रांति में लोकतंत्र  की स्थापना से धर्म सत्ता और राजसत्ता के विरुद्ध मनुष्यता और स्वतंत्रता के मूल्यों की जीत का सिलसिला शुरु हुआ।
पूंजीवाद, साम्राज्यवाद और औद्योगीकीकरण से पहले इतिहास बदलने में किसानों की निर्णायक भूमिका रही है।वह भूमिका अभी खत्म नहीं हुई है।
विचारधारा की राजनीति करने वालों को शायद ऐसा नहीं लगता और वे अपना अपना लालकिला बनाकर भगवा आतंक के प्रतिरोध का जश्न मनाते हुए नजर आते हैं।
यह सारा इतिहास विश्व इतिहास का हिस्सा है और कला साहित्य,माध्यमों और विधाओं का विषय भी है।
इसके विपरीत पश्चिमी देशों की नगरकेंद्रित आधुनिक सभ्यता के मुकाबले डिजिटल मुक्तबाजार के बहुसंख्यक मनुष्य अब भी किसान हैं।
शहरीकरण और औद्योगीकीकरण के नतीजतन पेशा बदलने की वजह से जो शहरी लोग अब किसान नहीं हैं,उऩकी जड़ें भी गांवों में हैं।
भारत के किसान हजारों साल से धर्मसत्ता और राजसत्ता के खिलाफ लड़ते रहे हैं।जिसका कोई ब्यौरा हमारे इतिहास और साहित्य में नहीं है।अब हम फिर उसी धर्मसत्ता के शिकंजे में हैं और राजसत्ता निरंकुश है।
किसान और कृषि विमर्श से बाहर हैं।
ब्रिटिश हुकूमत की शुरुआत से भारत के किसान औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लगातार विद्रोह करते रहे हैं,लेकिन यह इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में शामिल नहीं है।
साहित्य से भी किसान बहिस्कृत हैं।ऐसा क्यों है?
अभी वर्धा के छात्रों ने सारस पत्रिका के प्रवेशांक मे किसानों पर एक विमर्श की शुरुआत की है।इसकी निरंतरता बनाये रखने की जरुरत है।पत्रिका अभी हम तक पहुंची नहीं है।जब आयेगी तब इसपर अलग से चर्चा करेंगे।इस शुरुआत के लिए उन्हें बधाई।
रवींद्रनाथ ने राष्ट्रवाद पर लिखते हुए भारत की समस्या को सामाजिक माना है और इस सामाजिक समस्या को उन्होंने  विषमता की समस्या कहा है। इस विषमता की वजह नस्ली वर्चस्व है और इसीलिए नस्ली वर्चस्व पर आधारित पश्चिम के फासीवादी राष्ट्रवाद का उन्होंने शुरु से लेकर अंत तक विरोध किया है।
जाति वर्ण व्यवस्था के तहत भारत के किसान शूद्र, अछूत, आदिवासी या विधर्मी हैं।यही भारत का किसान समाज है।इसी वजह से इतिहास और साहित्य, कला, माध्यमों में किसान वर्ग वर्ण नस्ली वर्चस्व की वजह से अनुपस्थित हैं।
बाकी दुनिया में और फासीवादी राष्ट्रवाद की जमीन पर भी किसानों को ऐसा बहिस्कार नहीं है।न अन्यत्र कहीं अन्नदाता किसान और मेहनतकश लोग शूद्र या अछूत हैं।विषमता का यह नस्ली वर्चस्ववाद श्वेत आतंकवाद से भी भयंकर है।
बंगाल में भुखमरी के बाद गणनाट्य आंदोलन में किसानों को पहली बार विमर्श के केंद्र में रखा गया और फिर नक्सलबाड़ी आंदोलन में भारतीय कृषि पर फोकस हुआ।सत्तर के दशक के अंत के हिंदुत्व पुनरूत्थान और मुक्तबाजार अर्थव्यवस्था के तहत मनुस्मृति की धर्मसत्ता और राजसत्ता के एकाकार हो जाने से बहुसंख्य बहुजन अवर्ण आदिवासी और विधर्मी गैरनस्ली अनार्य द्रविड़ किसान,उनके गांव, जनपद, जल, जंगल जमीन वैदिकी सभ्यता की अश्वमेधी नरसंहार संस्कृति के निशाने पर हैं और सत्ता वर्ग को उनसे कोई सहानुभूति नहीं है।किसान से पेशा बदलकर भद्रलोक बने शहरी मुक्तबाजारी सत्ता समर्थकों को भी किसानों से कोई सहानुभूति नहीं है।
गौरतलब है कि भारतीय किसान समाज,उनकी लोकसंस्कृति और उनके आंदोलन  देशी विदेशी शासकों,जमींदारों,महाजनों और सूदखोरों के साथ साथ इस भद्रलोक बिरादरी के खिलाफ रहे हैं तो जाहिर है कि भद्रलोक बिरादरी के सत्ता वर्ग,उनकी राजनीति,उनके इतिहास और उनके साहित्य में बहुजन, अवर्ण, शूद्र, अछूत, आदिवासी,अनार्य,द्रविड़ किसानों की कोई जगह नहीं है।
कल हमने  विश्वभऱ के किसान आंदोलनों के बारे में उपलब्ध समाग्री शेयर करने की कोशिश की तो ज्यादातर सामग्री अंग्रेजी या बांग्ला में मिली और हिंदी में कम से कम सूचना क्रांति में ओतप्रोत हिंदी समाज की तरफ से दर्ज किसान आंदोलनों का कोई दस्तावेज हमें नहीं मिला।
शोध पुस्तकें हैं लेकिन वे खरीदने के लिए हैं और अंग्रेजी और बांग्ला की तरह ओपन सोर्स नहीं है।
बांग्ला में भी ज्यादातर सामग्री बांग्लादेश से है.जहां सवर्ण वर्चस्व नहीं है।
हिंदी में 1857 की क्रांति से पहले 1757 में पलाशी युद्ध के तत्काल बाद शुरु चुआड़ विद्रोह और पूर्वी बंगाल के पाबना और रंगपुर के किसान विद्रोहों के बारे में कुछ भी उपलब्ध नहीं है।शोध सामग्री हो सकता है कि हो,लेकिन आम जनता के लिए उपलब्ध जनविमर्श में ऐसे दस्तावेज नहीं है।
कल हमने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ फकीर संन्यासी विद्रोह के दस्तावेज भी शेयर पेश किये है,जिसके बारे में हिंदी में आनंदमठ के संन्यासी विद्रोह और वंदेमातरम प्रसंग में चर्चा होती रही है।बंगाल में विद्रोह दमन के बावजूद यह विद्रोह नेपाल, बिहार, असम और पूर्वी बंगाल में जारी रहा है और इसके नेतृ्त्व में फकीर बाउल सन्यासी के अलावा आदिवासी और किसान भी थे।
भारत में धर्मसत्ता का वर्चस्व कभी नहीं रहा है।वैदिकी सभ्यता के ब्राह्मण धर्म या बौद्धमय भारत के बौद्ध धर्म या पठान मुगलों के सात सौ साल के दौरान  इस्लाम धर्म शासकों का धर्म होने के बावजूद यूरोप में धर्म सत्ता और राजसत्ता के किसी दोहरे तंत्र को  भारत में आम जनता के किसान समाज ने स्वीकारा नहीं है।कुलीन सत्ता वर्ग के धर्म और राजनीति से अलग उनकी लोक संस्कृति की साझा विरासत गांव देहात जनपदों में मनुष्यता के धर्म के रुप में हमेशा जीवित रही है।
यही भारत की सूफी संत गुरु परंपरा है,जो सत्ता वर्ग के दायरे से बाहर जल जंगल जमीन और जनपद का विमर्श रहा है।
सात सौ साल के इस्लामी राजकाज के दौरान आम जनता का व्यापक जबरन धर्मांतरण हुआ होता तो भारत में बौद्धों की तरह हिंदुओं की जनसंख्या भी कुछ लाख तक सीमित हो जाती और अस्सी प्रतिशत से ज्यादा यह जनसंख्या उसी तरह नहीं होती जैसे बौद्ध शासकों के बाद भारत में बौद्धों की जनसंख्या का अंत हो गया।
बंगाल में तेरहवीं सदी में जिस तरह बौद्धों का धर्मांतरण हुआ है,भारत के इतिहास में सात सौ साल के मुसलमान शासकों के राजकाज के दौरान उतना व्यापक धर्मंतरण हुआ नहीं है।होता तो जैसे भारत फिर बुद्धमय नहीं बना,उसीतरह हिंदू राष्ट्र का विमर्श चलाने वाले पुरोहित तंत्र और सत्ता वर्ग् के साथ हिंदू भी नहीं होते।
इस्लामी शासन के दौरना भी हिंदुओं की दिनचर्या जीवन यापन मनुस्मृति विधान के कठोर अनुशासन में पुरोहित तंत्र के निंयत्रण में रहने का इतिहास है  और मुसलमान शासकों ने अंग्रेजों की तरह ब्राह्मणतंत्र में कोई हस्तक्षेप नहीं किया है।
मनुस्मृति विधान ईस्ट इंडिया कंपनी के राजकाज के दौरान समाज सुधार के ब्राह्मणतंत्र विरोधी बहुजन आंदोलनों को तहत टूटना शुरु हुआ क्योंकि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान उन्हें उनके वे हकहकूक मिलने शुरु हो गये जो मनुस्मृति विधान के तहत निषिद्ध थे।
अब आजादी के बाद हिंदुत्व के पुनरुत्थान के फासीवादी नस्ली राजकाज और राष्ट्रवाद के तहत फिर मनुस्मृति विधान लागू है तो जाहिर है कि बहजनों, अवर्णों, आदिवासियों,द्रविड़ और अनार्य, किसान और मेहनतकश समुदायों का सफाया लाजिमी है।
इसीलिए मुक्त बाजार में किसान समाज की हत्या हो रही है तो बोलियों का लोकतंत्र खत्म है और लोकसंस्कृति जनपदों के साथ साथ विलुप्तप्राय है।
साहित्य,कला,इतिहास और संस्कृति का प्रस्थानबिंदू सिरे से खत्म है तो वर्तमान सामाजिक यथार्थ हत्यारों का आतंकराज है,जहां कबीर सूर नानक तुकाराम लालन फकीर या रवींद्र या गांधी या प्रेमचंद के लिए कोई स्पेस नहीं है।
भारत में लोक संस्कृति का आध्यात्म,आस्था और धर्म प्रकृति और पर्यावरण, जल जंगल जमीन और सामुदायिक जीवन पर आधारित है जो उपभोक्तावाद और नस्ली फासीवादी राष्ट्रवाद दोनों, धर्म सत्ता और राजसत्ता दोनों के विरुद्ध है।
रवींद्रनाथ ने पल्ली प्रकृति में लिखा हैः
आम जनता में विशेष कालखंड में सामयिक तौर पर भावनाओं की सुनामी बनती है-सामाजिक,राष्ट्रवादी या धार्मिक संप्रदायिक। आम जनता की भावनाओं की इस सुनामी की ताकीद अगर ज्यादा हो गया तो भविष्य की यात्रापथ की दिशाएं बदल जाती हैं।कवियों में यह प्रवृत्ति होती है कि कई बार वे वर्तमान से रिश्वत लेकर भविष्य को वंचित कर देते हैं।कभी कभी ऐसा समय आता है,जब रिश्वत का यह बाजार बेहद लोभनीय बन जाता है।देशभक्ति,सांप्रदायिकता के खाते खुल जाते हैं।तब नकदी की लालच से बचना मुश्किल हो जाता है..(रवींद्र रचनावली,जन्मशतवार्षिकी संस्करण,पल्ली प्रकृति,पृष्ठ 570)
मौजूदा सत्ता वर्ग की रिश्वत खाकर भविष्य से दगा करने से इंकार करनेवाले लोग निशाने पर हैं,बाकी किसी को खतरा नहीं है।
जल जंगल जमीन और प्रकृति के विरुद्ध मनुष्य के सर्वग्रासी लोभ और आक्रमण के खिलाफ अरण्य देवता निबंध में उन्होंने लिखा है कि अपने लोभ के कारण मनुष्य अपनी मौत को दावत दे रहा है। इसी कृषि विरोधी जनपद विरोधी विकास को गांधा ने पागल दौड़ कहा और सत्ता वर्ग इसे आज आर्थिक सुधार कहता है।
जंगलों के अंधाधुंध कटान के खिलाफ पर्यावरण बचाओ चिपको आंदोलन से बहुत पहले रवींद्र नाथ ने लिखा हैः
রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর এসব বুঝেছিলেন বলে ‘অরণ্য দেবতা’ প্রবন্ধে বলেছেন- ‘মানুষের সর্বগ্রাসী লোভের হাত থেকে অরণ্য সম্পদ রক্ষা করাই সর্বত্র সমস্যা হয়ে দাঁড়িয়েছে। বিধাতা পাঠিয়েছিলেন প্রাণকে, চারিদিকে তারই আয়োজন করে রেখেছিলেন। মানুষই নিজের লোভের দ্বারা মরণের উপকরণ জুগিয়েছে।… মানুষ অরণ্যকে ধ্বংস করে নিজেরই ক্ষতি ডেকে এনেছে। বায়ুকে নির্মল করার ভার যে গাছের উপর, যার পত্র ঝরে গিয়ে ভূমিকে উর্বরতা দেয়, তাকেই সে নির্মূল করেছে। বিধাতার যা কিছু কল্যাণের দান, আপনার কল্যাণ বিস্মৃত হয়ে মানুষ তাকেই ধ্বংস করেছে।’
रवींद्र नाथ ने मनुष्य के लिए जो भी कुछ हितकर है,उसे प्रकृति पर निर्भर माना है।उनके मुताबिक प्रकृति से तादाम्य ही मनुष्यता का धर्म है। प्रकृति से व्याभिचार के लिए धर्म कर्म से विचलन के खिलाफ वे मुखर रहे हैंः
আমরা লোভবশত প্রকৃতির প্রতি ব্যভিচার যেন না করি। আমাদের ধর্মে-কর্মে, ভাবে-ভঙ্গিতে প্রত্যহই তাহা করিতেছি, এই জন্য আমাদের সমস্যা উত্তরোত্তর জটিল হইয়া উঠিয়াছে- আমরা কেবলই অকৃতকার্য এবং ভারাক্রান্ত হইয়া পড়িতেছি। বস্তুত জটিলতা আমাদের দেশের ধর্ম নহে। উপকরণের বিরলতা, জীবনযাত্রার সরলতা আমাদের দেশের নিজস্ব- এখানেই আমাদের বল, আমাদের প্রাণ, আমাদের প্রতিজ্ঞা।’
छिन पत्र और तपोवन में भी उन्होंने जल जंगल जमीन के हकहकूक की आवाज बुलंद की हैः
বৃক্ষের প্রয়োজনীয়তা সম্পর্কে এ এক বিস্ময়কর অনুধ্যান নিঃসন্দেহে। ছিন্নপত্রের ৬৪ তথা ছিন্নপত্রাবলির ৭০ সংখ্যক পত্রে কবি বৃক্ষের সঙ্গে নিজের সম্পর্কের পরিচয় উন্মোচন করে বলেন-

‘এক সময়ে যখন আমি এই পৃথিবীর সঙ্গে এক হয়ে ছিলাম, যখন আমার উপর সবুজ ঘাস উঠত, শরতের আলো পড়ত, সূর্যকিরণে আমার সুদূর বিস্তৃত শ্যামল অঙ্গের প্রত্যেক রোমক‚প থেকে যৌবনের সুগন্ধ উত্তাপ উত্থিত হতে থাকত, আমি কত দূরদূরান্তর দেশদেশান্তরের জলস্থল ব্যাপ্ত করে উজ্জ্বল আকাশের নীচে নিস্তব্ধভাবে শুয়ে পড়ে থাকতাম, তখন শরৎসূর্যালোকে আমার বৃহৎ সর্বাঙ্গে যে-একটি আনন্দরস, যে-একটি জীবনীশক্তি অত্যন্ত অব্যক্ত অর্ধচেতন এবং অত্যন্ত প্রকাণ্ড বৃহৎভাবে সঞ্চারিত হতে থাকত, তাই যেন খানিকটা মনে পড়ল। আমার এই যে মনের ভাব, এ যেন এই প্রতিনিয়ত অঙ্কুরিত মুকুলিত পুলকিত সূর্যনাথ আদিম পৃথিবীর ভাব। যেন আমার এই চেতনার প্রবাহ পৃথিবীর ঘাসে এবং গাছের শিকড়ে শিকড়ে শিরায় শিরায় ধীরে ধীরে প্রবাহিত হচ্ছে, সমস্ত শস্যক্ষেত রোমাঞ্চিত হয়ে উঠেছে, এবং নারকেল গাছের প্রত্যেক পাতা জীবনের আবেগে থর থর করে কাঁপছে।’

আবার ‘তপোবন’ এ তিনি বলেন-

‘…ভারতবর্ষের একটি আশ্চর্য ব্যাপার দেখা গেছে এখানকার সভ্যতার মূল প্রস্রবণ শহরে নয়, বনে। ভারতবর্ষের প্রথমত আশ্চর্য বিকাশ দেখিতে পাই সেখানে, মানুষের সঙ্গে মানুষের অত্যন্ত ঘেঁষাঘেঁষি একেবারে পিণ্ড পাকিয়ে ওঠেনি। সেখানে গাছপালা, নদী সরোবর মানুষের সঙ্গে মিলে থাকার যথেষ্ট অবকাশ পেয়েছিল।’
जल जंगल जमीन और किसानों के समाज का यह विमर्श ही सूफी संत आंदोलन का धर्म कर्म और रचनाधर्मिता है तो यही रवींद्र का दलित विमर्श है।

इसलिए कबीर,सूरदास,तुलसी, नानक,तुकाराम,नामदेव,गुरुनानक ,बसेश्वर, चैतन्य, जयदेव, लालन फकीर और रवींद्र को समझने के लिए भारतीय कृषि,किसान और कृषक समाज,आदिवासी और किसान आंदोलन में रची बसी जनपदों की लोक जमीन पर खड़ा होना जरुरी है।