Friday, September 30, 2016

बक्सादुआर के बाघ,कर्नल लाहिड़ी का आदिवासी जीवन पर नायाब उपन्यास


बक्सादुआर के बाघ,कर्नल लाहिड़ी का आदिवासी जीवन पर नायाब उपन्यास
पलाश विश्वास
अभी अभी कर्नल भूपाल चंद्र लाहिड़ी के बहुचर्चित बांग्ला उपन्यास बक्सा दुआरेर बाघ के अनुवाद को अंतिम रुप दे दिया है। उत्तर बंगाल के बक्सा जंगल के विभिन्न आदिवासी समूह के रोजमर्रे की जिंदगी,इनके समूह जीवन,भाषा और संस्कृति और उनके खिलाफ जारी दमनात्मक शोषण के जुल्मोसितम के मद्देनर भारत के लोकतंत्र,कानून व्यवस्था,सरकार और प्रशासन,राजनीति और संविधान,वन और वन अधिनियम के विविध आयाम और उनके प्रतिरोध का सिलसिलेवार ब्यौरा समेत बेहद दिलचस्प उपन्यास है।गारो और राभा जैसे आदिवासी समूहों की भाषा को यथासंभव उसकी मौलिकता के साथ,संगीतबद्धता के साथ संप्रेषित करने में हमने लिंग्वस्टिक्स और फोनेटिक्स का सहारा लिया।
कर्नल भूपाल लाहिड़ी ने सैन्य रोजनामचे पर भी बहुत बेहतरीन लिखा है।इस वक्त हफ्ते में चार दिन उनका डायलिसिस जारी है और इसके बावजूद उनकीजनप्रतिबद्ध जीजिविषा देखेने पर हमें अपनी मानसिक कमजोरी पर शर्म आ रही है।अस्सीपार लगातार अस्वस्थ चल रहे कर्नल लाहिड़ी अपने घर पर ओवी वैन खड़ा करके सुंदरवन के बच्चों को नियमित पढ़ा रहे हैं।
मैं बेहद जल्दी यह काम पूरा करना चाहता था।फिरभीमहीनेभर लग गया।इस बीच कुछ और छिटपुट अनुवाद के अलावा नियमित लेखन भी जारी रखना हुआ।शरणार्थी आंदोलन के सिलसिले में कोलकाता और उत्तर बंगाल तक की जगह जाना पड़ा।
बांग्लादेश के कथाकारों की जनपद भाषा में लिखी कहानियों के अनुवाद के बाद बक्सादुआर का यह अनुवाद बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है।किताब छपेगी तो इसकी प्रतिक्रिया का मुझे इंतजार रहेगा।
अब अनुवाद के जरिये ही मुझे दिहाड़ी कमाकर जीना है तो लिखने के साथ ही जनप्रतिबद्धता के मोर्चे पर निरंतर सक्रियता मेरे लिए आगे और बड़ी चुनौती बनने वाली है।
मित्रों से आग्रह है कि मुझे मेरी दिहाड़ी से वंचित करके बेवजह दौड़ाये नहीं।जहां जाना अनिवार्य होगा,वहां मैं खुद चला जाउंगा।लेकिन जहां जा नहीं सकता,उसके लिए माफी की जरुरत रहेगी।

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Where should Hindu refugees go with Geeta in Hand,to Pakistan or Afghanistan?

Where should Hindu refugees go with Geeta in Hand,to Pakistan or Afghanistan?
২০১২ সালে গৌহাটীতে নিখিল ভারত বাঙালি উ স সমিতির মঞ্চে দেওয়া ভাষনে  হিমন্ত বিশ্বশর্মা এখনও অনড়। হিমন্ত দল ত্যাগ করলেও নীতির পরিবর্তন করেন নাই।
Second in Commander in Assam BJP Government HIMANTO Vishwakarma demands citizenship for partition victim every refugee coming from East Bengal contrary to the BJP governance in Assam or India which denies citizenship to East Bengal refugees and specifically in Assam the ULFA agenda to deport all NON Assamese out of Assam targets Hindnu refugees also and more than 800 hundred Hindu refugees have been subjected to inhuman persecution in Assam and refugees have been put in DETENTION Camps as Ulfa treats everyone foreigner whoever entered in Assam after 1951 including Hindu,Buddhist,Barua,Chakma and Muslim refugees from East Bengal and Bihari, Bengali, Rajsthani and Punjabi citzens for other states in India.

Daink Jugashankha from Guahati and Kolkata has published latest statement of Minister Himanta Vishwakarma who crossed fence to land in RSS camp deserting Congress and ex CM Tarun Gogoi.He supported Nikhil Bharat Udvastu Samanyay Smiti movement in Assam as Congress leader and now speaks in RSS linguistics rejecting Ulfa demand to set 1951 as cut off year to identify foreigners in Assam.
Palash Biswas

Thursday, September 29, 2016

हमारी मुट्ठी में अब खून से लबालब सात समुंदर! पलाश विश्वास

हमारी मुट्ठी में अब खून से लबालब सात समुंदर!
पलाश विश्वास
पहलीबार टीवी पर युद्ध का सीधा प्रसारण खाड़ी युद्ध के दौरान अमेरिकी मीडिया ने किया अमेरिका के उस युद्ध को अमन चैन के लिए  इराक के खिलाफ पूरी दुनिया का युद्ध साबित करने के लिए।दुनियाभर का मीडिया उसीके मुताबिक विश्व जनमत तैयार करता रहा और तेल कुंओं की आग में तब से लेकर अबतक सारी दुनिया सुलग रही है।
नतीजतन आधी दुनिया अब शरणार्थी सैलाब से उसीतरह लहूलुहान है,जैसे हम इस महादेश के चप्पे चप्पे पर सन सैंतालीस के बाद से लगातार लहूलुहान होने को अभिशप्त हैं।अमेरिका के उस युद्ध की निरंतरता से महान सोवियत संघ का विखंडन हो गया और सारा विश्व ग्लोब में तब्दील होकर अमेरिकी उपनिवेश में तब्दील है।सारी सरकारें और अर्थव्यवस्थाएं अब वाशिंगटन की गुलाम हैं और उसीके हित साध रही हैं।
मनुष्यता अब पिता की हाथों से बिछुड़कर समुंदर में तैरती लाश है और फिंजा सरहदों के आर पार कयामत है।
सरकारी आधिकारिक बयान के अलावा अब तक किसी सच को सच मानने का रिवाज नहीं है और वाशिंगटन का झूठ ही सच मानती रही है दुनिया।दो दशक बाद उस सच के पर्दाफाश के पर्दाफाश के बावजूद  दहशतगर्दी और अविराम युद्धोन्माद, विश्वव्यापी शरणार्थी सैलाब,गृहयुद्धों और प्राकृतिक संसाधनों के लूटखसोट पर केंद्रित नरसंहारी मुक्तबाजार में कैद मनुष्यता की रिहाई के सारे दरवाजे खिड़किया बंद हैं और हम पुशत दर पुश्त हिरोशिमा और नागाशाकी,भोपराल गैस त्रासदी,सिख नरसंहार, असम त्रिपुरा के नरसंहार,आदिवासी भूगोल में सलवा जुड़ुम और बाबरी विध्वंस के बाद गुजरात प्रयोग की निरंतरता के मुक्तबाजार के तेल कुंओं में झलसते रहेंगे।मेहनतकशों के हाथ पांव कटते रहेंगे,युवाओं के सपनों का कत्लगाह बनता रहेगा देश,स्त्री दासी बनी रहेगी,बच्चे शरणार्थी होते रहेंगे और किसान खुदकशी करते रहेंगे।दलितों,आदिवासियों और आम जनता पर जुल्मोसिताम का सिलसिला जारी रहेगा।
इसलिए सर्जिकल स्ट्राइक के सच झूठ के मल्टी मीडिया फोर जी ब्लिट्ज और ब्लास्ट पर मुझे फिलहाल कुछ कहना नहीं है।मोबाइल पर धधकते युद्धोन्माद पर कुछ कहना बेमायने है।राष्ट्रद्रोह तो मान ही लिया जायेगा यह।
हम अमेरिकी उपनिवेश हैं और अमेरिकी नागरिकों की तरह वियतनाम युद्ध और खाड़ी युद्ध के विरोध की तर्ज पर किसी आंदोलन की बात रही दूर,विमर्श,संवाद और अभिव्यक्ति के लिए भी हम आजाद नहीं है क्योंकि यह युद्धोन्माद भी उपभोक्ता सामग्री की तरह कारपोरेट उपज है और हम जाने अनजाने उसके उपभोक्ता हैं। उपभोक्ता को कोई विवेक होता नहीं है।सम्यक ज्ञान और सम्याक प्रज्ञा की कोई संभावना कही नहीं है और न इस अनंत युद्धोन्माद से कोई रिहाई है।धम्म लापता है।
हम लोग ग्लोबीकरण की अवधारणा के तहत इस दुनिया को अपनी मुट्ठी में लेने की तकनीक के पीछे बेतहाशा भाग रहे हैं।यह वह दुनिया है जिसके पोर पोर से खून चूं रहा है।हमारी मुट्ठी में अब खून से लबालब सात समुंदर हैं।जिसमें हमारे अपनों का खून भी पल दर पल शामिल होता जा रहा है।अपनी मुट्ठी में कैद इस दुनिया की हलचल से लेकिन हम बेखबर हैं।खबरें इतनी बेहया हो गयी हैं कि उनमें विज्ञापन के जिंगल के अलावा जिंदगी की कोई धड़कन नहीं है।सच का नामोनिशां बाकी नहीं है।
1991 के बाद,पहले खाड़ी युद्ध के तुरंत बाद से पिछले पच्चीस सालों से हम अमेरिकी उपनिवेश हैं।हमें इसका कोई अहसास नहीं है।सूचना क्रांति के तिलिस्म में हम दरअसल कैद हैं और प्रायोजित पाठ के अलावा हमारा कोई अध्ययन, शोध, शिक्षा, माध्यम,विधा,लोक,लोकायत,परंपरा ,संस्कृति या साहित्य नहीं है।सबकुछ मीडिया है।
हालांकि उपनिवेश हम कोई पहलीबार नहीं बने हैं।फर्क यह है कि करीब दो सौ साल के ब्रिटिश हुकूमत का उपनिवेश बनकर इस महादेश का एकीकरण हो गया। अब अमेरिकी उपनिवेश बन जाने की वजह से गंगा उल्टी बहने लगी है।भारत विभाजन के बाद बचा खुचा भूगोल और इतिहास लहूलुहान होने लगा है और किसानों ,मेहनतकशों की दुनिया में नरसंहारी अश्वमेधी सेनाएं दौड़ रही हैं।साझा इतिहास भूगोल समाज और संस्कृति का ताना बाना बिखरने लगा है।उत्पादन प्रणाली ध्वस्त हो गयी है और औद्योगीकीकरण से जो वर्गीय ध्रूवीकरण की प्रक्रिया शुरु हो गयी थी,जो जाति व्यवस्था नये उत्पादन संबंधों की वजह से खत्म होने लगी थी,मनुस्मृति अनुशासन के बदले जो कानून का राज बहाल होने लगा था और बहुजन समाज वर्गीय ध्रूवीकरण के तहत आकार लेने लगा था,वह सबकुछ इस अमेरिकी उपनिवेश में अब खत्म है या खत्म होने को है।
ब्राह्मण धर्म जो तथागत गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति से खत्म होकर उदार हिंदुत्व में तब्दील होकर ढाई हजार साल तक इस महादेश की विविधता और बहुलता को आत्मसात करते रहा है,फिर मुक्तबाजार का ब्राह्मणधर्म है,जो भारतीय संविधान की बजाय फिर मनुस्मृति लागू करने पर आमादा है।धम्म फिर सिरे से गायब है।
एकीकरण की बजाय अब युद्धोन्माद का यह मुक्तबाजार हिंदुत्व का ब्राह्मणधर्म है और हमारी राष्ट्रीयता कारपोरेट युद्धोन्माद है।महज सत्तर साल पहले अलग हो गये इस महादेश के अलग अलग राजनितिक हिस्से परमाणु युद्ध और उससे भी भयंकर जलयुद्ध के लिए निजी देशी विदेशी कंपनियों की कारपोरेट फासिज्म के तहत एक दूसरे को खत्म करने पर आमादा हैं जबकि विभाजन के सत्तर साल के बाद भी इन तमाम हिस्सों में संपूर्ण कोई ऐसा जनसंख्या स्थानांतरण हुआ नहीं है कि इस युद्ध में सीमाओं के आरपार बहने वाली खून की नदियों में हमारा वजूद लहूलुहान हो।अकेले बांग्लादेश में दो करोड हिंदू है तो भारत में मुसलमानों की दुनियाभर में सबसे बड़ी आबादी है और कुलस मिलाकर यह महादेश कुलमिलाकर अब भी एक सांस्कृतिक अविभाज्य ईकाई है,जिसे हम तमाम लोग सिरे से नजर्ंदाज कर रहे हैं।
कलिंग युद्ध से पहले,सम्राट अशोक के बुद्धमं शरणं गच्छामि उच्चारण से पहले सारा देश कुरुक्षेत्र का महाभारत बना हुआ था।सत्ता की आम्रपाली पर कब्जा के लिए हमारे गणराज्य खंड खंड राष्ट्रवाद से लहूलुहान हो रहे थे। दो हजार साल का सफर तय करने के बाद हमने बरतानिया के उपनिवेश से रिहा होकर अखंड भारत न सही,उसी परंपरा में नया भारतवर्ष  साझा विरासत की नींव पर बना लिया है।अबभी हमारा राष्ट्रवाद अंध खंडित राष्ट्रवाद युद्धोन्मादी है।धम्म नहीं है कहीं भी।
हमारी विकास यात्रा सिर्फ तकनीकी विकास यात्रा नहीं है और न यह कोई अंतरिक्ष अभियान है।हम इतिहास के रेशम पथ पर सिंधु घाटी से लेकर अबतक लगातार इस महादेश को अमन चैन का भूगोल बनाने की कवायद में लगे रहे हैं। तथागत गौतम बुद्ध ने जो सत्य अहिंसा के धम्म के तहत इस महादेश को एक सूत्र में बांधने का उपक्रम शुरु किया था,वह सारा इतिहास अब धर्मोन्मादी युद्धोन्माद है।
आज मुक्त बाजार का कारपोरेट तंत्र मंत्र यंत्र फिर उसी युद्धोन्माद का आवाहन करके हमें चंडाशोक में तब्दील कर रहा है और हम सबके हाथों में नंगी तलवारें सौंप रहा है कि हम एक दूसरे का गला काट दें।
ब्रिटिश राज के दरम्यान अफगानिस्तान से लेकर म्यांमर,सिंगापुर,श्रीलंका से लेकर नेपाल तक हमारा भूगोल और इतिहास की साझा विरासत हमने सहेज ली। सामंती उत्पादन प्रणाली के नर्क से निकलकर हम औद्योगिक उत्पादन प्रणाली में शामिल हुए।ब्रिटिश हुक्मरान ने देश के बहुजनों को कमोबेश वे सारे अधिकार दे दिये, जिनसे मनुस्मृति की वजह से वे वंचित रहे हैं।मनुस्मृति अनुशासन के बदले कानून का राज बहाल हुआ तो नई उत्पादन प्रणाली के तहत जनमजात पेशे की मनुस्मृति अनिवार्यता खत्म हुई और शिक्षा का अधिकार सार्वजनिक हुआ।
शूद्र दासी स्त्री की मुक्ति की खिड़कियां खुल गयीं।अछूतों को सेना और पुलिस में भर्ती करके उन्हें निषिद्ध शस्त्र धारण का अधिकार मिला।तो संपत्ति और वाणिज्य के अधिकार भी मिले।मुक्तबाजार अब फिर हमसे वे सारे हकहकूक छीन रहा है।
औद्योगीकरण और शहरीकरण के मार्फत नये उत्पादन संबंधों के जरिये मेहनतकशों का वर्गीय ध्रूवीकरण एक तरफ जाति व्यवस्था के शिकंजे से भारतीय समाज को मुक्त करने लगा तो वर्गीय ध्रूवीकरण के रास्ते देश भऱ में,बल्कि पूरे महादेश में बहुजन समाज का एकीकरण होने लगा और सत्ता में भागेदारी का सिलसिला शुरु हो गया।जो अब भी जारी है।जिसे खत्म करने की हर चंद कोशिश इस युद्धोन्मादी हिंदुत्व का असल एजंडा है।
आदिवासी और किसान विद्रोह के अविराम सिलसिला जारी रहने पर जल जंगल जमीन और आजीविका के मुद्दे,शिक्षा और स्त्री मुक्ति,बुनियादी जरुरतों के तमाम मसले अनिवार्य विमर्श में शामिल हुए,जिसकी अभिव्यक्ति भारत की स्वतंत्रतता के लिए पूरे महादेश के आवाम की एकताबद्ध लड़ाई है,आजाद हिंद फौज है।सामाजिक क्रांति की दिशा में संतों के सुधार आंदोलन का सिलसिला जारी रहा तो नवजागरण के तहत सामंतवाद पर कुठाराघात होते रहे और किसान आंदोलनों के तहत मेहनतकश बहुजनों का राजनीतिक उत्थान होने लगा।
यह साझा इतिहास अब हमारी मुट्ठी में बंद सात समंदर का खून है।
हमारे दिलो दिमाग में अब मुक्तबाजार का युद्धोन्माद है।
हम आत्मध्वंस के कार्निवाल में शामिल हम कबंध नागरिक हैं और इस युद्धोन्माद के खिलाफ अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता एक दूसरे को भी देने को तैयार नहीं है।फासिज्म की पैदल सेना में तब्दील हमारी देशभक्ति का यही युद्धोन्माद है।

Dainik jugosankha 29-09-2016.

Dainik jugosankha 29-09-2016.




Wednesday, September 28, 2016

Never mourn my beloved friends if I have to collapse sooner or later! Palash Biswas

We have been uprooted from indigenous community living and have been reduced as an individual consumer in the free market economy irrespective of difference in status defined with purchasing capacity.We may buy anything but we may not purchase the lost natural roots as the Indigenous society is degenerated .
As an individual,I believe that it is always better to have a short life indulged in creative activism for the people whom we belong to.It is always better to die if we lead a destructive life irrelevant to the toiling masses creating an environment of infinite betrayal,killing each other and feeding on our own blood,our own bones,our own flesh!
Never mourn my beloved friends if I have to collapse sooner or later!
Palash Biswas

উচ্চবর্ণের মানুষেরা 1905 সালে বাংলাভাগের বিরোধিতা করল, তারাই আবার 1947 সালে বাংলাভাগের পক্ষে কেন গেল ? নিচের লেখাটা অনেকটাই দিক নির্দেশ করে বোধহয় ।।

উচ্চবর্ণের মানুষেরা 1905 সালে বাংলাভাগের বিরোধিতা করল, তারাই আবার 1947 সালে বাংলাভাগের পক্ষে কেন গেল ? নিচের লেখাটা অনেকটাই দিক নির্দেশ করে বোধহয় ।।

I personally feel no amendment solve the problem until the law itself is scrapped and we get back citizenship as partition victims under 1955 provisions prescribed by the original citizenship act without any condition at all.Legal discretion involves racist politics which would never allow our citizenship,I am afraid. NIBBUS should continue the movement! Palash Biswas

I personally feel no amendment solve the problem until the law itself is scrapped and we get back citizenship as partition victims under 1955 provisions prescribed by the original citizenship act without any condition at all.Legal discretion involves racist politics which would never allow our citizenship,I am afraid. NIBBUS should continue the movement!
Palash Biswas

Draupadi, Mahasveta



I wonder what would not be branded as sedition next! Draupadi has been performed by elegant Manipuri artists for many years and it always have been a challenge to present the story on stage.It deals with woman`s identity and existence subjected to brute patriarchal repression with racist venom under the genocide culture of the rulers.It is the infinite scream of a victim which might not be suppressed even if this governance of fascism kills our mind and heart.Every drop of the spilling blood would call for change.Let the fool have long ropes to hang themselves.

Draupadi, Mahasveta

कामरेड नियोगी लाल जोहार…. - सुदीप ठाकुर

ठीक पच्चीस वर्ष पूर्व 28 सितंबर, 1991 को छत्तीसगढ़ के मशहूर मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी को दुर्ग स्थित उनके अस्थायी निवास पर तड़के चार बजे के करीब खिड़की से निशाना बनाकर गोली मारी गई थी.
देर रात वह रायपुर से लौटे थे. महज 48 वर्ष के नियोगी सिर्फ एक ट्रेड यूनियन नेता भर नहीं थे, बल्कि एक चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता भी थे.
उनकी लड़ाई चौतरफा थी. एक ओर शराब से लेकर लोहे के धंधे से जुड़े बड़े उद्योगपतियों से वह आर्थिक समानता और श्रम की वाजिब कीमत की लड़ाई लड़ रहे थे, तो दूसरी ओर विचारधारा के स्तर पर मुख्यधारा के राजनीतिक दलों से.
एक अन्य स्तर पर वह सामाजिक बुराइयों, जातिवाद और नशाखोरी से भी लड़ रहे थे.
यह विडंबना ही है कि जब देश आर्थिक उदारीकरण की रजत जयंती मना रहा है, नियोगी की पच्चीसवीं बरसी है! क्या वह नई आर्थिक नीति के पहले शहीद थे?
नियोगी जानते थे कि उनकी लड़ाई बहुत ताकतवर लोगों से है, इसके बावजूद उस रात भी वह निहत्थे थे. जो लोग उन्हें मारना चाहते थे, वह भी जानते थे कि रात के अंधेरे में ही उन पर कायराना हमला कर गोली चलाई जा सकती है.
उनकी लड़ाई बेहद खुली थी, किसी से छिपी नहीं थी. संभवतः 1970 के दशक की शुरुआत में नियोगी जलपाईगुड़ी से छत्तीसगढ़ पहुंचे थे. यह नक्सलबाड़ी के हिंसक आंदोलन के आसपास की बात है. शुरुआत में उन्होंने संभवतः भिलाई इस्पात संयंत्र में अस्थायी नौकरी भी की थी. लेकिन बाद में उन्होंने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा बनाकर एक बड़ा मजदूर आंदोलन खड़ा कर दिया. आपातकाल के दौरान वह जेल में भी रहे.
दल्ली राजहरा माइंस को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले नियोगी ने लोहे की खदान में मजदूर के रूप में काम भी किया. छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के रूप में उन्होंने एक बड़ा श्रमिक संगठन बनाया.
वह छत्तीसगढ़ की जमीनी हकीकत से वाकिफ थे, लिहाजा एक ओर तो वह औद्योगिक और खदान मजदूरों की लड़ाई लड़ रहे थे, तो दूसरी ओर उद्योगों और खदानों के कारण अपनी जमीन से बेदखल हो रहे किसानों के संघर्ष में साथ थे.
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा आदिवासियों, किसानों और मजदूरों का संगठन था. जिन लोगों ने नियोगी की मजदूर रैलियां देखी हैं, उन्हें याद होगा कि उनके आंदोलन में महिलाओं की भी बराबर की भागीदारी होती थी. उनके आंदोलन का दर्शन इस एक नारे में समझा जा सकता है, ‘कमाने वाला खाएगा’ यानी खेत में या उद्योगों में जो काम कर रहा है, हक उसी का है.
नियोगी थे तो कम्युनिस्ट और उनके आंदोलन के दौरान गोलीकांड भी हुए, लेकिन उन्होंने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि गांधीवादी रास्ता ही विकल्प है.
उन्होंने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा को श्रमिक संगठन के साथ ही एक सामाजिक आंदोलन में भी बदलने का प्रयास किया. जिसमें नशाबंदी को लेकर चलाई गई उनकी मुहिम का असर भी देखा गया.
नियोगी ने खुद कभी चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा को राजनीतिक तौर पर खड़ा करने की कोशिश की. हालांकि छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा सिर्फ दो बार ही अपना एक विधायक विधानसभा तक पहुंचा सका.
1989 के लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने छत्तीसगढ़ के जाने माने कवि हरि ठाकुर को राजनांदगांव से उम्मीदवार बनाया था. उनके नामांकन दाखिल करने के समय नियोगी भी जिला कार्यालय में मौजूद थे. मैंने और मेरे दिवंगत चचेरे भाई और मित्र अक्षय ने नियोगी से पूछा था, दादा आप चुनाव नहीं लड़ते? नियोगी का जवाब था, नहीं रे बाबा, बड़े लोगों का काम है. पता नहीं वह खुद क्यों चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे.
बहुत संभव है कि यदि वे छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा को एक राजनीतिक दल में बदल पाते और खुद भी चुनावी राजनीति में आते तो शायद स्थिति कुछ और होती. राज्य सत्ता और उद्योगपतियों के लिए चुनौती बन गए नियोगी की लोकप्रियता को कोई खारिज नहीं कर सकता था.
उनसे हुई कुछ गिनी चुनी मुलाकातों में एक बार नियोगी ने अक्षय और मुझसे से कहा था, तुम लोगों को आंदोलन से जुड़ना चाहिए.
उनसे आखिरी मुलाकात 28 सितंबर, 1991 को हुई थी, जब वह दुनिया को छोड़ चुके थे. उस रात मैं अक्षय के साथ ही उसके घर पर था. तड़के लैंडलाइन पर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के राजनांदगांव के नेता प्रेमनारायण बाबू का फोन आया, बोले, नियोगी ला मार दिस ( नियोगी को मार दिया)! डेढ़ घंटे के भीतर ही हम तीनों दुर्ग के उनके निवास पर थे, तब तक वहां काफी लोग जमा हो चुके थे. उन दिनों अक्षय कृषक युग नामक टेबलायट अखबार निकालते थे, जिसे मेरे चाचा विद्याभूषण ठाकुर ने शुरू किया था. हमने खबर लिखी… नियोगी को मार डाला….
दल्ली राजहरा में उनकी अंतिम यात्रा में हजारों का हुजूम था. चारों और नारे लग रहे थे, लाल हरा झंडा जिंदाबाद, नियोगी भैया जिंदाबाद…मैंने आज तक कोई इतनी विशाल अंतिम यात्रा नहीं देखी है..
कामरेड नियोगी लाल जोहार….
- सुदीप ठाकुर

মাতৃভাষা-সংস্কৃতির দাবিতে অস্ত্র তুলে নিয়েছিলাম,এবার প্রয়োজনে প্রাণ দেব কলকাতা নিউজ ২৪ : 26/09/2016 দেশ বদল হলেও আমাদের ভাগ্য বদলায়নি ranjit-sarkar বাংলা ভাগ করেছো,কিন্তু বাঙালিকে ভাগ করা যায়নি , দেশ বদল হলেও আমাদের ভাগ্য বদল হয়নি আজও- নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির সম্মেলনের মঞ্চে দাঁড়িয়ে রবিবার এমনটাই বললেন উত্তরপ্রদেশের সমন্বয় সমিতির সভাপতি ডা. রবিন দাস। কলকাতার লাগোয়া দূর্গানগরের সর্বভারতীয় প্রশিক্ষণ শিবিরের এদিন ছিল শেষ দিন। অসমের প্রতিনিধি হয়ে আসা রঞ্জিত সরকার মাতৃভাষা আর সংস্কৃতির দাবিতে একদিন অস্ত্র তুলে নিয়েছিলেন। আত্বসমর্পন করে সমাজের মূল স্রোতে ফিরে এলেও আজ তাঁর দাবি পূরণ হয়নি, এবার তিনি গণ আন্দোলনের মধ্য দিয়েও প্রাণ দিতেও প্রস্তুত জানালেন দৈনিক যুগশঙ্খকে। একদা ঢাকার রঘুনাথপুরের বোয়ালিয়া গ্রাম থেকে দেশভাগের কারণে অসমের বরপেটা জেলার নেউলার ভিটা গ্রামে আশ্রয় নেন ভিটেমাটি হারা তরনী মোহন সরকার। সেদিন বিনা প্রতিরোধে এক কাপড়ে দেশ ছেড়েছিলেন তিনি। সেদিনের সেই যন্ত্রণা, উত্তরাধিকার সূত্রে পেয়েছিলেন পুত্র রঞ্জিত সরকার। নতুন দেশে এসেও উদ্বাস্তু হওয়ার যন্ত্রনাকে বিনা প্রতিরোধে মেনে নিতে না পেরে হাতে তুলে নিয়েছিলেন অস্ত্র। ভাষা-সংস্কৃতির আগ্রাসন ঠেকাতে যুক্ত হয়েছিলেন বেঙ্গল টাইগার ফোর্সে একজন এরিয়া কমান্ডার রূপে। অসমের প্রতিটি থানায় তাঁর নামে ওয়ারেন্ট ছিল। কেন অস্ত্র তুলে নিয়েছিলেন? রঞ্জিত বলেন, আশির দশকে বাঙালিদের ঘরবাড়ি জ্বালিয়ে দেওয়া শুরু হল বরপেটায়। নিরিহ বাঙালিদের ধরে নিয়ে বাংলাদেশ সীমান্তে রাতের অন্ধকারে ছেড়ে দিয়ে আসা শুরু হল। প্রতিবাদ জানাতে গিয়ে আইনজীবী বাবুললাল সরকার,গৌরাঙ্গ মন্ডল শহিদ হলেন। আমরা রক্তে আগুন জ্বলে গেল। অত্যচার সহ্যে সীমা ছাড়িয়ে গেল ১৯৯৬ সালে ২৮ জন বাঙালি যুবক নিয়ে শুরু করলাম সশস্ত্র ট্রেনিং কোকাড়ঝাড়ের জঙ্গলে। অত্যাচারিত বাঙালিরা অর্থ সাহায্য করল, কেনা হল একে ৪৭, একে ৫৬,এসএল আর রাইফেল, কার্বাইন, গ্রেনেড। বাঙালি অধ্যুষিত এলাকার যুবকরা যোগ দিল আমাদের সাথে। শুরু হল মাতৃভাষার আর সংস্কৃতি রক্ষার দাবিতে আমাদের গেরিলা যুদ্ধ। এই যুদ্ধে মারা গেছেন শতাধিক অধিক বাঙালি যোদ্ধা। বেশ কয়েকটা অপারেশনের পর ধরা পড়লাম। জেল হল,জামিন পেয়ে আবার চলে গেলাম জঙ্গলে। আত্বসর্মপন করলেন কেন? এপ্রশ্নের উত্তরে রঞ্জিত বলেন, তরুণ গোগইয়ের সরকার প্রতিশ্রুতি দিল আমাদের দাবি মানা হবে, অস্ত্র ত্যাগ করলে। ২০০৬ আগস্ট মাসে ৮ তারিখে আমরা সেনাধাক্ষ্য সুভাষ সরকারের নেতৃত্বে ৩২৫ জন আত্বসর্মপন করে অস্ত্র জমা দিলাম। দাবি পূরণ হয়নি, উলটে মামলা এখনও চলছে। দেড় লাখ টাকা দেওয়া হয়েছিল। বলা হয়েছিল কাশ্মির প্যাকেজ দেওয়া হবে তাও হয়নি। কংগ্রেস সরকার আমাদের সাথে বিশ্বাসঘাতকতা করেছে-বললেন রঞ্জিত। ক্ষোভ প্রকাশ করে তিনি বলেন, অস্ত্র জমা দিলেও, আর্দশ জমা দিইনি। শুধু অসম নয় ভারতের বুকে বাঙালিদের স্বীকৃতি দাবিতে প্রাণ দিতেও আমি রাজি। সৌজন্যে:দৈনিক যুগশঙ্খ

মাতৃভাষা-সংস্কৃতির দাবিতে অস্ত্র তুলে নিয়েছিলাম,এবার প্রয়োজনে প্রাণ দেব

কলকাতা নিউজ ২৪ : 26/09/2016
দেশ বদল হলেও আমাদের ভাগ্য বদলায়নি
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বাংলা ভাগ করেছো,কিন্তু বাঙালিকে ভাগ করা যায়নি , দেশ বদল হলেও আমাদের ভাগ্য বদল হয়নি আজও- নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির সম্মেলনের মঞ্চে দাঁড়িয়ে রবিবার এমনটাই বললেন উত্তরপ্রদেশের সমন্বয় সমিতির সভাপতি ডা. রবিন দাস।
কলকাতার লাগোয়া দূর্গানগরের সর্বভারতীয় প্রশিক্ষণ শিবিরের এদিন ছিল শেষ দিন। অসমের প্রতিনিধি হয়ে আসা রঞ্জিত সরকার মাতৃভাষা আর সংস্কৃতির দাবিতে একদিন অস্ত্র তুলে নিয়েছিলেন। আত্বসমর্পন করে সমাজের মূল স্রোতে ফিরে এলেও আজ তাঁর দাবি পূরণ হয়নি, এবার তিনি গণ আন্দোলনের মধ্য দিয়েও প্রাণ দিতেও প্রস্তুত জানালেন দৈনিক যুগশঙ্খকে।
একদা ঢাকার রঘুনাথপুরের বোয়ালিয়া গ্রাম থেকে দেশভাগের কারণে অসমের বরপেটা জেলার নেউলার ভিটা গ্রামে আশ্রয় নেন ভিটেমাটি হারা তরনী মোহন সরকার। সেদিন বিনা প্রতিরোধে এক কাপড়ে দেশ ছেড়েছিলেন তিনি। সেদিনের সেই যন্ত্রণা, উত্তরাধিকার সূত্রে পেয়েছিলেন পুত্র রঞ্জিত সরকার। নতুন দেশে এসেও উদ্বাস্তু হওয়ার যন্ত্রনাকে বিনা প্রতিরোধে মেনে নিতে না পেরে হাতে তুলে নিয়েছিলেন অস্ত্র। ভাষা-সংস্কৃতির আগ্রাসন ঠেকাতে যুক্ত হয়েছিলেন বেঙ্গল টাইগার ফোর্সে একজন এরিয়া কমান্ডার রূপে। অসমের প্রতিটি থানায় তাঁর নামে ওয়ারেন্ট ছিল।
কেন অস্ত্র তুলে নিয়েছিলেন? রঞ্জিত বলেন, আশির দশকে বাঙালিদের ঘরবাড়ি জ্বালিয়ে দেওয়া শুরু হল বরপেটায়। নিরিহ বাঙালিদের ধরে নিয়ে বাংলাদেশ সীমান্তে রাতের অন্ধকারে ছেড়ে দিয়ে আসা শুরু হল। প্রতিবাদ জানাতে গিয়ে আইনজীবী বাবুললাল সরকার,গৌরাঙ্গ মন্ডল শহিদ হলেন। আমরা রক্তে আগুন জ্বলে গেল। অত্যচার সহ্যে সীমা ছাড়িয়ে গেল ১৯৯৬ সালে ২৮ জন বাঙালি যুবক নিয়ে শুরু করলাম সশস্ত্র ট্রেনিং কোকাড়ঝাড়ের জঙ্গলে। অত্যাচারিত বাঙালিরা অর্থ সাহায্য করল, কেনা হল একে ৪৭, একে ৫৬,এসএল আর রাইফেল, কার্বাইন, গ্রেনেড। বাঙালি অধ্যুষিত এলাকার যুবকরা যোগ দিল আমাদের সাথে। শুরু হল মাতৃভাষার আর সংস্কৃতি রক্ষার দাবিতে আমাদের গেরিলা যুদ্ধ। এই যুদ্ধে মারা গেছেন শতাধিক অধিক বাঙালি যোদ্ধা। বেশ কয়েকটা অপারেশনের পর ধরা পড়লাম। জেল হল,জামিন পেয়ে আবার চলে গেলাম জঙ্গলে।
আত্বসর্মপন করলেন কেন? এপ্রশ্নের উত্তরে রঞ্জিত বলেন, তরুণ গোগইয়ের সরকার প্রতিশ্রুতি দিল আমাদের দাবি মানা হবে, অস্ত্র ত্যাগ করলে। ২০০৬ আগস্ট মাসে ৮ তারিখে আমরা সেনাধাক্ষ্য সুভাষ সরকারের নেতৃত্বে ৩২৫ জন আত্বসর্মপন করে অস্ত্র জমা দিলাম।
দাবি পূরণ হয়নি, উলটে মামলা এখনও চলছে। দেড় লাখ টাকা দেওয়া হয়েছিল। বলা হয়েছিল কাশ্মির প্যাকেজ দেওয়া হবে তাও হয়নি। কংগ্রেস সরকার আমাদের সাথে বিশ্বাসঘাতকতা করেছে-বললেন রঞ্জিত।
ক্ষোভ প্রকাশ করে তিনি বলেন, অস্ত্র জমা দিলেও, আর্দশ জমা দিইনি। শুধু অসম নয় ভারতের বুকে বাঙালিদের স্বীকৃতি দাবিতে প্রাণ দিতেও আমি রাজি।
সৌজন্যে:দৈনিক যুগশঙ্খ

২৬ সেপ্টেম্বর ২০১৬ উত্তর খন্ডের দীনেশপুরে নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্তু সমন্বয় স সমিতির আহ্বানে হাজার হাজার উদ্বাস্তুরা সাড়া দিলেন। সমন্বয় গড়ার ডাক দিলেন উদ্বাস্তু দরদী লোক কবি অসীম সরকার । উত্তর খন্ডের সমিতির কর্মীদের ধন্যবাদ জানাই। অসীম বাবুর অবদান উত্তর প্রদেশ ও উত্তর খন্ডের মানুষের মনের সর্নকোঠায় অমরহয়ে থাকবে। জয় নিখিল ভারত উদ্বাস্তু বাঙালি

২৬ সেপ্টেম্বর ২০১৬ উত্তর খন্ডের দীনেশপুরে নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্তু সমন্বয় স সমিতির আহ্বানে হাজার হাজার উদ্বাস্তুরা সাড়া দিলেন। সমন্বয় গড়ার ডাক দিলেন উদ্বাস্তু দরদী লোক কবি অসীম সরকার । উত্তর খন্ডের সমিতির কর্মীদের ধন্যবাদ জানাই। অসীম বাবুর অবদান উত্তর প্রদেশ ও উত্তর খন্ডের মানুষের মনের সর্নকোঠায় অমরহয়ে থাকবে। জয় নিখিল ভারত উদ্বাস্তু বাঙালি

Monday, September 26, 2016

আসামের মরিগাঁও বাস,1940 সালের দলিল আছে ওঁদের; 1964 সাল থেকে ভোটার| তবুও ডি-ভোটারের অভিযোগে তাঁরা সপরিবারে ডিটেনসন ক্যাম্পে!ট্রাইবুনালের চিঠি গায়েব করে, উত্তর দেবার সুযোগ না দিয়ে পুলিশ/প্রশাসন এ ভাবেই বাঙালিদের শায়েস্তা করার সুযোগ নিচ্ছে বলে অভিযোগ! মামলা সুপ্রিম কোর্টে এখন, কিন্তু তবুও কি সুবিচার মিলবে? নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্ত সমন্বয় সমিতির মঞ্চ থেকে এ প্রশ্নই ছুঁড়ে দিলেন বেণীমাধব; উত্তরটা কে দেবে? সংবিধান, গণতন্ত্র নাকি দেশভাগের নায়কেরা?

বেণীমাধবের মুখে আসামের বাঙালিদের ডি-ভোটার ট্রাজেডি শুনে হতবাক হয়ে গেলাম! দিলীপ বিশ্বাস,আসামের মরিগাঁও বাস,1940 সালের দলিল আছে ওঁদের; 1964 সাল থেকে ভোটার| তবুও ডি-ভোটারের অভিযোগে তাঁরা সপরিবারে ডিটেনসন ক্যাম্পে!ট্রাইবুনালের চিঠি গায়েব করে, উত্তর দেবার সুযোগ না দিয়ে পুলিশ/প্রশাসন এ ভাবেই বাঙালিদের শায়েস্তা করার সুযোগ নিচ্ছে বলে অভিযোগ! মামলা সুপ্রিম কোর্টে এখন, কিন্তু তবুও কি সুবিচার মিলবে? নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্ত সমন্বয় সমিতির মঞ্চ থেকে এ প্রশ্নই ছুঁড়ে দিলেন বেণীমাধব; উত্তরটা কে দেবে? সংবিধান, গণতন্ত্র নাকি দেশভাগের নায়কেরা?

विभाजनपीड़ितों की नागरिकता के लिए निखिल भारत का अभियान तेज पूर्वी बंगाल से धार्मिक उत्पीड़न के शिकार भारत आये राजनीतिक शरणार्थियों के खिलाफ रंगभेदी सफाया अभियान असम में 80 लाख विभाजन पीड़ित हिंदू शरणार्थियों की नागरिकता छीनने के लिए हिंदुत्व के राजकाज में अमानुषिक अल्फाई उत्पीड़न त्रिपुरा समेत समूचे पूर्वोत्तर में अल्फाई राजकाज का आतंक एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास हस्तक्षेप संवाददाता

विभाजनपीड़ितों की नागरिकता के लिए निखिल भारत का अभियान तेज
पूर्वी बंगाल से धार्मिक उत्पीड़न के शिकार भारत आये राजनीतिक शरणार्थियों के खिलाफ  रंगभेदी सफाया अभियान
असम में 80 लाख विभाजन पीड़ित हिंदू शरणार्थियों की नागरिकता छीनने के लिए हिंदुत्व के राजकाज में अमानुषिक अल्फाई उत्पीड़न
त्रिपुरा समेत समूचे पूर्वोत्तर में अल्फाई राजकाज का आतंक
एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
हस्तक्षेप संवाददाता
कोलकाता।पूर्वी बंगाल भारत के दो राष्ट्रों के सिद्धांत के तहत पहले पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश बना और यह विभाजन आजादी की कीमत है जो सबसे ज्यादा बंगाल और पंजाब ने पहले स्वंत्रतता संग्राम और फिर विभाजन के मध्य चुकाया।इसलिए अखंड भारत के नागरिक पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान से आने वाले लोग हर हाल में राजनैतिक शरणार्थी हैं,भुखमरी के शिकार लोग नहीं हैं।असम और पूर्वोत्तर में साठ के दशक से उनका अल्फाई सफाया अभियान जारी हुआ है और विभाजनपीड़ितों के मौजूदा अल्फाई नरसंहार अभियान का मुख्य आधार अब 2003 का काला नागरिकता संशोधन विधेयक कानून है,जिसके तहत असम में गैर असमिया सभी समुदायों के लिए.भारते के दूसरे राज्यों के लोगों के लिए भी अल्फा का एजंडा ही कानून है।
कोलकाता के उपनगर दुर्गानगर में शरणार्थियों की नागरिकता और तमाम दूसरी समस्याओं को लेकर भारत के 22 राज्यों में सक्रिय निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति का दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर संपन्न हुआ जिसमें 18 राज्यों के डेलीगेट तेलंगाना लेकर राजस्थान उत्तराखंड यूपी,और दंडकारण्य के मध्य भारत से लेकर असम और पूर्वोत्तर से आये।इस शिविर में शरणार्थी आंदलोन की समीक्षा करते हुए भविष्य के लिए चिंतन मंथन प्रशिक्षण हुआ।मीडिया पर खास चर्चा भी हुई।
इस प्रशिक्षण शिविर में शामिल असम,त्रिपुरा और पूर्वोत्तर की महिलाओं समेत पचास से ज्यादा  प्रतिनिधि ने रोंगटे खड़ा करने वाली आपबीती सुनाई है,जो किसी जनसुनवाई में सुनाने की जगह अब भारतीय संविधान और कानून असम और पूर्वोत्तर में कहीं भी लागू न होने और अखंड केसरिया अल्फाई राज की वजह से असंभव है।जहां अल्फा के एजंडे के मुताबिक सिर्फ शरणार्थी ही नहीं,भारत के दूसरे राज्यों से गये लोगों के खिलाफ दंगा फसाद,खून खराबा,आगजनी जैसी वारदातें साठके दशक से जारी है तो अब पूर्वी बंगाल के धथार्मिक उत्पीड़न की वजह से आने वाले राजनीतिक शरणार्थियों के सफाये का नरसंहार अभियान चालू है।निखिल भारत समव्य समिति ने यह सिलसिला हमेशा के लिए बंद करने का ऐलान इस शिविर में किया है।
असम से आये शरणार्थी नेता वेनीमाधव की अगुवाई में प्रतिनिधियों ने सवाल किया है कि असम में केंद्र की सत्ता में शामिल भाजपा की सरकार है जो हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा करते अघा नहीं रहा है तो असम में उन्हींके राजकाज में अल्फाई सफाया अभियान और हिटलर के तानाशाही यातना शिविर कैसा हिंदुत्व है।   
पूर्वी बंगाल से आने वाले इन राजनीतिक शरणार्थियों से विभाजन के बाद से लेकर अब तक भुखमरी के शिकार लोगों के साथ की जाने वाली कृपा और उपेक्षा का आचरण करती रही जिन्हें राजनीतिक विभाजन और बांग्लादेश बनने के बावजूद लगातार धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होते रहने से अब भी भारत आना पड़ रहा है।इन लोगों के साथ राजनीतिक दलों और सरकारों का भेदभाव विशुध रंगभेद है,जो सीधे तौर पर असम में रंगभेदी सफाया अभियान में तब्दील है।
2014 में लोकसभा चुनाव और हाल में हुए विधानसभा चुनावों में बंगाल, असम और पूरे पूर्वोत्तर में सर्वत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी,गृहमंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा नेताओं के अलावा असम के मौजूदा मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल और 80 के दशक के आसू अल्फा नेता तक हिंदुत्व के नाम पर वोटबैंक के ध्रूवीकरण के लिए हाल में आये बांग्लादेश के सभी हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा करते रहे हैं।
बहरहाल बंगाल समेत देशभर के करीब दस करोड़ विभाजनपीड़ित हिंदू शरणार्थियों को वोटबैंक बनाने की गरज से पूर्वी बंगाल से आने वाले हिंदू शरणार्थियों की नागरिकता के लिए लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 भी केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पेश किया है,जिसे संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया है।
असम के भाजपा राज में विभाजनपीड़ित अस्सी लाख शरणार्थियों के खिलाफ जारी अल्फाई सफाये अभियान से उऩके राजनीतिक कवायद का मतलब साफ जाहिर है,जिसे बंगाल में लोग भले ना समझें,दूसरे राज्यों में भी हो सकता है न समझें,असम और त्रिपुरा समेत पूर्वोत्तर के विभाजनपीड़ित हिंदू  शरणार्थी साठ के दशक से अब तक भोगे हुए यथार्थ और ताजा अल्फाई अभियान से खूब समझ रहे हैं और इसबार कोलकाता में आकर दूसरे राज्यों के शरणार्थियों को भी खूब समझा गये हैं।
अगर नागरिकता संशोधन कानून पास करानेके वायदे से भाजपा मुकरी तो शरणार्थियों में उसकी रही सही साख भी अब खत्म होने वाली है।
गौरतलब है कि इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के राजकाज के दौरान तत्कालीन गृहंमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के 2003 में बनाये नये नागरिकता कानून में पश्चिम पाकिस्तान से अबभी  आने वाले शरणार्थियों की नागरिकता सुनिश्चित के लिए पांच से अधिक बार संशोधन किये गये हैं और जब पूर्वी बंगाल के विबाजन पीड़ितों की नागरिकता देने के लिए एक विधेयक लोकसभा में पेश हुआ भी तो सारे राजनीतिक दल उसे हर हाल में खटाई में डालने के लिए उसी तरह लामबंद है जैसे लोकसभा और विधानसभाओं के महिला आरक्षण के खिलाफ अनंत मोरचाबंदी है।
दूसरी तरफ,असम में बाकायद यहूदियों के लिए बने हिटलर के गैस चैंबर की तरह पूर्वीबंगाल के हिंदू शरणार्थियों को डीटेंसन कैंप में रखने का सिलसिला जारी है।हाल में आनेवाले लोगों की नागरकिता तो भूल ही जायें,जिनको दरअसल वर्क परमिट देकर बंधुआ मजूर बनाने के लिए बांग्लादेशी वैध शरणार्थी का दर्जा देने की तैयारी है ताकि बाद में सरकार बदल जाने पर उनके बांग्लादेशी होने के हलफनामे का इस्तेमाल उन्हें या तो सीमापार खडदेड़ने के लिए या फिर हिटलरी कैंपों में उनके सफाये के लिए किया जा सकें।
असम में संघ परिवार का अल्फाई राजकाज नागरिकता देने के केसरिया वादे के विपरीत हिंदू बंगाली विभाजनपीड़ित धार्मिक उत्त्पीड़न के शिकार राजनीतिक शरणार्थियों का भयंकर उत्पीड़न शुरु कर दिया है और असम समझौते में तय 1971 के आधार वर्ष के बदले अल्फाई राष्ट्रवाद के मुताबिक असम में सौ फीसद आरक्षण मूलनिवासियों को करने के अभियान के तहत गैर असमिया बंगाल, बिहारी, मारवाड़ी, पंजाबी,मुसलमानों समेत तमाम गैरअसमिया समुदायों के सफाये के लिए उल्फा के तय1951 के आधारवर्ष को लागू करके उसके बाद असम में आये भारत के दूसरे राज्यों से आये लोगों के साथ पूर्वी बंगाल के विभाजनपीड़ितों के सफाये का फासिस्ट अभियान शुरु कर दिया है। जिसे शायद कतेंद्र सरकार की हररी झंडी भी है।

১৮ লাখ মানুষ কোন জল পাচ্ছে না ৪ দিন ধরে।

Priyasmita Dasgupta
১৮ লাখ মানুষ কোন জল পাচ্ছে না ৪ দিন ধরে।
সিরিয়ার আলেপ্পোতে বোমা পড়েছে। প্রায় ১৮ লাখ মানুষের জলের যোগান বন্ধ। যুদ্ধবিরতি শেষ। আবার চেনা চেনা ছবি। মাথায় ব্যান্ডেজ নিয়ে বসা ২ বছরের মেয়েটা, দুটো চোখই গেছে, দুদিন পর হয়ত জীবনটাও যাবে। বুলেটে ঝাঁঝরা হয়ে যাওয়া ৫বছরের ছেলেটাকে বুকে চেপে ধরে আছে বাবা। চারদিকে ধ্বংসস্তূপের মধ্যে দিয়ে বাচ্চা মেয়েটার হাত ধরে হেঁটে যাচ্ছে মা। জানেনা কখন বোম আছড়ে পড়বে উপর থেকে।
আলেপ্পোয় বোমা পড়ার পর বৃহস্পতিবার থেকে যতগুলো লাশ পাওয়া গেছে, হিসেব বলছে তার অর্ধেকের বেশি শিশুদের লাশ।
এখন জলের ট্যাঙ্ক লক্ষ্য করে বোমা পড়ে, কদিন পর স্কুল লক্ষ্য করে পড়বে।
তিলতিল করে মারা যাবে মানুষ। রক্ত বেরোবেনা, বোমা ফেলতে লাগবেনা রোজ রোজ, মহামারী ছড়াবে, তিল তিল করে মারা যাবে সিরিয়া। তিলতিল করে মারা যাবে পৃথিবী।
অপেক্ষা করে বসে আছি, ঘরের কাছে এরম দিন দ্যাখার জন্য...

ভারত জুড়ে উদ্বাস্তুদের অধিকারের দাবিতে ঐক্যবদ্ধ আন্দোলনের ডাক

আজ সকালেই সবার আগে কলকাতা নিউজ দেখলাম.বাংলাদেশের মুখাপেক্ষী থাকতে হয় আমাদের বাঙালির খবর জানার জন্য,বাংলা ভাষা ও বাংলা সংস্কৃতির আপড়েট্স জানতে.সেই প্রতীক্ষার অবসান বোধ হয় হল.উদ্বাস্তু বাংলা সারা পৃথীবী জুড়ে যার বিস্তার,তার জীবন জীবিকার দিনলিপি হয়ে উঠলে কোলকাতা নিউজ এই বন্চিত আন্তর্জাতিক বাস্তুহারাদের মুক্তির দিশারি হয়ে উঠবে,এই প্রত্যাশা রইল.আজ ফারাক্কায নিখিল ভারতের ডাকে যাচ্ছি,হাতে অনেক কাজ.তাই বিস্তারিত আর লিখছি না.এই অসম্ভব ভালো কাজের জন্য অভিনন্দন.
পলাশ বিশ্বাস

ভারত জুড়ে উদ্বাস্তুদের অধিকারের দাবিতে ঐক্যবদ্ধ আন্দোলনের ডাক

কলকাতা নিউজ ২৪ : 25/09/2016
udbastu
অসমে নাগরিকত্ত আইনের নামে সন্ত্রাস ৮০ লাখ বাঙালির রাতের ঘুম কেড়ে নিয়েছে
দেশভাগের উনসত্তর বছর পরেও তৎকালীন পূর্ব পাকিস্তান,পরবর্তিতে বাংলাদেশ থেকে ভিটে হারা উদ্বাস্তুদের জমির অধিকার, মাতৃভাষায় শিক্ষার অধিকার, নাগরিকত্ত সহ নানা সমস্যার সমাধান আজও হয়নি,উলটে অসমে নাগরিকত্ত আইনের নামে সন্ত্রাস ৮০ লাখ বাঙালির রাতের ঘুম কেড়ে নিয়েছে এমনটাই দাবি করলেন নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির সর্বভারতীয় সভাপতি ডা. সুবোধ বিশ্বাস।
শনিবার কলকাতার লাগোয়া দূর্গানগরে শুরু হয়েছে ভারতের সর্ববৃহৎ উদ্বাস্তু সংগটনটির দুইদিন ব্যাপি কর্মী প্রশিক্ষণ শিবির। পশ্চিমবঙ্গ,অসম,ত্রিপুরা সহ আঠারো (১৮) টি রাজ্যের প্রতিনিধিরা এই শিবিরে অংশ নিয়েছেন। শিবিরে উদ্বাস্তুদের বিভিন্ন সমস্যা ও তার প্রতিকার নিয়ে কিভাবে আন্দোলন গড়ে তোলা হবে তা নিয়ে প্রশিক্ষণ দেওয়া হয় আগত প্রতিনিধিদের। এর পাশাপাশি সংবাদমাধ্যম ও সামাজিক মাধ্যমকে হাতিয়ার করে কিভাবে উদ্বাস্তুদের দাবিগুলি তুলে ধরা হবে তা নিয়ে আলোচনা হয়।
এই সভাগুলিতে আলোচকরূপে উপস্থিত ছিলেন, সাংবাদিক পূর্ণেন্দু চক্রবর্তী, সুপ্রীমকোর্টে আইনজীবি অম্বিকা রায়,ওড়িশ্যার মালকানগিরি প্রাক্তন বিধায়ক নিমাই সরকার, কলকাতা বিশ্ববিদ্যালয়ের প্রাক্তন রেজিস্টার নিতিশ বিশ্বাস, অল ইন্ডিয়া কোর্ডিনেশন কমিটি অফ বুদ্ধিষ্ট অর্গানাইজেশনের আশারাম গৌতম, ড.বিরাট বৈরাগ্য, ভারতীয় শুল্ক দফতরের প্রাক্তন কমিশনার অমল বিশ্বাস, বিরাজ মিস্ত্রী, সাহিত্যিক কপিলকৃষ্ণ ঠাকুর প্রমুখ।
এদিন ডা.সুবোধ বিশ্বাস বলেন, বর্তমানে ভারত জুড়ে প্রায় ৪ কোটি উদ্বাস্তু বাঙালি আছেন। এরমধ্যে পশ্চিমবংলার বাইরে পুর্ণবাসনের কথা বলে পাঠানো হয়েছে দন্ডকারণে, অসমে, ছত্রিসগড়ে সহ ভারতের বিভিন্ন স্থানে ২ কোটি বাঙালিকে। তাদের বসবাসের জন্য ভূমি দেওয়া হলেও জমির মালিকানা পাট্টা দেওয়া হয়নি। সেজন্য এরা কোন সরকারি অনুদান বা সুযোগ সুবিধা পান না। এর কারণে এরা অর্থনৈতিক ভাবে দেউলিয়া হয়ে পড়েছেন। এরা অধিকাংশই তপশীলি জাতির হওয়া সত্তেও সাংবিধানিক অধিকার থেকে বঞ্চিত। মাতৃভাষায় শিক্ষার অধিকার মতো, মৌলিক অধিকার থেকেও বঞ্চিত। তাদের জোর করে হিন্দি ভাষা শিখতে বাধ্য করা হচ্ছে। ফলে তারা বাঙালি সংস্কৃতি হারিয়ে ফেলছে। যদি এভাবে চলতে থাকে তাহলে আমরা বাঙালিদের জাতি হিসাবে নিজেদের হারিয়ে ফেলব।
তিনি বলেন, অসমে নাগরিকত্ত আইনের নামে সন্ত্রাস ৮০ লাখ বাঙালির রাতের ঘুম কেড়ে নিয়েছে। নাগরিকত্ত আইনের অজুহাতে বাঙলিদের ডিটেনশান ক্যাম্পে নিয়ে যাওয়া হচ্ছে। ৪ বছরের শিশু কল্পনা বিশ্বাস ক্যাম্পে নারকীয় সন্ত্রাস ভোগ করছে। এনআরসি আইনের আওয়তায় ৪০ লাখ বাঙালি উদ্বাস্ত বেঘর হয়ে পড়বে। দুঃখের বিষয় পশ্চিমবঙ্গের বাইরে বাঙালি উদ্বাস্তুদের এই যন্ত্রণা নিয়ে কলকাতার বুদ্ধিজীবিদের কোন হেলদোল নেই। অসমের উদ্বাস্তু বাঙালিদের ভার কিন্তু এরাজ্যের মানুষকে বহন করতে হবে যদি এখনই এর কোন প্রতিকার না হয়। অসমে যখন বিহারিরা আক্রান্ত হয় তখন মায়াবতি,লালুপ্রসাদরা ছুটে যান কিন্তু এরাজ্যের বাঙালি রাজনৈতিক নেতাদের সেই দায় নেই কেন?
তিনি আরও বলেন, এরাজ্যেকে নাম পরিবর্তন করে বাংলা করার উদ্যোগ নেওয়া হচ্ছে। তাকে আমরা স্বাগত জানিয়ে বলতে চাই, নাম পরিবর্তন দরকার তার পাশাপাশি দরকার ভারতের বিভিন্ন প্রান্তের বাঙালিদের রক্ষা করার ইচ্ছাও। এনিয়ে আমরা আন্দোলন করছিলাম এতদিন এবার বাংলার বুকে এ আন্দোলন শুরু করার জন্যই আমাদের এই প্রশিক্ষণ শিবির।
সৌজন্যে: যুগশঙ্খ

Friday, September 23, 2016

Thus, RAFALE deal struck!Thanks to Kashmir! Palash Biswas

Thus, RAFALE deal struck!Thanks to Kashmir!
Palash Biswas


It is unprecedented war campaign making in public opinion at home as well as worldwide for yet another Indo Pak clash in the border. It reminds the pattern of war campaign launched by Bush War Machine activated in United States of America as the corporate media worldwide campaign to build up a false resistance against so called weapons of mass destruction in Iraq to launch the war against the middle east to capture oilfields and resultant in Taliban to ISIS which made entire middle East And Africa subjected to American Spring.
Having signed nuclear deal with India,Bush injected the American Spring in Indian psyche to make Indian ocean peace zone a burning oil field for the survival of US War Economy in turmoil with the burns of wars since Vietnam and which have to be continued at any cost to bring home the dead soldiers and marines or those live dead humanity inflicted with personality disorder.
This war cry is being presented as a consumer product with strategic marketing in media and social media as the offspring of neoliberal reforms divested the unity and integrity of Indian nation, its democracy, its natural and human resources along with everything public including defence and internal security just to serve the interests of the desi videsi companies selling the weapons of mass destruction and we have been subjected to radioactive environment as nuclear plants have become viral in our veins so dangerously.This blind nationalism happens to be most antinational in this sense.
This war cry all on the name of false patriotism is nothing but simple business interests with huge stakes by those praivate companies around the world in the wide open Indian Weapon market.
Unfortunately,Indian people,specifically the people in Kashmir vally,a different demography with majority Muslim population  have to be the victims as well as those human beings across the borders who would be sacrificed in border clash which might well be resolved with diplomatic bilateral exercise.
Those vomiting venom against humanity and nature have not to pay anything,the taxpayers have to pay the bill of commission to be paid as it has been the story of all defence purchase.Millions of people around this geopolitics have to be desettled yet again as the partition holocaust continues. Specifically those,who have to lose their sons converted into martyrs.
No conscience seems to relevant as it was not there anywhere to skip the war in the oilfields and the media misled the humanity.

Media reports:
Rafale fighters are 4.5 generation jets and with the deal for 36 aircraft being signed today, the Indian Air Force's (IAF) combat power will be enhanced significantly. The Rafale fighter jet is equipped to carry out both air-to-ground strikes, as well as air-to-air attacks and interceptions during the same sortie. 

Rafale is an "omni-role" aircraft, with a full-range of advanced weapons such as Meteor Beyond-Visual-Range (BVR) missile, SCALP long-range missile, helmet mount system, AESA (Active Electronically Scanned Array) radar and latest warfare systems.

Dassault Aviation says that the aircraft has the ability to track targets and generate real time three-dimensional maps. It has a wing span of 10.90m; length of 15.30m; and a height of 5.30m.

The digital 'Fly-by-Wire' Flight Control System is aimed at providing longitudinal stability. But, more than anything else, it is the missiles that are integrated on the Rafale that add to the IAF's firepower.

निखिल भारत बांगली उद्वस्तु समन्वय समिति के तत्वाधान में दिनेशपुर नगर में विश्व विख्यात कवि श्री असीम सरकार जी के द्वारा एक विशाल कवी गान का आयोजन किया गया। जिसमें नगर तथा आस पास से आये हज़ारो लोगो ने कार्यक्रम का आनंद उठाया ।

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Thursday, September 22, 2016

Citizenship Amendment Bill,2016 moves to Joint Parliamentary Committee,your suggestions invited!You may present your point of view, notification issued by Loksabha secretoriate. Suggestions for individuals and organizations invited.The bill is uploaded on Loksabha website as follows:

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Wednesday, September 21, 2016

भारतीय रेल के लाइफ लाइन वजूद पर सवालिया निशान पलाश विश्वास

भारतीय रेल के लाइफ लाइन वजूद पर सवालिया निशान
पलाश विश्वास
indian railway के लिए चित्र परिणाम
रेल बजट का अवसान नवउदारवादी अर्थशास्त्री विवेक देवराय की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति की सिफारिश के मुताबिक हुआ है।देवराय नीति आयोग के सदस्य हैं।वे सिंगुर नंदीग्राम प्रकरण में वाम सरकार के खास सलाहकार थे,जिन्होंने डा.अशोक मित्र के सामाजिक अर्थशास्त्र से वामदलों के संबंध तड़ने में बड़ी भूमिका निभाई और बाकी इतिहास सबको मालूम है।हालांकि मीडिया के मुताबिक यह अर्थ व्यवस्था में सुधार की दिशा में  बहुत बड़ी छलांग है।

होगाो,इसमें दो राय नहीं।ब्रिटिश हुकूमत के बाद आजाद भारत में भी भारतीय रेल की देश की अर्थव्यवस्था में भारी योगदान रहा है और अर्थव्वस्था का समारा ढांचा ही भारतीय रेल से नत्थी रहा है।उसे तोड़कर कार्पोरेट अर्थव्यवस्था किसी राकेट की तरह हो सकता है कि हमें मंगल या शनिग्रह में बसा दें। लेकिन इसका कुल मतलब यह हुआ कि रेल अब सार्वजनिक परिवहन या देश की लाइफ लाइन या अर्थ व्यवस्था का बुनियादी ढांचा जैसा कोई वजूद भारतीय रेल का बिल्कुल नहीं रहने वाला है।

शिक्षा, चिकित्सा, ऊर्जा, बैंकिंग, बीमा,भोजन,पेयजल,आपूर्ति,सार्वजनिक निर्माण के निजीकरण के बाद भारतीय रेलवे के निजीकरण की दिशा में यह बहुत बड़ी छलांग है।

गौरतलब है कि 1923 में ब्रिटिश हुकूमत के अंतर्गत रेल बोर्ड के नये सिरे से गठन के साथ अलग रेल बजट की सिफारिश विलियम मिशेल ऐकओवार्थ कमिटी ने की थी। जिसके तहत 1924 से बजट के अलावा अलग रेल बजट का सिलसिला शुरु हुआ जो बहुत अरसे से मूल बजट से कहीं बड़ा हुआ करता था।

आजाद भारत में बजट भारी बना शुरु हुआ और बेतहाशा बढ़ते रक्षा खर्च,सड़क परिवहन, ईंधन व्यय और संरचना व्यय के मुकाबले भारतीय रेल के लिए अब बजट का कुल चार प्रतिशत ही खर्च हो पाता है।जबकि शुरुआत में भारतीय अर्थव्यवस्था भारतयी रेल को केंद्रित रही है और लंबे अरसे तक बजट का 75 से 80 फीसद भारतीय रेलवे पर खर्च होता रहा है,जो अब चार फीसद तक सिमट गया है।

अब भारतीय अर्थव्यवस्था कमसकम रेलवे पर निर्भर नहीं है।कच्चे माल की ढुलाई और सार्वजनिक परिवहने के सड़क परिवहन के विकल्प का हाईवे संस्कृति में बहुत विकास होता रहा है तो आम जनता की आवाजाही की,उनके रोजमर्रे की जिंदगी और आजीविका के सिलसिले में रेलवे की भूमिका 1991 से लगातार खत्म होती जा रही है और सार्वजनिक उपक्रम की बजाय रेलवे अब किसी कारपोरेट कंपनी की तरह मुनाफा वसूली का उपक्रम बनता रहा है। जिसका लोक कल्याण या देश की लाइफ लाइन के कोई नाता नहीं रह गया है।उसके नाभि नाल का संबंध भारतीय जनगण से नहीं, बल्कि शेचर बाजार में दांव पर रखे कारिपोरेट हितों के साथ है।

वैसे भी भारतीय संसद की नीति निर्माण में कोई निर्णायक भूमिका  रह नहीं गयी है और नवउदारवाद की वातानुकूलित संतानें कारपोरेट हितों के मुताबिक विशेषज्ञ कमिटियों के मार्फत नीतियां तय कर देती हैं और भारत सरकार सीधे उसे लागू कर देती है,जिसमें संसद की कोई भूमिका होती नहीं है।

रेल बजट के खात्मे के साथ सुधार का संबंध यही है कि रेलवे को सीधे बाजार के कारपोरेट हितों से जोड़ दिया जाये और मनाफावसूली भी किसी कारपोरेट कंपनी की तरह हो।रेलवे पर जनता के सारे हक हकूक एक झटके से खत्म कर दिये जायें।

रेल सेवाओं के लगातार हो रहे अप्रत्यक्ष निजीकरण की वजह से इस मुनाफ वसूली में कारपोरेट हिस्सेदारी बहुत बड़ी है।रेलवे के उस मुनाफे से देश की आम जनता को कोई लेना देना उसी तरह नहीं होने वाला है,जैसे मौजूदा भारतीय रेल का आम जनता के हितों से उतना ही लेना देना है,जितना किसी नागरिक की क्रय क्षमता से है।आम जनता की आवाजाही या देश जोड़ने के लिए नहीं,जो जितना खर्च कर सके,भारतीय रेल की सेवा आम जनता के लिए उतनी तक सीमित होती जा रही है।

जाहिर है कि भारतीय रेल में गरीबों के लिए अब कोई जगह उसी तरह नहीं बची है जैसे आम जनता के लिए चमकदार वातानुकूलित तेज गति की ट्रेनों में उनके लिए जनरल डब्बे भी नहीं होते।कुल मिलाकर,गरीबों के लिए रेलवे हवाी यात्रा की जैसी मुश्किल और खर्चीली होती जा रही है।अब संसद से भी रेल का नाता टूट गया है।

इस देश की गरीब आम जनता की लाइफ लाइन बतौर जिसतरह भारतीय रेल का इतिहास रहा है,वह सारा किस्सा खत्म है।अब भारतीय रेल स्मार्ट, बुलेट, राजधानी, दुरंतो, शताब्दी या पैलेस आन व्हील जैसा कुछ है,जो लोहारदगा रेलगाड़ी,कोंकन रेलवे जैसी मीठी यादों कोसिरे से दफन करने लगी है।

कारपोरेट बंदोबस्त करते हुए रेलवे के अभूतपूर्व  व्तार और विकास के मुकाबले रेल कर्मचारियों की संख्या सत्रह लाख से घटते घटते बहुत तेजी से दस लाख तक सिमट जाने वाली है और इसे अंततः चार लाख तक कर देने की योजना है।रेलबजट के बहाने भारतीय संसद में जो भारतीय रेल की दशा दिशा पर बहसें होती रही हैं और कुछ हद तक जनसुनवाई जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के जरिये कमोबेश होती  रही है,वह सिलसिला जाहिर है कि अब बंद है।

भारतीय रेल पर रेल बजट के अवसान के बाद संसद में या सड़क पर किसी सार्वजनिक बहस की फिर कोई गुंजाइश रही नहीं है।

Monday, September 19, 2016

Gujarat : The dead body of AYYUB asks quesitions. Gujarat Model : pathetic, Obnoxious and disasterous

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