Wednesday, September 13, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श-23 संविधान बदलकर मनुस्मृति बहाली के हिंदुत्व के एजंडे के खिलाफ आदिवासी किसानों के प्रतिरोध की विरासत में रवींद्र रचनाधर्मिता! रवींद्र उस भारतवर्ष के प्रतीक है कारपोरेट डिजिटल इंडिया का नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व जिसकी रोज हत्या कर रहा है। ब्रह्म समाज आंदोलन और औपनिवेशिक ब्रिटिश राज से भी पहले पठान मुगल इस्लामी राजकाज के दौरान समाज सुधार आंदोलनों नवजागरण की चर्चा खूब होती रही है लेकिन जाति तोड़ो अस्मिता तोड़ो के एकीकरण के बहुजन आंदोलन,आदिवासी किसान जनविद्रोहों के सिलिसिले में बाउल फकीर आंदोलन और लालन फकीर कंगाल हरिनाथ की युगलबंदी के रवींद्र संगीत के दलित विमर्श पर चर्चा कभी नहीं हुई है। बहुजनों के असल नवजागरण के हिंदुत्वकरण के इसी धतकरम से नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व के नस्ली राष्ट्रवाद का जन्म औद्योगिक उत्पादन प्रणाली और ब्रिटिश राज में बहुजनों को मिले हकहकूक की वजह से टूटती जाति व्यवस्था आधारित मनुस्मृति प्रणाली की बहाली के लिए हुआ।इसे समझे बिना नरसंहारी कारपोरेट फासिज्म का प्रतिरोध मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। पलाश विश्वास

रवींद्र का दलित विमर्श-23
संविधान बदलकर मनुस्मृति बहाली के हिंदुत्व के एजंडे के खिलाफ आदिवासी किसानों के प्रतिरोध की विरासत में रवींद्र रचनाधर्मिता!
रवींद्र उस भारतवर्ष के प्रतीक है कारपोरेट डिजिटल इंडिया का नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व जिसकी रोज हत्या कर रहा है।
ब्रह्म समाज आंदोलन और औपनिवेशिक ब्रिटिश राज से भी पहले पठान मुगल इस्लामी राजकाज के दौरान समाज सुधार आंदोलनों  नवजागरण की चर्चा खूब होती रही है लेकिन जाति तोड़ो अस्मिता तोड़ो के एकीकरण के बहुजन आंदोलन,आदिवासी किसान जनविद्रोहों के सिलिसिले में बाउल फकीर आंदोलन और लालन फकीर कंगाल हरिनाथ की युगलबंदी के रवींद्र संगीत के दलित विमर्श पर चर्चा कभी नहीं हुई है।
बहुजनों के असल नवजागरण के हिंदुत्वकरण के इसी धतकरम से नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व के नस्ली राष्ट्रवाद का जन्म औद्योगिक उत्पादन प्रणाली और ब्रिटिश राज में बहुजनों को मिले हकहकूक की वजह से टूटती जाति व्यवस्था आधारित मनुस्मृति प्रणाली की बहाली के लिए हुआ।इसे समझे बिना नरसंहारी कारपोरेट फासिज्म का प्रतिरोध मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

पलाश विश्वास

कापीराइट मुक्त रवीद्रनाथ अब मुक्त बाजार के आइकन में तब्दील हैं।उनके वाणिज्यिक विपणन से उसी नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व के राष्ट्रवाद को मजबूत किया जा रहा है जिसका रवींद्रनाथ आजीवन विरोध करते रहे हैं।
चर्यापद के बाद आठवीें सदी से लेकर ग्यारवीं सदी के इतिहास में भारत भर में शूद्रों आदिवासियों दलितों के इतिहास पर जिस तरह कोई चर्चा नहीं हुई है,जिस तरह परातत्व अनुसंधान और इतिहास पर वर्ग वर्ण वर्चस्व की वजह से हड़प्पा सिंधु सभ्यता और अनार्य द्रविड़ सभ्यता की निरंतरता और उसे जुड़ी आम भारतीयों की रक्तधारा के विलय के इतिहास को लगातार दबाया जाता रहा है,जिस तरह शासक वर्ग के इतिहास और साहित्य से किसान,आदिवासी और दलित शूद्र बहुजन सिरे से गायब हैं,उसी तरह भारत में आदिवासी किसानों के इतिहास को मिटाने का कार्यक्रम फासिज्म के सैन्य राष्ट्रवाद का एजंडा है और इसी एजंडे के तहत रवींद्र का भगवाकरण है तो रवींद्र के साहित्य के किसान आदिवासी दलित शूद्र आंदोलन,मेहनतकशों के हक हकूक,जल जंगल जमीन के प्रतिरोध संघर्षों  की जमीन और रवींद्र के दलित विमर्श पर चर्चा निषिद्ध है।
इसीलिए दलितों,शूद्रों,स्त्रियों,बहुजनों,अल्पसंख्यकों,मेहनतकशों,किसानों और उत्पीड़न अत्याचार के खिलाफ समानता और न्याय के लिए सामंतवाद, साम्राज्यवाद, पूंजीवाद,ब्राह्मणवाद,मनुस्मृति व्यवस्था और नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के खिलाफ रवींद्र के आजीवन प्रतिबद्ध संघर्ष पर विमर्श का कोई स्पेस नहीं बना है।
साहित्य,संस्कृति,माध्यमों में सत्ता वर्ग के एकाधिकार के लिए हमें रवींद्र के  दलित विमर्श पर संवाद की यह कोशिश इसीलिए सोशल मीडिया पर करनी पड़ रही है और तकनीक के जरिये इस वर्चस्ववाद के खिलाफ लड़ना पड़ रहा है।
अब अंदाजा लगाइये कि सत्ता वर्ग के निरंकुश वर्चस्व के खिलाफ मनुस्मृति के तहत सारे हकहकूक से वंचित बहुसंख्य बहुजन जन गण के लिए एक मुस्त दैवी सत्ता और राजसत्ता का विरोध कितना कठिन रहा होगा।
कंगाल हरिनाथ और लालन फकीर की युगलबंदी से नील विद्रोह के समय ब्रहमसमाज और नवजागरण आंदोलन के दौरान बंगाल में किसानों और आदिवासियों के बहुजन आंदोलन और जनविद्रोहों की जमीन पर जो सक्रिय रचनाधर्मिता थी,उसके पीछे कोई तकनीक नहीं थी,जिसके तहत अगर कोई अकेला व्यक्ति भी साहस विवेक और जीजिविषा के साथ फासिज्म की निरंकुश सत्ता के खिलाफ रीढ़ सीधी करके वैसा ही उपक्रम करें तो सत्ता के वर्म वर्ग वर्चस्व की चूलें हिल जाये।
विडंबना यह है कि तकनीक का सत्ता वर्ग के हित में इस्तेमाल कर रहे हैं जूता व्यवस्था और गुलामगिरि की बहुजन सेनाएं और उनके मानस और विवेक का सिरे से भगवाकरण हो गया है जो आजादी से पहले कभी नहीं हुआ था।
रवींद्र च्रचा में गुरुदेव रवींद्रनाथ,भारतीय तपवन, वैदिकी साहित्य, उपनिषद ऋषिक्लप रवींद्रनाथ की आड़ में रवींद्र साहित्य में महाकवि कीट्स के शब्दों में वर्णित इगोस्टिक सब्लाइम और नेगेटिव कैपेबिलिटि के विलयन की प्रक्रिया को सिरे से नजरअंदाज किया जाता है,जो रवींद्र का समूचा जीवन वृत्तांत है।
अहम् और एकात्मता,व्यक्ति और समाज,व्यक्ति और परंपरा,व्यक्ति और समाज,समाज और इतिहास के सारे रंग और आयाम सत्ता वर्ग की व्याकरण विशुद्धता के कुलीन सौंदर्यबोध की वजह से साहित्य और संस्कृति के विमर्श से बाहर है और इसमें बोलियों,लोक और जनपदों के साथ साथ अस्पृश्यता के सिद्धांत के तहत आम जनता का पूरीतरह बहिस्कार है।
इसी वजह से शुरु से आखिर तक देश दुनिया के परिदृश्य में रवींद्र नाथ व्यक्ति और कवि की हैसियत से जिसतरह राजनैतिक आर्थिक सामाजिक समता औलर न्याय के लिए,औपनिवेशिक शासन की पराधीनता से भारतीय जनगण की स्वतंत्रता के लिए रचनात्मक तौर पर निरंतर सक्रिय रहे,जिसतर साम्राज्यवाद विरोधी,फासीवाद विरोधी युद्धविरोधी वैश्विक महासंग्राम में महात्मा गौतम बुद्ध के पंचशील के तहत राष्ट्रनेताओं और विश्वनेताओं के साथ साथ दुनियाभर के चितकों,बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों के साथ मोर्चाबंद रहे हैं,यह लोकसंस्कृति और बाउल फकीर सूफी संत वैष्णव गुरु परंपरा में उनकी जड़ें होने की वजह से है।
इन्हीं जड़ों को कोजने के सिलसिले में हम एक तरफ आदिवासी किसान आंदोलनों की विरासत की जांच पड़ताल कर रहे हैं,तो बहुजनों के नवजागरण की लोकसंस्कृति की साझा विरासत पर निरंतर फोकस बनाये हुए हैं और संदर्भ और प्रसंग की प्रासंगिकता के लिए समसामयिक मुद्दों और समस्याओं पर जनप्रतिरोध की जनपदीय लोकसंस्कृति की रोशनी में च्रचा भी कर रहे हैं।
लालन फकीर के बाद इसी सिलसिले में आज हम कंगाल हरिनाथ की चर्चा कर रहे हैं।लालन फकीर की रचनाओं के साथ साथ रवींद्र की रचनाधर्मिता पर बाउल फकीर सूफी संत आंदोलन की बौद्धमय विरास का गहरा असर रहा है,इसकी हम चर्चा करते रहे है।
इन्हीं लालन फकीर ने जाति तोड़ो आंदोलन बंगाल में शुरु किया था,जिसमें भारतीय ग्रामीण पत्रकारिता के भीष्म पितामह कंगाल हरिनाथ बाउल उनके अनुयायी और सहयोगी थे।जो नील की खेती कराने वाले किसानों के हक में अंग्रेजों से एकतरफ लोहा ले रहे थे तो दूसरी तरफ रवींद्र के पिता महर्षि देवेंद्रनाथ की जमींदारी और बंगाल के जमींदारों,सामंतों के खिलाफ पत्रकारिता कर रहे थे और जाति तोड़ो आंदोलन के तहत बाउल गान बी रच रहे थे।
जमींदार सामंत भद्रलोक कुलीन वर्चस्व के खिलाफ रवींद्र के दलित विमर्श की जमीन यही है।इसीलिए शुरु से रवींद्रनाथ मनुसमृति व्यवस्था के निशाने पर हैं।
लालन फकीर जात पांत और धर्म की पहचान से इंकार कर रहे थे और उनके जाति तोड़ो आंदोलन से ब्रह्मसमाज में भी खलबली मची हुई थी।जाति तोड़ो आंदोलन बंगाल में तब वैष्णवों की गौर सभा भी चला रही थी और हरिचांद ठाकुर का मतुआ आंदोलन भी शुरु हो गया था।
संत कबीर की तरह सभी जाति धर्म के लोग लालन फकीर से प्यार करते थे तो सबी जाति धर्मों के कट्टरपंथी लोग उनका विरोध करते थे।हिंदू उन्हें हिंदू मानते थे तो मुसलमान उन्हें मुसलमान मानते थे।वे निराकार ईश्वर के मानवधर्म की बात करते थे तो ब्रह्मसमाजी उन्हें ब्रमसमाज आंदोलन का हिस्सा मानते थे।जबकि वैष्णव उन्हें वैष्णव मानते थे।
लालन का जवाब एक वाक्य का हैः‘সব লোকে কয় লালন কী জাত সংসারে।’सभी पूछते हैं कि लालन इस संसार में किस जाति के हैं।
रवींद्र नाथ लालन फकीर से नहीं मिले  और न वे कंगाल हरिनाथ से मिले।लेकिन लालन फकीर और उनके बाउल अनिवार्य से वे सिलाईदह में लगातार संवाद करते रहे हैं और लालन फकीर की रचनाओं को संकलित और प्रकाशित करने की पहल भी उन्होने ही की।
लालनगीति डाट काम में इसी का ब्यौरा इस प्रकार दिया गया हैः
রবীন্দ্রনাথ ও লালন সম্ভবত লালনের সঙ্গে রবীন্দ্রনাথের দেখা হয়নি। তবে সভ্য সমাজে লালনকে পরিচয় করিয়ে দিয়েছিলেন খোদ রবীন্দ্রনাথ। লালনের একটি গানে বেশ মোহিত হয়েছিলেন তিনি, ‘খাঁচার ভেতর অচিন পাখি/কমনে আসে যায়।/ধরতে পারলে মনো-বেড়ি/দিতাম পাখির পায়।’ দেহতত্ত্বের এ গানটিকে রবীন্দ্রনাথ ইংরেজি অনুবাদও করেছিলেন। তিনি চেয়েছিলেন গানের মর্মার্থ বোঝাতে। আর সে কারণেই বুঝি ১৯২৫ সালের ভারতীয় দর্শন মহাসভায় ইংরেজি বক্তৃতায় এই গানের উদ্ধৃতি দিয়েছিলেন। বলেছিলেন, অচিন পাখি দিয়ে সাধারণ মানুষের কাছে কত সহজে মরমি অনুভব পৌঁছে দিয়েছিলেন লালন। লালনের সঙ্গে দেখা না হলেও লালন-অনুসারীদের সঙ্গে দেখা হয়েছে রবিবাবুর। এক চিঠির মধ্যে পাওয়া যায় সেই কথা, ‘তুমি তো দেখেছ শিলাইদহতে লালন শাহ ফকিরের শিষ্যদের সঙ্গে ঘণ্টার পর ঘণ্টা আমার কিরূপ আলাপ জমত। তারা গরিব। পোশাক-পরিচ্ছদ নাই। দেখলে বোঝার জো নাই তারা কত মহৎ। কিন্তু কত গভীর বিষয় সহজভাবে তারা বলতে পারত।’ শুধু কি তাই! লালনের মৃত্যুর পর তাঁর গানের খাতাও সংগ্রহ করেছিলেন রবীন্দ্রনাথ। লালনগীতি সংগ্রাহক একজনকে লালনশিষ্য ভোলাই শা বলেছিলেন- ‘দেখুন, রবিঠাকুর আমার গুরুর গান খুব ভালোবাসতেন, আমাদের খাতা তিনি নিয়ে গেছেন।’ সেই খাতা গত শতকের শেষার্ধে পাওয়া যায় এবং প্রকাশিত হয়।
हम आनंदमठ के वंदेमातरम राष्ट्रवाद के सच पर लगातार चर्चा करते रहे हैं और बंगाल के बाउल फकीर सूफी वैष्णव बौद्ध आंदोलनों पर भी लगातार चर्चा करते रहे हैं। कंगाल हरिनाथ और लालन फकीर से संबंधित उपलब्ध सामग्री भी हम लगातार शेयर कर रहे हैं। करते रहेंगे।
बहुजनों को रवींद्र का दलित विमर्श समझ में आये तो उन्हें बहुजन आंदोलन की अल विरासत की समझ आयेगी और नस्ली वर्ण वर्चस्व का यह कारपोरेटफासिस्ट तिलिस्म भी टूटेगा।इस संवाद का मकसद यही है।

बीबीसी की ताजा खबर हैः
'संविधान पर पुनर्विचार आरएसएस का 'हिडेन एजेंडा' है'!
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि भारतीय संविधान में बदलाव कर उसे भारतीय समाज के नैतिक मूल्यों के अनुरूप किया जाना चाहिए.
संघ प्रमुख भागवत ने हैदराबाद में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि संविधान के बहुत सारे हिस्से विदेशी सोच पर आधारित हैं और ज़रूरत है कि आज़ादी के 70 साल के बाद इस पर ग़ौर किया जाए.

आरएसएस का 'हिडेन एजेंडा'


भारतीय लोक गणराज्य और भारतीय संविधान के साथ नरसंहार संस्कृति के वध्य भारतीय जनगण को बचाने के लिए समता और न्याय, मनुष्यता, सभ्यता और प्रकृति, नागरिकता, आजीविका, जल जंगल जमीन, नागरिक अधिकार और मानवाधिकार के लिए निरंकुश नस्ली वर्चस्व की कारपोरेट राजकाज, राष्ट्रवाद और राजनीति के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सामंतवाद विरोधी साम्राज्यवाद विरोधी एकताबद्ध जनप्रतिरोध की साझा विरासत से जुड़ने की सख्त जरुरत है।
यह साझा विरासत सीधे तौर पर आदिवासी किसानों के जनविद्रोहों की निरंतरता, बाउल फकीर आंदोलन,नील विद्रोह और भारतीय सूफी संत बाउल फकीर गुरु परंपरा की जमीन है तो बहुजन आंदोलन की हजारों साल की विरासत, बौद्धमय भारत और विविधता बहुलता सहिष्णुता की अनेकता में एकता की साझा विरासत है।
रवींद्र का दलित विमर्श का सार यही है।
रवींद्र उस भारतवर्ष के प्रतीक है कारपोरेट डिजिटल इंडिया का नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व जिसकी रोज हत्या कर रहा है।
नस्ली वर्चस्व की राष्ट्रवाद के प्रतिरोध के खिलाफ तथाकथित संन्यासी विद्रोह के आनंदमठ के झूठ के खिलाफ बाउल साधु फकीर आंदोलन का सच जानने की जरुरत है। संन्यासी फकीर आंदोलन और चुआड़ विद्रोह के तुरंत बाद शुरु संथाल मुंडा भील विद्रोह के साथ नील विद्रोह से भारत में महात्मा गौतम बुद्ध, वैष्णव बाउल,सन्यासी फकीर सूफी आंदोलन के साथ लालन फकीर और कंगाल हरिनाथ का जाति तोड़ो आंदोलन एक तरफ तो दूसरी तरफ हरिचांद ठाकुर के मतुआ आंदोलन से गुरुचांद ठाकुर के चंडाल आंदोलन और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के जाति उन्मूलन एजंडा मिशन की शुरुआत महात्मा ज्योति बा फूले के शब्दों में बहुजनों की गुलामगिरि खत्म करने के लिए शुरु हो चुकी थी।
बहुजन विमर्श,आदिवासी विमर्श,दलित विमर्श,स्त्री विमर्श और रवींद्र के दलित विमर्श का प्रस्थानबिंदू यही आदिवासी दलित बहुजन किसान असल नवजागरण है,जो इतिहास और साहित्य में नहीं है।
ब्रह्म समाज आंदोलन और औपनिवेशिक ब्रिटिश राज से भी पहले पठान मुगल इस्लामी राजकाज के दौरान समाज सुधार आंदोलनों  नवजागरण की चर्चा खूब होती रही है लेकिन जाति तोड़ो अस्मिता तोड़ो के एकीकरण के बहुजन आंदोलन,आदिवासी किसान जनविद्रोहों के सिलिसिले में बाउल फकीर आंदोलन और लालन फकीर कंगाल हरिनाथ की युगलबंदी के रवींद्र संगीत के दलित विमर्श पर चर्चा कभी नहीं हुई है।
बंगाल के बाहर बाकी भारत में रवींद्र और बाब डिलान के नोबेल पुरस्कार के सौजन्य से लालन फकीर के बारे में पढ़े लिखों को थोड़ी बहुत सूचना हो सकती है लेकिन दक्षिण एशिया में ग्रामीण पत्रकारिता की शुरुआत नील विद्रोह, बाउल फकीर आंदोलन और जमींदारों के प्रजा उत्पीड़न के प्रतिरोध बतौर शुरु करने वाले लालन फकीर के नवजागरण ब्रहमसमाज के समकालीन,समानंतर  जाति धर्म पहचान तोड़ो आंदोलन में सहयोगी,अनुयायी पत्रकार बाउल कंगाल हरिनाथ की चर्चा अभी शुरु नही हुई है।
बहुजनों के असल नवजागरण के हिंदुत्वकरण के इसी धतकरम से नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व के नस्ली राष्ट्रवाद का जन्म औद्योगिक उत्पादन प्रणाली और ब्रिटिश राज में बहुजनों को मिले हकहकूक की वजह से टूटती जाति व्यवस्था आधारित मनुस्मृति प्रणाली की बहाली के लिए हुआ।इसे समझे बिना नरसंहारी कारपोरेट फासिज्म का प्रतिरोध मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
कंगाल हरिनाथ देवेंद्र नाथ टैगोर की जमींदारी के प्रजाजनों के प्रतिरोध के नेता थे और लालन फकीर के अखाडा़ के बाउल पत्रकार भी थे।वे एक साथ नीलसामंत देशी विदेशी काले गोरे शासकों का प्रतिरोध कर रहे थे तो वर्म वर्ग वर्चस्व के साहित्य कला माध्यम के खिलाफ वैकल्पिक पत्रकारिता की जमीन भी रच रहे थे और मजे की बात यह है कि अपनी ही जमींदारी के खिलाफ प्रतिरोध की यही लालन कंगाल जमीन ही रवींद्र रचनाधर्मिता में तब्दील हो गयी है।
जैसे बाउल फकीर आंदोलन का नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के हित में भगवाकरण हुआ,जैसे संतों सूफियों,फकीरों के सामंतविरोधी राजसत्ता और दैवीसत्तो के खिलाफ लोक जमीन के प्रतिरोध आंदोलन का भक्ति आंदोलन बतौर हिंदुत्वकरण हुआ,जैसे गौतम बुद्ध,महात्मा महावीर,गुरु नानक और गुरु गोविंद सिंह, शिवाजी महाराज,चंडाल मतुआ आंदोलन,लिंगायत आंदोलन,द्रविड़ आंदोलन,अयंकाली और लोखांडे के आंदोलन महात्मा ज्योतिबा फूले और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम के मिशन का हिंदुत्वकरण हुआ ,उसीतरह लालन फकीर और कंगाल हरिनाथ के जाति तोड़ो आंदोलन का हिंदुत्वकरण हुआ और इसी के तहत रवींद्रनाथ का महिमामंडन और चरित्रहनन का सिलसिला बारतीयजनगण और खासतौर पर भारतीयबहुजन समाज को साझा विरासत की जमीन से बेदखल करने के लिए जारी है।
रवींद्र को विश्वकवि,ऋषि रवींद्र,कविगुरु बनाकर उन्हे लालन फकीर कंगाल हरिनाथ के दलित बहुजन विमर्श और आदिवासी किसान आंदोलन से अलग रखने का कार्यक्रम आनंद मठ का दूसरा पहलू है।
आज इसी मुद्दे पर हम सिलसिलेवार चर्चा करेंगे। विस्तार से यह आलेख हस्तक्षेप पर पढ़ें। पूरा आलेख पढ़ने से पहले मेरे फेसबुक पेज पर संबंधित संदर्भ सामग्री बाउल फकीर आंदोलन,लालन फकीर और कंगाल हरिनाथ के बारे में देख लें तो बेहतर।
लालनफकीर और कंगाल हरिनाथ की युगलबंदी का ब्यौरा इसप्रकार हैः
কাঙাল হরিনাথের ‘শখের বাউল’ ১৮৮০ সালের কথা। তখন গ্রীষ্মকাল। কাঙাল হরিনাথের জীবনে এক অভাবনীয় মুহূর্ত ছিল সেটা। তিনি লালনের গান শুনে মোহিত হয়ে পড়লেন। ভাবলেন নিজেও একটা বাউল গানের দল গড়বেন। তাঁর গ্রামবার্তা-প্রেসে কাজ করার সময় পাশে পেলেন অক্ষয় কুমার মৈত্রেয় ও জলধর সেনকে। ব্যস, জমে গেল সাঙ্গ। পাশে পণ্ডিত প্রসন্ন কুমার বললেন, ‘নতুন করে গান তৈরি করতে হবে।’ শুরু হলো কাজ। সে এক অপার্থিব দৃশ্য ছিল বটে। নকল বাউল গানের দল। গানের সঙ্গে ছিল নৃত্য। জলধর সেন সেই বর্ণনা দিয়েছিলেন চমৎকার করে, ‘দেখিতেছি একদল ফকির; সকলেরই আলখাল্লা পরা, কাহারও মুখে কৃত্রিম দাড়ি, কাহারও মাথায় কৃত্রিম বাবরি চুল, সকলেরই নগ্ন পদ।’ এই দল দেখেছিলেন প্রাণকৃষ্ণ অধিকারী। তাঁর বর্ণনা থেকে পাওয়া যায়, ‘খেলকা, চুল, দাড়ি, টুপি ব্যবহার এবং কাহার কাহার পায়ে নূপুরও থাকিত। বাদ্যযন্ত্রের মধ্যে ডুগি, খোমকা, খুঞ্জুরি, একতারা প্রভৃতি ফকিরের সাজে তাহারা বাহির হইত। ফিকিরচাঁদ ফকিরের দল দেখিয়া শেষে গ্রামে গ্রামে অনেক দল সৃষ্টি হইল।’ তবে এ কথা কিন্তু সত্যি লালন যা পারেননি, সেই কাজ করতে পেরেছিলেন তাঁরা। তাঁরা গানকে পৌঁছে দিয়েছিলেন বাংলার বিস্তৃত সীমানায়। লালনের গান চারদিকে যতটা ছড়িয়েছিল তার চেয়ে বেশি ছড়িয়েছিল নকল বাউলদের গান। অথচ লালনকে দেখে, তাঁর গান শুনে অনুপ্রাণিত হয়েই দল গড়েছিলেন কাঙাল হরিনাথ।(साभार लालनगीति डाट काम)
जाति व्यवस्था पर लालन फकीर ने जाति धर्म की पहचान पर चोट के जरिये प्रहार किया है जो संत कबीर की भाषा के अनुरुप हैः
‘কেউ মালা কেউ তসবি গলায়/তাইতে যে জাত ভিন্ন বলায়- /যাওয়া কিংবা আসার বেলায়/জাতের চিহ্ন রয় কার রে।’
किसी के हाथों में माला है तो तसवी किसी के गले में।इसी से अलग जाति (धर्म) की पहचान है तो जाते वक्त (मृत्यु के समय) किसकी जाति की क्या पहचान होती है।
लालन फकीर की जीवनी लिखने वाले वसंत कुमार पाल ने उनकी धर्म जाति की किसी पहचतान को मानने से इंकार करते हुए लिखा हैः
‘সাঁইজি হিন্দু কি মুসলমান, এ কথা আমিও স্থির বলিতে অক্ষম।’
कंगाल हरिनाथ ने जाति तोड़ो आंदोलन का ब्यौरा देते हुए लालन फकीर के जाति तोड़ो आंदोलन और वैष्णवों के गौरसभा आंदोलन की चर्चा अपने अखबार ग्रामवार्ता में इस तरह की हैः
গ্রামবার্ত্তা প্রকাশিকা'র প্রবন্ধ-নিবন্ধ, সম্পাদকীয়, উপ-সম্পাদকীয় ও সংবাদ নিবন্ধকার হরিনাথ মজুমদার নিজেই লিখতেন। সেই সূত্রে 'জাতি' নামক নিবন্ধে 'গ্রামবার্ত্তার' নিবন্ধকার লিখেছেন :
'...সকলেই ব্রাম্ম ও ধর্ম্মসভার নাম শুনিয়াছেন। গৌরসভা নামে নিম্নশ্রেণীর লোকেরা আর এক সভা স্থাপন করিয়াছেন। ইহার নির্দ্দিষ্ট স্থান নাই। গৌরবাদী বক্তা এক ২ পল্লীগ্রামে উপস্থিত হইয়া, সভা করিয়া গৌরাঙ্গের চরিত ও লীলা বর্ণনা করে, স্ত্রীপুরুষে ৩/৪ শত লোক এক ২ সভায় উপস্থিত থাকে। ইহারা স্বধম্র্মের মধ্যে, জাতিভেদ স্বীকার করেনা; কামার, কুমার, তেলি, জালিক, ছুতার প্রভৃতি সকলেই একসঙ্গে আহার করে। এই দলে মুসলমান আছে কিনা জানিতে পারা যায় নাই। লালনশাহ নামে এক কায়স্থ আর এক ধর্ম্ম আবিষ্কার করিয়াছে। হিন্দু-মুসলমান সকলেই এই সম্প্রদায়ভুক্ত। আমরা মাসিক পত্রিকায় ইহার বিশেষ বিবরণ প্রকাশ করিব। ৩/৪ বৎসরের মধ্যে এই সম্প্রদায় অতিশয় প্রবল হইয়াছে। ইহারা যে জাতিভেদ স্বীকার করে না সে কথা বলা বাহুল্য। এখন পাঠকগণ চিন্তা করিয়া দেখুন, এদিকে ব্রাহ্মধর্ম্ম জাতির পশ্চাতে খোঁচা মারিতেছে, ওদিকে গৌরবাদিরা তাহাকে আঘাত করিতেছে, আবার সে দিকে লালন সম্প্রদায়িরা, ইহার পরেও স্বেচ্ছাচারের তাড়না আছে। এখন জাতি তিষ্ঠিতে না পারিয়া, বাঘিনীর ন্যায় পলায়ন করিবার পথ দেখিতেছে।'
कंगाल हरिनाथ और लालन फकीर की युगलबंदी के बारे इस ब्यौरे पर गौर करेंः
এখানে প্রসঙ্গক্রমে উল্লেখ্য যে সুনীল গঙ্গোপাধ্যায়ের উপন্যাস অবলম্বনে গৌতম ঘোষ পরিচালিত চলচ্চিত্র 'মনের মানুষ'-এও সরাসরি উপস্থিতি দেখানো হয়েছে সাঁইজি লালনের সঙ্গে কাঙ্গাল হরিনাথ মজুমদার ও সাহিত্যিক মীর মশাররফ হোসেনকে (১৮৪৭-১৯১১)।
অন্যদিকে, কাঙ্গাল হরিনাথশিষ্য জলধর সেন (১৮৬০-১৯৩৯) সাঁইজি লালন কাঙ্গাল কুটিরে এসে সঙ্গীত পরিবেশনের পর হরিনাথ-শিষ্যদের মনে যে ভাব উদয় হয়েছিল এর বিবরণ দিয়েছেন তার রচিত কাঙ্গাল জীবনীতে :
'সে দিন প্রাতঃকালে লালন ফকির নামক একজন ফকির কাঙ্গালের সহিত সাক্ষাৎ করিতে আসিয়াছিলেন। লালন ফকির কুমারখালীর অদূরবর্তী কালীগঙ্গার তীরে বসবাস করিতেন। তাঁহার অনেক শিষ্য ছিল। তিনি কোন্ সম্প্রদায়ভুক্ত ছিলেন তাহা বলা বড় কঠিন, কারণ তিনি সকল সম্প্রদায়ের অতীত পেঁৗছিয়াছিলেন। তিনি বক্তৃতা করিতেন না, ধর্ম্মকথাও বলিতেন না। তাঁহার এক অমোঘ অস্ত্র ছিল তাহা বাউলের গান। তিনি সেই সকল গান করিয়া সকলকে মুগ্ধ করিতেন। ... সেই লালন ফকির কাঙালের কুটীরে, আমরা দিনের যে কথা বলিতেছি, সেই দিন আসিয়াছিলেন এবং কয়েকটি গান করিয়াছিলেন। সব কয়টী গান আমার মনে নাই; একটি গান মনে আছে। যথা_
আমি একদিনও না দেখেছিলাম তারে;
আমার ঘরের কাছে আরসী-নগর,
তাতে এক পড়সী বসত করে।'
অন্যদিকে, সাঁইজি লালনের গানের প্রেরণাতেই অক্ষয় কুমার মৈত্রের (১৮৬১-১৯৩০) মাথায় প্রথম বাউলের দল গঠনের চিন্তা আসে এবং পরে কাঙ্গাল হরিনাথের শিষ্যদল তা বাস্তবতায় রূপ দেয় 'ফিকির চাঁদ' নামে। সাঁইজি লালনের গানের সুরের প্রভাবে প্রভাবিত হয়ে কাঙ্গাল হরিনাথ প্রথম গান রচনা করেন :
'আমি করব রাখালী কতকাল...।'
এরপর হরিনাথ মজুমদার একের পর এক বাউল গান রচনা করতে থাকেন। কাঙ্গাল হরিনাথ ফিকির চাঁদের দল এবং বাউল গান রচনা প্রসঙ্গে তার দিনলিপিতে উল্লেখ করেছেন :
"শ্রীমান অক্ষয় ও শ্রীমান প্রফুল্লের গানগুলির মধ্যে আমি যে মাধুর্য্য পাইলাম, তাহাতে স্পষ্টই বুঝিতে পাইলাম। এই ভাবে সত্য, জ্ঞান ও প্রেম-সাধনাতত্ত্ব প্রচার করিলে, পৃথিবীর কিঞ্চিৎ সেবা হইতে পারে। এতএব কতিপয় গান রচনার দ্বারা তাহার স্রোত সত্য, জ্ঞান ও প্রেম-সাধনের উপায়স্বরূপ পরমার্থ-পথে ফিরাইয়া আনিলাম এবং ফিকিরচাঁদের আগে 'কাঙ্গাল' নাম দিয়া দলের নাম 'কাঙ্গাল-ফিকিরচাঁদ' রাখিয়া তদনুসারেই গীতাবলীর নাম করিলাম। ... অল্পদিনের মধ্যেই কাঙ্গাল ফিকিরচাঁদের গান নিম্নশ্রেণী হইতে উচ্চশ্রেণীর লোকের আনন্দকর হইয়া উঠিল। মাঠের চাষা, ঘাটের নেয়ে, পথের মুটে, বাজারের দোকানদার এবং তাহার উপর শ্রেণীর সকলেই প্রার্থনাসহকারে ডাকিয়া কাঙ্গাল ফিকিরচাঁদের গান শুনিতে লাগিলেন।'
সাঁইজি লালনের গান লালন-পালন ও সংগ্রহে যেমন গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা পালন করেছেন কাঙ্গাল হরিনাথ তেমনি কাঙ্গালের গানের পেছনে লালনের উৎসাহ-প্রেরণা ও লালন কর্তৃক প্রভাবিত হওয়ার প্রবণতারও উল্লেখযোগ্য প্রমাণ মেলে :
... কাঙ্গাল একদিন [লালন] ফকিরকে ডাকিয়া তাঁহার [কাঙ্গালের] রচিত কতগুলি গান শুনাইয়া জিজ্ঞাসা করিরেন, 'ভাই আমার এ কথাগুলি কেমন লাগিল?' ফকির হাসিয়া উত্তর দিলেন, 'তোমার এ ব্যঞ্জন বেশ হয়েছে, তবে নূনে কিছু কম আছে।'
লালনের এই উৎসাহ-প্রেরণা ও সুরের প্রভাবে পরবর্তীতে কাঙ্গাল হরিনাথের গান উত্তরোত্তর সহজ-সরল, সুন্দর ও শ্রুতিমধুর ভাবগাম্ভীর্যময় হয়েছিল।
আধ্যাত্মিক জীবনদর্শন ও বাউল গান রচনায় সাঁইজি লালন কর্তৃক যে কাঙ্গাল হরিনাথ প্রভাবিত হয়েছিলেন শুধু তা নয়, সাঁইজি লালন নিজেও কাঙ্গাল হরিনাথের উৎসাহ-প্রেরণায় প্রভাবিত হয়েছিলেন । যেমন কাঙ্গাল হরিনাথের এই গানটি_
যারা সব জাতের ছেলে, জাত নিয়ে যাক্ যমের হাতে।
বুঝেছি জাতের ধর্ম, কর্মভোগ কেবল জেতে
একই আঙ্গিকে লালনের গান_
সব লোকে কয় লালন কি জাত সংসারে।
লালন বলে জাতের কি রূপ দেখলাম না এ নজরে
অথবা কাঙ্গাল হরিনাথ রচিত_
এখন, আমার মনের মানুষ কোথা পাই।
যার তরে মনোখেদে প্রাণ কাঁদে সর্বদাই
সাঁইজি লালন রচিত_
মিলন হবে কত দিনে
আমার মনের মানুষেরই সনে
উপরের দুটি গানই ভাবের দিক থেকে একই সাদৃশ্যমূলক ও একে অন্যের সম্পূরক। সাময়িকপত্র সম্পাদনা, সংবাদ সংগ্রহ-প্রকাশ, সাহিত্যচর্চা ও প্রজানিপীড়নবৈরী কাঙ্গাল হরিনাথ মজুমদার লালনতীর্থে এসে সাঁইজির গানের সুরের স্পর্শে হয়ে ওঠেন আর এক নতুন বাউল সুরের সম্রাট। অন্যদিকে সাঁইজি লালন কাঙ্গাল স্পর্শে এবং মাঝেমধ্যে কুটিরে সমবেত হয়ে তার গান ও সুরের দ্যুতি ছড়িয়েছেন আধ্যাত্মিক জীবনদর্শন ও বাউল গানের মাধ্যমে। মানবপ্রেম, সমাজ সংস্কার ও জীবনের জয়গানের আলোর দ্যুতি ছড়ানোর দিক থেকে সাঁইজি লালন এবং কাঙ্গাল হরিনাথ ছিলেন একই চিন্তা, ধ্যান-ধারণার এক অভিন্ন সমীকরণের অধিকারী।

कंगाल हरिनाथ फकीर की पत्रिका के बारे में बांग्ला पीडिया में लिखा हैः
Grambarta Prakashika influential nineteenth-century journal, first published in April 1863 under the editorship of kangal harinath Majumdar. In June-July 1864 it became a fortnightly and a weekly in April-May 1871. Initially it was printed at Girish Vidyaratna Press, Kolkata. In 1864 Grambarta was shifted to Mathuranath Press at Kumarkhali. In 1873 the Kumarkhali press was donated to Harinath by its owner, Mathuranath Moitreya.
Grambarta Prakaxika published articles on literature, philosophy, science etc. Reputed Bengali scholars used to write in the journal. rabindranath tagore's essays on literature, philosophy and science as well as poems were also published in it. The well-known Muslim writer mir mosharraf hossain began his literary activities through this paper for which he first worked as a mofussil correspondent. jaladhar sen, well-known as a writer of Himalayan travels and journalist, also began his literary career through this journal.
Harinath edited Grambarta Prakasika for 18 years. During this period he led a relentless struggle to promote education in Bengal and create public opinion against exploitation. He published articles exposing social and political wrongs, and his pen was particularly uncompromising against the oppression of British indigo farmers and moneylenders. [Md Masud Parvez]

Tuesday, September 12, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श-22 गोदान की धनिया,सद्गति की झुरिया और रवींद्र की चंडालिका भारतीय स्त्री अस्मिता का यथार्थ! देहमुक्ति के विमर्श में विषमता के रंगभेदी नस्ली विमर्श शामिल नहीं है और इसीलिए बलात्कार सुनामी मुक्तबाजार का धर्म कर्म है।सद्गति का सिलसिला थमा नहीं है।नरसंहार संस्कृति में सद्गति तो मुफ्त उपहार है। महिमामंडन और चरित्रहनन के शिकार रवींद्रनाथ! नोबेल पुरस्कार से पहले अछूत ब्रह्मसमाजी रवींद्र को बांग्ला भद्रलोक सवर्ण समाज कवि साहित्यकार मानने को तैयार नहीं था तो नोबेल पुरस्कार मिल जाने के बाद उन्होंने रवींद्र को वैदिकी धर्म और बांग्ला ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद का प्रतीक बना डाला।अछूत रवींद्र की जगह जमींदार रवींद्रनाथ ने ले ली और भद्रलोक रवींद्र विमर्श में रवींद्र लंपट जमींदार के सिवाय कुछ नहीं है। पलाश विश्वास

रवींद्र का दलित विमर्श-22
गोदान की धनिया,सद्गति की झुरिया और रवींद्र की चंडालिका भारतीय स्त्री अस्मिता का यथार्थ!
देहमुक्ति के विमर्श में विषमता के रंगभेदी नस्ली विमर्श शामिल नहीं है और इसीलिए बलात्कार सुनामी मुक्तबाजार का धर्म कर्म है।सद्गति का सिलसिला थमा नहीं है।नरसंहार संस्कृति में सद्गति तो मुफ्त उपहार है।
महिमामंडन और चरित्रहनन के शिकार रवींद्रनाथ!
नोबेल पुरस्कार से पहले अछूत ब्रह्मसमाजी रवींद्र को बांग्ला भद्रलोक सवर्ण समाज कवि साहित्यकार मानने को तैयार नहीं था तो नोबेल पुरस्कार मिल जाने के बाद उन्होंने  रवींद्र को वैदिकी धर्म और बांग्ला  ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद  का प्रतीक बना डाला।अछूत रवींद्र की जगह जमींदार रवींद्रनाथ ने ले ली और भद्रलोक रवींद्र विमर्श में रवींद्र लंपट जमींदार के सिवाय कुछ नहीं है।
पलाश विश्वास
सवर्ण भद्रलोक विद्वतजनों ने नोबेल पुरस्कार पाने के बाद से लेकर अबतक रवींद्र के महिमामंडन के बहाने रवींद्र का लगातार चरित्र हनन किया है।रवींद्र साहित्य पर चर्चा अब रवींद्र के प्रेमसंंबंधों तक सीमाबद्ध हो गया है जैसे उनके लिखे साहित्य को वैदिकी धर्म के आध्यात्म और सत्तावर्ग के प्रेम रोमांस के नजरिये से ही देखने समझने का चलन है।कादंबरी देवी,विक्टोरिया ओकैम्पो से लेकर लेडी रानू मुखर्जी तक के साथ प्रेमसंबंधों के किस्सों पर लगातार लिखा जा रहा है।
दूसरी तरफ, बहुजनों, मुसलमानों, स्त्रियों, किसानों, मेहनतकशों और अछूतों के लिए उनकी रचनाधर्मिता में समानत और न्याय की गुहार या सत्ता वर्ग वर्ण के नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के खिलाफ उनके प्रतिरोध की चर्चा कहीं नहीं होती।
इसके विपरीत,भारत में स्त्री अस्मिता का सच प्रेमचंद के उपन्यास गोदान की धनिया,उन्हींकी कहानी सद्गति की झुरिया और रवींद्र की चंडालिका के सामाजिक यथार्थ हैं।सामाजिक विषमता,नस्ली वर्चस्व, पितृसत्ता, अन्याय, असमानता, बहिस्कार, अत्याचार उत्पीड़न की सामंती महाजनी मनुस्मृति व्यवस्था में धार्मिक सांस्कृतिक पाखंड के हिसाब से सवर्ण स्त्री देवी है लेकिन पितृसत्ता की मनुस्मृति के विधान के तहत स्त्री आज भी शूद्र दासी है।
धर्म कर्म समाज राष्ट्र राजनीति और अर्थव्यवस्था के हिसाब से स्त्री उपभोक्ता वस्तु है और उसकी मनुष्यता की कोई पहचान नहीं है।
शूद्र,अछूत और आदिवासी स्त्री का मौजूदा सामाजिक यथार्थ तो गोदान,सद्गति और चंडालिका से भी भयंकर है।
मुक्तबाजार में एक तरफ देवी की पूजा का उत्सव और बाजार है तो दूसरी तरफ घर और बाहर सर्वत्र देवी की देह का आखेट है और अछूत आदिवासी स्त्रियों पर अन्याय,अत्याचार और उत्पीड़न की बलात्कार सुनामी ही आज का नस्ली राष्ट्रवाद है,जिसपर कानून का कोई अंकुश नहीं है।
चंडालिका इसी उत्पीड़ित स्त्री का विद्रोह है तो यही भारत में स्त्री अस्मिता का सच है लेकिन सवर्ण स्त्री विमर्श में चंडालिका,धनिया और झुरिया के लिए कोई जगह उसी तरह नहीं है जैसे साहित्य,संस्कृति और इतिहास में कृषि और किसानों,अछूतों और आदिवासियों के लिए कोई जगह नहीं है।
देहमुक्ति के विमर्श में विषमता के रंगभेदी नस्ली विमर्श शामिल नहीं है और इसीलिए बलात्कार सुनामी मुक्तबाजार का धर्म कर्म है।तो दूसरी तरफ सद्गति का सिलसिला थमा नहीं है।नरसंहार संस्कृति में सद्गति तो मुफ्त उपहार है।
सत्ता वर्ण और वर्ग के लिए नोबेल पुरस्कार की वजह से रवींद्र नाथ को निगलना और उगलना हमेशा मुश्किल रहा है।
आधुनिक बांग्ला साहित्य के महामंडलेश्वर सुनील गंगोपाध्याय का दावा है कि विश्वभर में इने गिने लोग रवींद्रनाथ का नाम जानते हैं और जब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला तब पूर्व के बारे में पश्चिम को कुछ भी मालूम नहीं था और इसीलिए तब रवींद्र की इतनी चर्चा हुई।कुल मिलाकर मान्यता यही है कि रवींद्र के सामाजिक यथार्थ के दलित विमर्श का कोई वजूद नहीं है और वैदिकी धर्म और आध्यात्म के बारे में पश्चिम की अज्ञानता के कारण ही रवींद्र को नोबेल मिला।राष्ट्रवादियों के मुताबिक ब्रिटिश हुकूमत की दलाल करने की वजह से रवींद्र को नोबेल पुरस्कार मिला।
हाल में रवींद्र साहित्य के खिलाफ राष्ट्रवादियों के फतवे से बांग्ला राष्ट्रवाद को धक्का लगा है और बंगाल में इस फतवे के खिलाफ आवाजें भी उठने लगी है।जैसे एकबार खुशवंत के रवींद्र को पवित्र गाय कह देने पर बंगाली भावनाओं को भारी सदमा लगा था।लेकिन सच यह है कि नोबेल पुरस्कार से पहले अछूत ब्रह्मसमाजी रवींद्र को बांग्ला भद्रलोक सवर्ण समाज कवि साहित्यकार मानने को तैयार नहीं था तो नोबेल पुरस्कार मिल जाने के बाद उन्होंने  रवींद्र को वैदिकी धर्म और बांग्ला  ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद  का प्रतीक बना डाला।अछूत रवींद्र की जगह जमींदार रवींद्रनाथ ने ले ली और भद्रलोक रवींद्र विमर्श में रवींद्र लंपट जमींदार के सिवाय कुछ नहीं है।
फासीवादी राष्ट्रवाद के निशाने पर रवींद्र नाथ शुरु से हैं और 1916 में ही उनपर अमेरिका और चीन में हमले हुए।1941 में उनके अवसान के बाद रवींद्र विरासत को खारिज करने के लिए उनपर हमलों का सिलसिला कभी खत्म ही नहीं हुआ।
मई, 2014 से बहुत पहले 17 सितंबर,2003 में बंगाल की गौरवशाली देश पत्रिका में  एक पाठक सुजीत चौधरी,करीमगंज ने रवींद्र के चरित्रहनन के विरोध में लिखाःसांप्रतिक काल में देश पत्रिका में रवींद्रनाथ के संबंध में अनेक निबंध और पत्र प्रकाशित हुए हैं।जिन्हें पढ़कर आम पाठक की हैसियत से मुझे कुछ धारणाएं मिलीं,जो इसप्रकार हैंःएक-रवींद्रनाथ सांप्रदायिक थे।इसलिए अपने मुसलिम बहुल जमींदारी इलाके में नहीं,हिंदूबहुल वीरभूम में उन्होंने विश्वविद्यालय की स्थापना की।दो- वे कापुरुष थे और उनका देशप्रेम नकली था।तीन-उनकी कथनी और करनी में कोई सामजस्य नहीं था।कथनी में वे विधवा विवाह के समर्थक थे और असली वक्त पर खुद बाधा खड़ी कर देते थे।चार-वे जाति प्रथा के समर्थक थे।पांच-वे प्रणय संबंधों में निरंकुश थे।आठ साल के शिशु से लेकर अपनी भाभी तक किसी को उन्होंने नहीं बख्शा। छह-अपनी बालिकावधु पर उन्होंने प्रकांतर से अनेक अत्याचार किये।सात- कविता वविता कुछभी नहीं,कुछ गीतों के लिए वे जिंदा हैं।इसके विपरीत उम्मीद की बात यह है कि बांग्लाभाषी दूसरे सारे आलोचक,गवेषक,कवि,साहित्यकार,पत्रलेखक सभी आदर्सवादी,प्रगतिशील एवं निर्मल चरित्र के हैं।शुक्र है,वरना रवींद्र नाथ ने तो लगभग पूरे देश का ध्वंस कर दिया होता।(संदर्भःकी खाराप लोक छिलेन रवींद्रनाथ!देश,17 सितंबर,2003)
पत्र लेखक ने जिन बिंदुओं पर रवींद्र के चरित्र हनन की बात की है,वे सारे भद्रलोक रवींद्र विमर्श के तत्व हैं।आज भी रवींद्र विमर्श रवींद्र के प्रेमसंबंधों पर शोध का अनंत सिलसिला है।कम से कम हिंदी में ऐसे चरित्रहनन की नजीर नहीं है।
गौरतलब है कि देश के संपादक सागरमय घोष के निधन के बाद इस पत्रिका की भूमिका सुनील गंगोपाध्याय के नेतृत्व में बदल गयी जो रवींद्र को दौ कौड़ी का साहित्यकार नहीं मानते।उन्होंने इसी देश पत्रिका में समय को सूत्रधार मानकर तीन उपन्यासों की एक ट्रिलाजी प्रकाशित की,एई समय,पूर्व पश्चिम और भोरेर आलो और बांग्ला विद्वत समाज इसे नवजागरण,स्वतंत्रता संग्राम,भारत विभाजन,बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम,नक्सलबाड़ी आंदोलन,शरणार्थी समस्या और आधुनिक भारत का समग्र इतिहास बताते हैं।
इस इतिहास में बंगाल के नमोशूद्र सुनील गंगोपाध्याय के मुताबिक हिंदू कभी नहीं थे,दो राष्ट्र सिद्धांत के तहत भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में इन अछूतों को भी सवर्णों को हिंदू मान लेने की मजबूरी थी।
इस इतिहास में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आदिवासी किसान जनविद्रोहों के लिए कोई स्थान नहीं है और मां काली को उन्होंने भोरेर आलो में लैंग्टा संथाल मागी याऩी नंगी संथाल औरत बताया है।
इस इतिहास में विभाजन पीड़ित शरणार्थियों की दंडकारण्य कथा है लेकिन मरीचझांपी नरसंहार नहीं है और शरणार्थी जीवन यंत्रणा को आपराधिक गतिविधियों से जोड़ते हुए शरणार्थियों को बंगाल की सारी समस्याओं की जड़ बताया गया है।
सुनील गंगोपाध्याय ने नवजागरण के राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे चरित्रों को अपने हिसाब से गढ़ा है तो रवींद्र कादंबरी प्रेम प्रसंग भी इस ट्रिलाजी का आख्यान है।
गोदान औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत किसान का महाजनी व्यवस्था में चलने वाले निरंतर शोषण तथा उससे उत्पन्न संत्रास की कथा है। यह महाजनी सभ्यता अब मुक्तबाार के कारपोरेटएकाधिकार में बदल गया है और एक नहीं,लाखों होरियों की मर्यादा की लड़ाई का अंतिम विकल्प अब आत्महत्या है।
आजादी से पहले किसान आदिवासी शूद्र अछूत मुसलमान समूचा बहुजन समाज जल जंगल जमीन के हकूक के लिए लगातार हजारोंहजार साल से लड़ता रहा है और आजादी के बाद में किसान आंदोलन सवर्ण सत्ता की राजनीतिक मनुस्मृति का शिकार है तो मुक्तबाजारी फासीवादी सैन्य राष्ट्रवाद में बेदखली की यह महाजनी सभ्यता निरंकुश नरसंहार संस्कृति है।
गोदान का नायक होरी एक किसान है जो किसान वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद है। 'आजीवन दुर्धर्ष संघर्ष के बावजूद उसकी एक गाय की आकांक्षा पूर्ण नहीं हो पाती'। गोदान भारतीय कृषक जीवन के संत्रासमय संघर्ष की कहानी है।
अब होरी सिरे से दो बीघा जमीन की तरह लापता है और कोई शोकसंदेश नहीं है।
गोदान के नायक और नायिका होरी और धनिया के परिवार के रूप में हम भारत की एक विशेष जनपदीय लोक संस्कृति की साझा विरासत को सजीव और साकार पाते हैं, ऐसी संस्कृति जो अब समाप्त हो रही है या हो जाने को है, फिर भी जिसमें भारत की मिट्टी की सोंधी सुबास भरी है।कृषि और किसानों की बेदखली और उनके वध उत्सव के इस दुःसमय में गोदान की प्रासंगिकता और बढ़ गयी है।
गोदान में भारतीय किसान का संपूर्ण जीवन - उसकी आकांक्षा और निराशा, उसकी धर्मभीरुता और भारतपरायणता के साथ स्वार्थपरता ओर बैठकबाजी, उसकी बेबसी और निरीहता- का जीता जागता चित्र उपस्थित किया गया है। उसकी गर्दन जिस पैर के नीचे दबी है उसे सहलाता, क्लेश और वेदना को झुठलाता, 'मरजाद' की झूठी भावना पर गर्व करता, ऋणग्रस्तता के अभिशाप में पिसता, तिल तिल शूलों भरे पथ पर आगे बढ़ता, भारतीय समाज का मेरुदंड यह किसान कितना शिथिल और जर्जर हो चुका है, यह गोदान में प्रत्यक्ष देखने को मिलता है।
गोदान के कथानक में नगरों के कोलाहलमय चकाचौंध ने गाँवों की विभूति को कैसे ढँक लिया है, जमींदार, मिल मालिक, पत्रसंपादक, अध्यापक, पेशेवर वकील और डाक्टर, राजनीतिक नेता और राजकर्मचारी जोंक बने कैसे गाँव के इस निरीह किसान का शोषण कर रहे हैं और कैसे गाँव के ही महाजन और पुरोहित उनकी सहायता कर रहे हैं, गोदान में ये सभी तत्व नखदर्पण के समान प्रत्यक्ष हो गए हैं।
यही आज का सच है और नस्ली वर्चस्व के फासीवादी राष्ट्रवाद में बहुजनों की सद्गति का सिलसिला  जारी है।इस कहानी को दोबारा पढ़ें और हो सके तो इस कहानी पर बनी सत्यजीत रे की फिल्म को देखते हुए समकालीन डिजिटल इंडिया की नरसंहारी संस्कृति और समय के सच का सामना करें।

सद्गति -प्रेमचंद

दुखी चमार द्वार पर झाडू लगा रहा था और उसकी पत्नी झुरिया, घर को गोबर से लीप रही थी। दोनों अपने-अपने काम से फुर्सत पा चुके थे, तो चमारिन ने कहा, ‘तो जाके पंडित बाबा से कह आओ न। ऐसा न हो कहीं चले जायँ।‘
दुखी –‘ हाँ जाता हूँ, लेकिन यह तो सोच, बैठेंगे किस चीज़ पर ?’
झुरिया –‘ क़हीं से खटिया न मिल जायगी ? ठकुराने से माँग लाना।‘
दुखी –‘ तू तो कभी-कभी ऐसी बात कह देती है कि देह जल जाती है। ठकुरानेवाले मुझे खटिया देंगे ! आग तक तो घर से निकलती नहीं, खटिया देंगे ! कैथाने में जाकर एक लोटा पानी माँगूँ तो न मिले। भला खटिया कौन देगा ! हमारे उपले, सेंठे, भूसा, लकड़ी थोड़े ही हैं कि जो चाहे उठा ले जायँ। ले अपनी खटोली धोकर रख दे। गरमी के तो दिन हैं। उनके आते-आते सूख जायगी।‘
झुरिया –‘वह हमारी खटोली पर बैठेंगे नहीं। देखते नहीं कितने नेम-धरम से रहते हैं।‘
दुखी ने जरा चिंतित होकर कहा, ‘हाँ, यह बात तो है। महुए के पत्ते तोड़कर एक पत्तल बना लूँ तो ठीक हो जाय। पत्तल में बड़े-बड़े आदमी खाते हैं। वह पवित्तर है। ला तो डंडा, पत्ते तोड़ लूँ।‘
झुरिया –‘पत्तल मैं बना लूँगी, तुम जाओ। लेकिन हाँ, उन्हें सीधा भी तो देना होगा। अपनी थाली में रख दूँ ?’
दुखी –‘क़हीं ऐसा गजब न करना, नहीं तो सीधा भी जाय और थाली भी फूटे ! बाबा थाली उठाकर पटक देंगे। उनको बड़ी जल्दी विरोध चढ़ आता है। किरोध में पंडिताइन तक को छोड़ते नहीं, लड़के को ऐसा पीटा कि आज
तक टूटा हाथ लिये फिरता है। पत्तल में सीधा भी देना, हाँ। मुदा तू छूना मत।‘
झूरी –‘ गोंड़ की लड़की को लेकर साह की दूकान से सब चीज़ें ले आना। सीधा भरपूर हो। सेर भर आटा, आधा सेर चावल, पाव भर दाल, आधा पाव घी, नोन, हल्दी और पत्तल में एक किनारे चार आने पैसे रख देना। गोंड़
की लड़की न मिले तो भुर्जिन के हाथ-पैर जोड़कर ले जाना। तू कुछ मत छूना, नहीं गजब हो जायगा।‘

इन बातों की ताकीद करके दुखी ने लकड़ी उठाई और घास का एक बड़ा-सा गट्ठा लेकर पंडितजी से अर्ज करने चला। ख़ाली हाथ बाबाजी की सेवा में कैसे जाता। नजराने के लिए उसके पास घास के सिवाय और क्या
था। उसे ख़ाली देखकर तो बाबा दूर ही से दुत्कारते। पं. घासीराम ईश्वर के परम भक्त थे। नींद खुलते ही ईशोपासन में लग जाते। मुँह-हाथ धोते आठ बजते, तब असली पूजा शुरू होती, जिसका पहला भाग भंग की तैयारी थी। उसके बाद आधा घण्टे तक चन्दन रगड़ते, फिर आइने के सामने एक तिनके से माथे पर तिलक लगाते। चन्दन की दो रेखाओं के बीच में लाल रोरी की बिन्दी होती थी। फिर छाती पर, बाहों पर चन्दन की
गोल-गोल मुद्रिकाएं बनाते। फिर ठाकुरजी की मूर्ति निकालकर उसे नहलाते, चन्दन लगाते, फूल चढ़ाते, आरती करते, घंटी बजाते। दस बजते-बजते वह पूजन से उठते और भंग छानकर बाहर आते। तब तक दो-चार जजमान द्वार पर आ जाते ! ईशोपासन का तत्काल फल मिल जाता। वही उनकी खेती थी। आज वह पूजन-गृह से निकले, तो देखा दुखी चमार घास का एक गट्ठा लिये बैठा है। दुखी उन्हें देखते ही उठ खड़ा हुआ और उन्हें साष्टांग दंडवत् करके हाथ बाँधकर खड़ा हो गया। यह तेजस्वी मूर्ति देखकर उसका हृदय
श्रृद्धा से परिपूर्ण हो गया ! कितनी दिव्य मूर्ति थी। छोटा-सा गोल-मटोल आदमी, चिकना सिर, फूले गाल, ब्रह्मतेज से प्रदीप्त आँखें। रोरी और चंदन देवताओं की प्रतिभा प्रदान कर रही थी। दुखी को देखकर श्रीमुख से बोले – ‘आज कैसे चला रे दुखिया ?’
दुखी –‘ने सिर झुकाकर कहा, बिटिया की सगाई कर रहा हूँ महाराज। कुछ साइत-सगुन विचारना है। कब मर्जी होगी ?’
घासी –‘आज मुझे छुट्टी नहीं। हाँ साँझ तक आ जाऊँगा।‘
दुखी –‘नहीं महराज, जल्दी मर्जी हो जाय। सब सामान ठीक कर आया हूँ। यह घास कहाँ रख दूँ ?
घासी –‘इस गाय के सामने डाल दे और जरा झाडू लेकर द्वार तो साफ़ कर दे। यह बैठक भी कई दिन से लीपी नहीं गई। उसे भी गोबर से लीप दे। तब तक मैं भोजन कर लूँ। फिर जरा आराम करके चलूँगा। हाँ, यह लकड़ी भी चीर देना। खलिहान में चार खाँची भूसा पड़ा है। उसे भी उठा लाना और भुसौली में रख देना।‘
दुखी फौरन हुक्म की तामील करने लगा। द्वार पर झाडू लगाई, बैठक को गोबर से लीपा। तब बारह बज गये। पंडितजी भोजन करने चले गये। दुखी ने सुबह से कुछ नहीं खाया था। उसे भी ज़ोर की भूख लगी; पर वहाँ
खाने को क्या धारा था। घर यहाँ से मील भर था। वहाँ खाने चला जाय, तो पंडितजी बिगड़ जायँ। बेचारे ने भूख दबाई और लकड़ी फाड़ने लगा। लकड़ी की मोटी-सी गाँठ थी; जिस पर पहले कितने ही भक्तों ने अपना ज़ोर आजमा लिया था। वह उसी दम-खम के साथ लोहे से लोहा लेने के लिए तैयार थी। दुखी घास छीलकर बाज़ार ले जाता था। लकड़ी चीरने का उसे अभ्यास न था। घास उसके खुरपे के सामने सिर झुका देती थी। यहाँ कस-कसकर कुल्हाड़ी का भरपूर हाथ लगाता; पर उस गाँठ पर निशान तक न पड़ता था। कुल्हाड़ी उचट जाती। पसीने में तर था, हाँफता था, थककर बैठ जाता था, फिर उठता था। हाथ उठाये न उठते थे, पाँव काँप रहे थे, कमर न सीधी होती थी, आँखों तले अँधेरा हो रहा था, सिर में चक्कर आ रहे थे, तितलियाँ उड़ रही थीं, फिर भी अपना काम किये जाता था। अगर एक चिलम तम्बाकू पीने को मिल जाती, तो शायद कुछ ताकत आती।
उसने सोचा, यहाँ चिलम और तम्बाकू कहाँ मिलेगी। बाह्मनों का पूरा है। बाह्मन लोग हम नीच जातों की तरह तम्बाकू थोड़े ही पीते हैं। सहसा उसे याद आया कि गाँव में एक गोंड़ भी रहता है। उसके यहाँ ज़रूर चिलम-तमाखू होगी। तुरत उसके घर दौड़ा। खैर मेहनत सुफल हुई। उसने तमाखू भी दी और चिलम भी दी; पर आग वहाँ न थी। दुखी ने कहा, आग की चिन्ता न करो भाई। मैं जाता हूँ, पंडितजी के घर से आग माँग लूँगा। वहाँ तो अभी रसोई बन रही थी। यह कहता हुआ वह दोनों चीज़ें लेकर चला आया और पंडितजी के घर में बरौठे के द्वार पर खड़ा होकर बोला, ‘मालिक, रचिके आग मिल जाय, तो चिलम पी लें।‘
पंडितजी भोजन कर रहे थे। पंडिताइन ने पूछा, ‘यह कौन आदमी आग माँग रहा है ?’
पंडित –‘अरे वही ससुरा दुखिया चमार है। कहा, है थोड़ी-सी लकड़ी चीर दे। आग तो है, दे दो।‘
पंडिताइन ने भॅवें चढ़ाकर कहा, ‘तुम्हें तो जैसे पोथी-पत्रो के फेर में धरम-करम किसी बात की सुधि ही नहीं रही। चमार हो, धोबी हो, पासी हो, मुँह उठाये घर में चला आये। हिन्दू का घर न हुआ, कोई सराय हुई। कह दो दाढ़ीजार से चला जाय, नहीं तो इस लुआठे से मुँह झुलस दूँगी। आग माँगने चले हैं।‘
पंडितजी ने उन्हें समझाकर कहा, ‘भीतर आ गया, तो क्या हुआ। तुम्हारी कोई चीज़ तो नहीं छुई। धरती पवित्र है। जरा-सी आग दे क्यों नहीं देती, काम तो हमारा ही कर रहा है। कोई लोनिया यही लकड़ी फाड़ता, तो
कम-से-कम चार आने लेता।‘
पंडिताइन ने गरजकर कहा, ‘वह घर में आया क्यों !’
पंडित ने हारकर कहा, ‘ससुरे का अभाग था और क्या !’
पंडिताइन--‘अच्छा, इस बखत तो आग दिये देती हूँ, लेकिन फिर जो इस तरह घर में आयेगा, तो उसका मुँह ही जला दूँगी।‘
दुखी के कानों में इन बातों की भनक पड़ रही थी। पछता रहा था, नाहक आया। सच तो कहती हैं। पंडित के घर में चमार कैसे चला आये। बड़े पवित्तर होते हैं यह लोग, तभी तो संसार पूजता है, तभी तो इतना मान
है। भर-चमार थोड़े ही हैं। इसी गाँव में बूढ़ा हो गया; मगर मुझे इतनी अकल भी न आई। इसलिए जब पंडिताइन आग लेकर निकलीं, तो वह मानो स्वर्ग का वरदान पा गया। दोनों हाथ जोड़कर ज़मीन पर माथा टेकता हुआ बोला, ‘पड़ाइन माता, मुझसे बड़ी भूल हुई कि घर में चला आया। चमार की अकल ही तो ठहरी। इतने मूरख न होते, तो लात क्यों खाते।‘
पंडिताइन चिमटे से पकड़कर आग लाई थीं। पाँच हाथ की दूरी से घूँघट की आड़ से दुखी की तरफ आग फेंकी। आग की बड़ी-सी चिनगारी दुखी के सिर पर पड़ गयी। जल्दी से पीछे हटकर सिर के झोटे देने लगा। उसने मन में कहा, यह एक पवित्तर बाह्मन के घर को अपवित्तर करने का फल है। भगवान ने कितनी जल्दी फल दे दिया। इसी से तो संसार पंडितों से डरता है। और सबके रुपये मारे जाते हैं बाह्मन के रुपये भला कोई मार तो ले ! घर भर का सत्यानाश हो जाय, पाँव गल-गलकर गिरने लगे। बाहर आकर उसने चिलम पी और फिर कुल्हाड़ी लेकर जुट गया। खट-खट की आवाजें आने लगीं। उस पर आग पड़ गई, तो पंडिताइन को उस पर कुछ दया आ गई। पंडितजी भोजन करके उठे, तो बोलीं –‘इस चमरवा को भी कुछ खाने को दे दो, बेचारा कब से काम कर रहा है। भूखा होगा।‘
पंडितजी ने इस प्रस्ताव को व्यावहारिक क्षेत्र से दूर समझकर पूछा, ‘रोटियाँ हैं ?’
पंडिताइन –‘दो-चार बच जायँगी।‘
पंडित –‘दो-चार रोटियों में क्या होगा ? चमार है, कम से कम सेर भर चढ़ा जायगा।‘
पंडिताइन कानों पर हाथ रखकर बोलीं, ‘अरे बाप रे ! सेर भर ! तो फिर रहने दो।‘
पंडितजी ने अब शेर बनकर कहा, ‘क़ुछ भूसी-चोकर हो तो आटे में मिलाकर दो ठो लिट्टा ठोंक दो। साले का पेट भर जायगा। पतली रोटियों से इन नीचों का पेट नहीं भरता। इन्हें तो जुआर का लिट्टा चाहिए।‘
पंडिताइन ने कहा, ‘अब जाने भी दो, धूप में कौन मरे।‘

दुखी ने चिलम पीकर फिर कुल्हाड़ी सँभाली। दम लेने से जरा हाथों में ताकत आ गई थी। कोई आधा घण्टे तक फिर कुल्हाड़ी चलाता रहा। फिर बेदम होकर वहीं सिर पकड़ के बैठ गया। इतने में वही गोंड़ आ गया। बोला, ‘क्यों जान देते हो बूढ़े दादा, तुम्हारे फाड़े यह गाँठ न फटेगी। नाहक हलाकान होते हो।‘
दुखी ने माथे का पसीना पोंछकर कहा, ‘अभी गाड़ी भर भूसा ढोना है भाई !’
गोंड़ –‘क़ुछ खाने को मिला कि काम ही कराना जानते हैं। जाके माँगते क्यों नहीं ?’
दुखी –‘क़ैसी बात करते हो चिखुरी, बाह्मन की रोटी हमको पचेगी !’
गोंड़ –‘पचने को पच जायगी, पहले मिले तो। मूँछों पर ताव देकर भोजन किया और आराम से सोये, तुम्हें लकड़ी फाड़ने का हुक्म लगा दिया। ज़मींदार भी कुछ खाने को देता है। हाकिम भी बेगार लेता है, तो थोड़ी बहुत मजूरी देता है। यह उनसे भी बढ़ गये, उस पर धर्मात्मा बनते हैं।‘
दुखी –‘धीरे-धीरे बोलो भाई, कहीं सुन लें तो आफत आ जाय।‘
यह कहकर दुखी फिर सँभल पड़ा और कुल्हाड़ी की चोट मारने लगा। चिखुरी को उस पर दया आई। आकर कुल्हाड़ी उसके हाथ से छीन ली और कोई आधा घंटे खूब कस-कसकर कुल्हाड़ी चलाई; पर गाँठ में एक दरार भी न पड़ी। तब उसने कुल्हाड़ी फेंक दी और यह कहकर चला गया तुम्हारे फाड़े यह न फटेगी, जान भले निकल जाय।‘
दुखी सोचने लगा, बाबा ने यह गाँठ कहाँ रख छोड़ी थी कि फाड़े नहीं फटती। कहीं दरार तक तो नहीं पड़ती। मैं कब तक इसे चीरता रहूँगा। अभी घर पर सौ काम पड़े हैं। कार-परोजन का घर है, एक-न-एक चीज़ घटी ही रहती है; पर इन्हें इसकी क्या चिंता। चलूँ जब तक भूसा ही उठा लाऊँ। कह दूँगा, बाबा, आज तो लकड़ी नहीं फटी, कल आकर फाड़ दूँगा। उसने झौवा उठाया और भूसा ढोने लगा। खलिहान यहाँ से दो फरलांग से कम न था। अगर झौवा खूब भर-भर कर लाता तो काम जल्द खत्म हो जाता; फि र झौवे को उठाता कौन। अकेले भरा हुआ झौवा उससे न उठ सकता था। इसलिए थोड़ा-थोड़ा लाता था। चार बजे कहीं भूसा खत्म हुआ। पंडितजी की नींद भी खुली। मुँह-हाथ धोया, पान खाया और बाहर निकले। देखा, तो दुखी झौवा सिर पर रखे सो रहा है। ज़ोर से बोले –‘अरे, दुखिया तू सो रहा है ? लकड़ी तो अभी ज्यों की त्यों पड़ी हुई है। इतनी देर तू करता क्या
रहा ? मुट्ठी भर भूसा ढोने में संझा कर दी ! उस पर सो रहा है। उठा ले कुल्हाड़ी और लकड़ी फाड़ डाल। तुझसे जरा-सी लकड़ी नहीं फटती। फिर साइत भी वैसी ही निकलेगी, मुझे दोष मत देना ! इसी से कहा, है कि नीच के घर में खाने को हुआ और उसकी आँख बदली।‘
दुखी ने फिर कुल्हाड़ी उठाई। जो बातें पहले से सोच रखी थीं, वह सब भूल गईं। पेट पीठ में धॉसा जाता था, आज सबेरे जलपान तक न किया था। अवकाश ही न मिला। उठना ही पहाड़ मालूम होता था। जी डूबा जाता था, पर दिल को समझाकर उठा। पंडित हैं, कहीं साइत ठीक न विचारें, तो फिर सत्यानाश ही हो जाय। जभी तो संसार में इतना मान है। साइत ही का तो सब खेल है। जिसे चाहे बिगाड़ दें। पंडितजी गाँठ के पास आकर
खड़े हो गये और बढ़ावा देने लगे हाँ, मार कसके, और मार क़सके मार अबे ज़ोर से मार तेरे हाथ में तो जैसे दम ही नहीं है लगा कसके, खड़ा सोचने क्या लगता है हाँ बस फटा ही चाहती है ! दे उसी दरार में ! दुखी अपने होश में न था। न-जाने कौन-सी गुप्तशक्ति उसके हाथों को चला रही थी। वह थकान, भूख, कमज़ोरी सब मानो भाग गई। उसे अपने बाहुबल पर स्वयं आश्चर्य हो रहा था। एक-एक चोट वज्र की तरह पड़ती थी। आधा घण्टे तक वह इसी उन्माद की दशा में हाथ चलाता रहा, यहाँ तक कि लकड़ी बीच से फट गई और दुखी के हाथ से कुल्हाड़ी छूटकर गिर पड़ी। इसके साथ वह भी चक्कर खाकर गिर पड़ा। भूखा, प्यासा, थका हुआ शरीर जवाब दे गया।
पंडितजी ने पुकारा, ‘उठके दो-चार हाथ और लगा दे। पतली-पतली चैलियाँ हो जायँ। दुखी न उठा। पंडितजी ने अब उसे दिक करना उचित न समझा। भीतर जाकर बूटी छानी, शौच गये, स्नान किया और पंडिताई बाना पहनकर बाहर निकले ! दुखी अभी तक वहीं पड़ा हुआ था। ज़ोर से पुकारा –‘अरे क्या पड़े ही रहोगे दुखी, चलो तुम्हारे ही घर चल रहा हूँ। सब सामान ठीक-ठीक है न ? दुखी फिर भी न उठा।‘
अब पंडितजी को कुछ शंका हुई। पास जाकर देखा, तो दुखी अकड़ा पड़ा हुआ था। बदहवास होकर भागे और पंडिताइन से बोले, ‘दुखिया तो जैसे मर गया।‘
पंडिताइन हकबकाकर बोलीं—‘वह तो अभी लकड़ी चीर रहा था न ?’
पंडित –‘हाँ लकड़ी चीरते-चीरते मर गया। अब क्या होगा ?’
पंडिताइन ने शान्त होकर कहा, ‘होगा क्या, चमरौने में कहला भेजो मुर्दा उठा ले जायँ।‘

एक क्षण में गाँव भर में खबर हो गई। पूरे में ब्राह्मनों की ही बस्ती थी। केवल एक घर गोंड़ का था। लोगों ने इधर का रास्ता छोड़ दिया। कुएं का रास्ता उधर ही से था, पानी कैसे भरा जाय ! चमार की लाश के पास से होकर पानी भरने कौन जाय। एक बुढ़िया ने पण्डितजी से कहा, अब मुर्दा फेंकवाते क्यों नहीं ? कोई गाँव में पानी पीयेगा या नहीं। इधर गोंड़ ने चमरौने में जाकर सबसे कह दिया ख़बरदार, मुर्दा उठाने मत जाना। अभी पुलिस की तहकीकात होगी। दिल्लगी है कि एक गरीब की जान ले ली। पंडितजी होंगे, तो अपने घर के होंगे। लाश उठाओगे तो तुम भी पकड़ जाओगे। इसके बाद ही पंडितजी पहुँचे; पर चमरौने का कोई आदमी लाश उठा लाने को तैयार न हुआ, हाँ दुखी की स्त्री और कन्या दोनों हाय-हाय करती वहाँ चलीं और पंडितजी के द्वार पर आकर सिर पीट-पीटकर रोने लगीं। उनके साथ दस-पाँच और चमारिनें थीं। कोई रोती थी, कोई समझाती थी, पर चमार एक भी न था। पण्डितजी ने चमारों को बहुत धामकाया, समझाया, मिन्नत की; पर चमारों के दिल पर पुलिस का रोब छाया हुआ था, एक भी न मिनका। आखिर निराश होकर लौट आये।
आधी रात तक रोना-पीटना जारी रहा। देवताओं का सोना मुश्किल हो गया। पर लाश उठाने कोई चमार न आया और ब्राह्मन चमार की लाश कैसे उठाते ! भला ऐसा किसी शास्त्र-पुराण में लिखा है ? कहीं कोई दिखा दे। पंडिताइन ने झुँझलाकर कहा, ‘इन डाइनों ने तो खोपड़ी चाट डाली। सभों का गला भी नहीं पकता। पंडित ने कहा, रोने दो चुड़ैलों को, कब तक रोयेंगी। जीता था, तो कोई बात न पूछता था। मर गया, तो कोलाहल मचाने के लिए सब की सब आ पहुँचीं।‘
पंडिताइन –‘चमार का रोना मनहूस है।‘
पंडित –‘हाँ, बहुत मनहूस।‘
पंडिताइन –‘अभी से दुर्गन्ध उठने लगी।‘
पंडित –‘चमार था ससुरा कि नहीं। साध-असाध किसी का विचार है इन सबों को।‘
पंडिताइन –‘इन सबों को घिन भी नहीं लगती।‘
पंडित—‘ भ्रष्ट हैं सब।‘
रात तो किसी तरह कटी; मगर सबेरे भी कोई चमार न आया। चमारिनें भी रो-पीटकर चली गईं। दुर्गन्ध कुछ-कुछ फैलने लगी। पंडितजी ने एक रस्सी निकाली। उसका फन्दा बनाकर मुरदे के पैर में डाला और फन्दे को खींचकर कस दिया। अभी कुछ-कुछ धुँधलका था। पंडितजी ने रस्सी पकड़कर लाश को घसीटना शुरू किया और गाँव के बाहर घसीट ले गये। वहाँ से आकर तुरन्त स्नान किया, दुर्गापाठ पढ़ा और घर में गंगाजल छिड़का।
उधर दुखी की लाश को खेत में गीदड़ और गिद्ध, कुत्ते और कौए नोच रहे थे। यही जीवन-पर्यन्त की भक्ति, सेवा और निष्ठा का पुरस्कार था।