Monday, November 30, 2015

हरीश रावत के जिंदल प्रेम में एक्‍सपोज़ हुई भाजपा, पीसी तिवारी व अन्‍य हिरासत में पुष्‍कर सिंह बिष्‍ट । अल्मोड़ा

हरीश रावत के जिंदल प्रेम में एक्‍सपोज़ हुई भाजपा, पीसी तिवारी व अन्‍य हिरासत में


पुष्‍कर सिंह बिष्‍ट । अल्मोड़ा


रानीखेत के नैनीसार में जिंदल समूह को कौड़ियों के भाव ग्रामीणों की जमीन देने के विरोध में आए उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के पीसी तिवारी व उनके आठ सहयोगियों सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणों खासकर महिलाओं को पुलिस दमन का शिकार होना पड़ा। इलाके को पुलिस छावनी बनाकर मुख्यमंत्री ने इस कथित अंतरराष्‍ट्रीय स्कूल का उद्घाटन आखिरकार कर ही डाला। गुरुवार की सुबह जब परिवर्तन पार्टी के सदस्‍यों का दल कार्यक्रम स्थल की ओर रवाना हुआ तो कटारमल के पास पुलिस ने पीसी तिवारी, जीवन चंद्र, प्रेम आर्या, अनूप तिवारी, राजू गिरी आदि को हिरासत में ले लिया। देर शाम तक इन लोगों को नहीं छोड़ा गया था। 




इधर ग्रामीणों का एक बड़ा समूह जिसमें महिलाएं भी थीं, उन्‍हें पुलिस ने झड़प के बाद मजखाली के आसपास जंगल में रोक लिया और उनकी विरोध सामग्री, तख्ती, झण्डे आदि भी जला दिए। भाजपा नेता व पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन राम को भी हिरासत में लेने का समाचार है। 

उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी ने इसके विरोध में अल्मोड़ा में मुख्यमंत्री का पुतला फूंका। इस मुद्दे पर कई दिनों से मीडिया में हो हल्ला करने वाले भाजपा नेता अजय भट्ट कार्यक्रम स्थल पर तो नहीं गए अलबत्ता भाजपा नेता इस मामले में कन्नी काटते रहे। भाजपा सांसद मनोज तिवारी के मौके पर आने से पूरी भाजपा को मानो सांप सूंघ गया। कई भाजपा नेताओं ने यहां तक कहा कि मामला उनकी समझ में अभी नहीं आया है। सुबह से ही जिंदल समूह के इस कार्यक्रम की तैयारी के अखबारों में जो विज्ञापन दिखे उसमें भाजपा सांसद अजय टम्टा व अनेक स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बधाई संदेश थे जिससे पूरी भाजपा बैक फुट पर दिखी। ज्ञात हो कि अल्मोड़ा जिला में डीडा (द्वारसों) के तोक नौनीसार की 353 नाली (7.061 हेक्टेयर) भूमि प्रदेश सरकार दिल्ली की हिमांशु एजुकेशन सोसायटी को आवंटित करने की प्रक्रिया से सन्देह के घेरे में आ गयी है। स्थानीय ग्रामीण इसके विरोध में सड़क पर उतर आये हैं। 

अल्मोड़ा-रानीखेत के बीच द्वारसों क्षेत्र प्राकृतिक रूप से बहुत सुन्दर है। द्वारसों से काकड़ीघाट के लिये कई दशक से बन रहे मोटर मार्ग में मात्र 3 कि.मी. पर सड़क के किनारे नानीसार नामक तोक है जिसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार बहुत गुपचुप तरीके से जिन्दल समूह की इस संस्था को कथित इन्टरनेशनल स्कूल के लिये कौडि़यों के भाव आवंटित कर रही है किन्तु आवंटन प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही दबंग संस्था ने जमीन पर कब्जा कर लिया है। 

कुमाऊँ में सार का मतलब खेती की जमीन से होता है। नानीसार का मतलब ही छोटी खेती की जमीन से है। प्रदेश सरकार के निर्देश पर प्रशासन ने इस जमीन के आवंटन की प्रक्रिया को इतने गोपनीय ढंग से अंजाम दिया कि डीडा के ग्रामीणों को 25 सितम्बर को इसका पता तब चला जब हिमांशु एजुकेशनल सोसायटी दिल्ली 260 जी.एल.एफ. तथा शिवाजी मार्ग नई दिल्ली के दर्जनों मजदूर व जे.सी.बी. मशीनों ने उनकी जमीन पर सड़क निर्माण, पेड़ों का विध्वंस व घेरबार शुरू कर दी। ग्रामीणों द्वारा हाथ पांव मारने के बावजूद जमीन पर कब्जा कर रहे लोगों एवं प्रशासन ने उन्हें कोई जानकारी नहीं दी। इस घटना के विरोध में 2 अक्टूबर को ग्रामीणों ने नैनीसार में धरना दिया, तब रानीखेत तहसील से पटवारी व पुलिस ने आकर उन्हें कार्य में व्यवधान न डालने की चेतावनी दी। ग्रामीणों ने एस.डी.एम. रानीखेत को ज्ञापन भी दिया। 8 अक्टूबर को दर्जनों ग्रामीण जिला मुख्यालय पर आये व वहां मौजूद ए.डी.एम. इला गिरी को इस दबंगई के खिलाफ ज्ञापन दिया। इसी दिन ग्रामीणों का यह दल उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी से मिला व अपनी जमीन बचाने में मदद की गुहार की।  

उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी ने 9 अक्टूबर को जिला अधिकारी विनोद कुमार सुमन से मिल कर प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन देकर ग्रामीणों की भूमि पर अतिक्रमण रोकने, पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच व इस मामले से जुड़े सभी तथ्यों से सार्वजनिक करने की मांग की। 

11 अक्टूबर को डीडा-द्वारसों के ग्रामीणों के आमंत्रण पर उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के एक दल ने ग्रामीणों के साथ घटनास्थल का दौरा किया। घटनास्थल पर जिन्दल का स्कूल खोलने का बोर्ड लगा है व रोड़ से लगी भूमि पर खुदान सड़क निर्माण हो चुका है। बांज, काफल, चीड़ के पेड़ जमींदोज किये जा चुके हैं। मौके पर विद्युत विभाग का ट्रांसफार्मर लगा था, संस्था व पट्टी पटवारी के पास जमीन के कागजात नहीं थे और संस्था द्वारा वहां किये जा रहे विनाश को लेकर एस.डी.एम. रानीखेत, ए.पी.बाजपेयी को मौके पर जानकारी दी। मौके पर क्षेत्रीय पटवारी आया पर निर्माण कर रही संस्था व पटवारी के पास जमीन का कब्जा लेने का कोई आदेश नहीं था। 

इस बीच सूचना अधिकार अधिनियम से प्राप्त जानकारी से साफ हो गया है कि राजस्व अभिलेखों में श्रेणी 9(3)5 कृषि योग्य बंजर भूमि में दर्ज 7.061 हे. भूमि अभी तक भी नैनीसार डीडा द्वारसों की जमीन का जिन्दल ग्रुप के पक्ष में हस्तान्तरण नहीं हुआ। 

इस मामले में नियमानुसार ग्राम सभा की आम बैठक नहीं हुई और न ही आम ग्रामवासियों से अनापत्ति ली गयी। इस गांव के ग्राम प्रधान गोकुल सिंह राणा का एक अनापत्ति प्रमाण पत्र जिस पर 23 जुलाई 2015 की तिथि है, इसमें अनापत्ति प्रमाण पत्र देेते हुए लिखा है कि जमीन सार्वजनिक उपयोग व धार्मिक प्रयोजन की नहीं है जबकि जिला अधिकारी कार्यालय के पत्र पत्रांक 6444/सत्ताईस-19-15-15, दिनांक 29 जुलाई, 2013 में तीन बिन्दुओं के साथ ग्राम सभा की खुली बैठक में ग्राम की जनता ग्राम प्रधान प्राप्त अनापत्ति प्रस्ताव की सत्यापित प्रति मांगी गयी है। ग्रामीणों ने 15 अक्टूबर को उपजिलाअधिकारी रानीखेत के यहां हुए विरोध प्रदर्शन में ज्ञापन देकर कहा है कि ग्रामवासियों की खुली बैठक में कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं किया गया। यदि ऐसा फर्जी दस्तावेज तैयार किया गया है तो ऐसा करने वालों पर कार्यवाही की जाय। ग्रामीणों ने अतिक्रमणकारियों द्वारा लोभ-लालच देने, जबरन उठवा देने व जान से मारने की धमकी देने का आरोप भी लगाया है। 

इस भूमि का मूल्य रू. 4,16,59,900/- (चार करोड़ सोलह लाख उनसठ हजार नौ सौ रूपया) लगाया गया है। वार्षिक किराया मात्र 1996.80 पैसा लिखा गया है। इसी आधार पर उत्तराखण्ड सरकार ने 22 सितम्बर, 2015 को सचिव, उत्तराखण्ड शासन डी.एस.गब्र्याल की ओर से जारी शासनादेश में गवर्नमेन्‍ट ग्रान्ट एक्ट के अधीन पहले 30 वर्ष के लिये 2 लाख रूपये वार्षिक दर व 1196.80 किराये पर पट्टा निर्गत करने हेतु नियमानुसार अग्रिम कार्यवाही करने के आदेश दिये। इसका 7 अक्टूबर को उपजिलाअधिकारी ने पट्टे पर सशुल्क आवंटन करने हेतु अपनी आख्या दी। स्वयं तत्कालीन जिलाधिकारी विनोद कुमार सुमन ने सचिव डी.एस.गब्र्याल द्वारा जारी शासनादेश के बिन्दु 9 जिसमें सर्वोच्च न्यायालय जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य एवं झारखण्ड राज्य व अन्य बनाम पाकुर जागरण मंच व अन्य में न्यायालय के निर्देश का पालन सुनिश्चित करने को कहा है, जिस पर उपजिलाअधिकारी रानीखेत की आख्या अभी तक प्राप्त नहीं है। लेकिन अल्मोड़ा के जिला प्रशासन ने 25 सितम्बर को ही मिलीभगत कर उक्त भूमि पर जबरन संस्था को कब्जा करा दिया। 

ग्रामीणों का आरोप है कि उक्त भूमि उनकी नाप भूमि थी, जिसे बन्दोबस्त में गलत दर्ज किया गया। वहां वन पंचायत बनी है, चीड़ के पेड़ों पर लीसा लगा है, गांव का एक छोटा मन्दिर (थान) है लेकिन इन सभी की सरकार के इशारे पर अनदेखी की गयी है। जिन्दल समूह की इस कथित सोसायटी के दलाल अब ग्रामीणों को धमकाने, लालच देने व धन के जोर पर दुष्चक्र व गिरोहबन्दी में लग गये हैं। सरकार के इशारे पर कांग्रेस पार्टी से जुड़े लोगों को आगे कर ग्रामीणों के विरोध को दबाने की नाकाम कोशिश हो रही है। दिलचस्‍प बात यह है कि हिमांशु एजुकेशनल सोसायटी द्वारा जो प्रस्ताव प्रदेश के मुख्यमंत्री को दिया गया है उसमें उत्तराखण्ड के किसानों, मजदूरों के बच्चों की पढ़ाई इस कथित इण्टरनेशनल स्कूल में करने की कोई व्यवस्था नहीं है। शासनादेश में भी केवल अधिकारियों/कर्मचारियों के बच्चों को शिक्षा देने का जिक्र किया गया है। 

इस सोसायटी के दस्तावेजों में साफ है कि इस कथित अंतरराष्‍ट्रीय स्कूल में विदेशी छात्र पढ़ेंगे और 30 प्रतिशत कोटे पर उत्तराखण्ड के अधिकारियों व नेताओं के बच्चों को सीट दी जाएगी। फिलहाल हरीश रावत जिसे उत्तराखण्ड का जमीनी नेता कहा जाता है, उनकी इस घटना से खूब किरकिरी हुई है। माना जा रहा है कि यह मामला दिल्ली में सोनिया दरबार तक जा सकता है। इस घटना में कन्नी काटने पर यूकेडी, भाजपा जैसे अन्य दलों की भी पोल खुली है जो उत्तराखण्ड के नाम पर लोगों से भावनात्मक खिलवाड़ करते हैं। 

मेरे लेखकों! किसका इंतज़ार है और कब तक?

मेरे लेखकों! किसका इंतज़ार है और कब तक?

पाणिनि आनंद 
करीब सात हफ्ते पहले हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक उदय प्रकाश ने जब अपना साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटाया था तब उनसे सबसे पहला विस्‍तृत साक्षात्‍कारकैच न्‍यूज़ के वरिष्‍ठ सहायक संपादक पाणिनि आनंदने  लिया था। यह साक्षात्‍कार 6 सितंबर को प्रकाशित हुआ था लेकिन कई तथ्‍य इसमें संपादित कर दिए गए थे। उस वक्‍त तक न तो यह अंदाज़ा था कि पुरस्‍कार वापसी की यह इकलौती कार्रवाई एक चिंगारी का काम करेगी, न ही यह इलहाम था कि साहित्‍य अकादमी को अपने कदम पीछे खींचने पड़ेंगे और लेखकों की हत्‍याओं की औपचारिक निंदा करने को मजबूर होना पड़ेगा। आज जब करीब चार दर्जन लेखकों की पुरस्‍कार वापसी के बाद सरकार की इस ''स्‍वायत्‍त'' संस्‍था को झुकना पड़ा है और आंदोलन अपने पहले चरण को तकरीबन पूरा कर चुका है, तो लेखकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब आगे क्‍या होगा? सरकार विचलित है तो लेखक भी चिंतित हैं। इस समूचे अध्‍याय पर पाणिनि आनंद ने इस बार ख़बर से आगे बढ़कर एक प्रेरणादायी और आवाहनकारी लेख लिख डाला है जो उदय प्रकाश के साक्षात्‍कार के छूट गए अंशों को मिलाकर काफी तथ्‍यात्‍मक और प्रेरणादायी बन पड़ा है। यह लेख बीते डेढ़ महीनों में घटी घटनाओं पर प्रकाश डालते हुए भविष्‍य की भी पड़ताल करता है। (मॉडरेटर)  



ग्राफिक्‍स: साभार कैच न्‍यूज़ 




इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत के लेखकों और कवियों ने साहित्‍य अकादमी से मिले पुरस्‍कार (और एक मामले में पद्मश्री) लौटा कर इतिहास बनाया है।

यह इसलिए और ज्‍यादा अहम है क्‍योंकि पुरस्‍कार लौटाने वाले लेखक किसी एक पंथ या विचारधारा के वाहक नहीं हैं, वे किसी एक भाषा में नहीं लिखते और किसी जाति अथवा धर्म विशेष से नहीं आते। इनका खानपान भी एक जैसा नहीं है। कोई सांभरप्रेमी है, कोई गोबरपट्टी का वासी है तो कोई द्रविड़ है।

ये सभी अलग-अलग पृष्‍ठभूमि से आते हैं। इनकी संवेदनाएं भिन्‍न हैं और इनकी आर्थिक पृष्‍ठभूमि भी भिन्‍न है। बावजूद इसके, ये सभी एक सूत्र से परस्‍पर बंधे हुए हैं। यह सूत्र वो संदेश है जो ये लेखक सामूहिक रूप से संप्रेषित करना चाहते हैं, ''मोदीजी, हम आपसे अहमत हैं, हम आपकी नाक के नीचे आपकी विचारधारा वाले लोगों द्वारा अभिव्‍यक्ति की आज़ादी पर किए जा रहे हमलों से आहत हैं।''

कैसे सुलगी चिंगारी

इस ऐतिहासिक अध्‍याय की शुरुआत कन्‍नड़ के तर्कवादी लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हत्‍या से हुई थी।    

इस घटना के सिलसिले में हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक उदय प्रकाश के साथ पत्रकार और प्रगतिशील कवि अभिषेक श्रीवास्‍तव की बातचीत हो रही थी। कलबुर्गी और उससे पहले नरेंद्र दाभोलकर व गोविंद पानसारे की सिलसिलेवार हत्‍या पर दोनों एक-दूसरे से अपनी चिंताएं साझा कर रहे थे। नफ़रत और गुंडागर्दी की इन घटनाओं के खिलाफ़ दोनों एक भीषण प्रतिरोध खड़ा करने पर विचार कर रहे थे।

उदय प्रकाश इस बात से गहरे आहत थे कि साहित्‍य अकादमी ने कलबुर्गी की हत्‍या पर शोक में एक शब्‍द तक नहीं कहा। उनके लिए एक शोक सभा तक नहीं रखी गई। प्रकाश कहते हैं, ''आखिर अकादमी किसी ऐसे शख्‍स को पूरी तरह कैसे अलग-थलग छोड़ सकती है जिसे उसने कभी अपने सबसे प्रतिष्ठित पुरस्‍कार से नवाज़ा थायह तो बेहद दर्दनाक और हताशाजनक है।''

फिर उन्‍होंने विरोध का आगाज़ करते हुए पुरस्‍कार लौटाने का फैसला लिया और अगले ही दिन इसकी घोषणा भी कर दी। इस घोषणा के बाद दिए अपने पहले साक्षात्‍कार में उदय ने कैच को (''नो वन हु स्‍पीक्‍स अप इज़ सेफ टुडे'', 6 सितंबर 2015) इसके कारणों के बारे में बताया था और यह भी कहा था कि दूसरे लेखकों को भी यही तरीका अपनाना चाहिए।

विरोध का विरोध

अब तक कई अन्‍य लेखक और कवि अपने पुरस्‍कार लौटा चुके हैं। बीते 20 अक्‍टूबर को दिल्‍ली के प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया में आयोजित लेखकों व कवियों की एक प्रतिरोध सभा ने अभिव्‍यक्ति की आज़ादी पर हमले की कठोर निंदा की।

फिर 23 अक्‍टूबर को कई प्रतिष्ठित लेखकों, कवियों, पत्रकारों और फिल्‍मकारों की अगुवाई में एक मौन जुलूस साहित्‍य अकादमी तक निकाला गया और उसे एक ज्ञापन सौंपा गया।

इनका स्‍वागत करने के लिए वहां पहले से ही मुट्ठी भर दक्षिणपंथी लेखक, प्रकाशक और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता जमा थे जो ''पुरस्‍कार वापसी तथा राजनीतिक एजेंडा वाले कुछ लेखकों द्वारा अकादमी के अपमान'' का विरोध कर रहे थे।

साहित्‍य अकादमी के परिसर के भीतर जिस वक्‍त ये दोनों प्रदर्शन जारी थे, मौजूदा हालात पर चर्चा करने के लिए अकादमी की एक उच्‍चस्‍तरीय बैठक भी चल रही थी।

बैठक के बाद अकादमी ने एक संकल्‍प पारित किया जिसमें कहा गया है: ''जिन लेखकों ने पुरस्‍कार लौटाए हैं या खुद को अकादमी से असम्‍बद्ध कर लिया है, हम उनसे उनके निर्णय पर पुनर्विचार करने का अनुरोध करते हैं।''

और सत्‍ता हिल गई

जिस देश में क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक और कवि इन पुरस्‍कारों से मिली राशि के सहारे थोड़े दिन भी गुज़र नहीं कर पाते, वहां ''ब्‍याज समेत पैसे लौटाओ'' जैसी प्रतिक्रियाओं का आना बेहद शर्मनाक हैं।

राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ और उसकी अनुषंगी संस्‍थाओं के सदस्‍यों और नेताओं की ओर से जिस किस्‍म के भड़काने वाले बयान इस मसले पर आए हैं, उसने यह साबित कर दिया है कि लेखक सरकार का ध्‍यान इस ओर खींचने के प्रयास में असरदार रहे हैं।

और हां, जेटलीजी, जब आप कहते हैं कि यह प्रतिरोध नकली है, तो समझिए कि आप गलत लीक पर हैं। लेखक दरअसल इससे कम और कर भी क्‍या सकता है। सत्‍ता प्रतिष्‍ठान के संरक्षण में जिस किस्‍म की बर्बरताएं की जा रही हैं, हर रोज़ जिस तरह एक न एक घटना को अंजाम दिया जा रहा है और देश का माहौल बिगाड़ा जा रहा है, यह एक अदद विरोध के लिए पर्याप्‍त कारण मुहैया कराता है।

अब आगे क्‍या?

लेखकों व कवियों के सामने फिलहाल जो सबसे अहम सवाल है, वो है कि अब आगे क्‍या?

यह लड़ाई सभी के लिए बराबर सम्‍मान बरतने वाले और बहुलता, विविधता व लोकतंत्र के मूल्‍यों में आस्‍था रखने वाले इस देश के नागरिकों तथा कट्टरपंथी गुंडों के गिरोह व उन्‍हें संरक्षण देने वाले सत्‍ता प्रतिष्‍ठान के बीच है।

इस प्रदर्शन ने स्‍पष्‍ट तौर पर दिखा दिया है कि लेखक बिरादरी इनसे कतई उन्‍नीस नहीं है, लेकिन अभी लेखकों के लिए ज्‍यादा अहम यह है कि वे व्‍यापक जनता के बीच अपनी आवाज़ को कैसे बुलंद करें। ऐसा महज पुरस्‍कार लौटाने से नहीं होने वाला है। यह तो फेसबुक पर 'लाइक' करने जैसी एक हरकत है जिससे कुछ ठोस हासिल नहीं होता।

एकाध छिटपुट उदाहरणों को छोड़ दें, तो बीते कुछ दशकों के दौरान साहित्‍य में कोई भी मज़बूत राजनीतिक आंदोलन देखने में नहीं आया है। कवि और लेखकों को सड़कों पर उतरे हुए और जनता का नेतृत्‍व किए हुए बरसों हो गए।

मुझे याद नहीं पड़ता कि पिछली बार कब इस देश के लेखकों ने किसानों की खुदकशी, दलितों के उत्‍पीड़न, सांप्रदायिक हिंसा और लोकतांत्रिक मूल्‍यों व नागरिक स्‍वतंत्रता पर हमलों के खिलाफ कोई आंदोलन किया था। वे बेशक ऐसे कई विरोध प्रदर्शनों का हिस्‍सा रहे हैं, लेकिन नेतृत्‍वकारी भूमिका उनके हाथों में कभी नहीं रही। न ही पिछले कुछ वर्षों में कोई ऐसा महान साहित्‍य ही रचा गया है जिसने किसी सामाजिक सरोकार को मदद की हो।

पिछलग्‍गू न बनें, नेतृत्‍व करें

एक लेखक आखिर है कौनवह शख्‍स, जो समाज के बेहतर और बदतर तत्‍वों की शिनाख्‍त करता है और उसे स्‍वर देता है।

एक कवि होने का मतलब क्‍या हैवह शख्‍स, जो ऐसे अहसास, भावनाओं और अभिव्‍यक्तियों को इस तरह ज़ाहिर कर सके कि जिसकी अनुगूंज वृहत्‍तर मानवता में हो।

मेरे प्रिय लेखक, आप ही हमारी आवाज़ हैं, हमारी कलम भी, हमारा काग़ज़ और हमारी अभिव्‍यक्ति भी। वक्‍त आ गया है कि आप आगे बढ़कर चीज़ों को अपने हाथ में लें।

अब आपको जनता के बीच निकलना होगा और उसे संबोधित करना ही होगा, फिर चाहे वह कहीं भी हो- स्‍कूलों और विश्‍वविद्यालयों में, सार्वजनिक स्‍थलों पर, बाज़ार के बीच, नुक्‍कड़ की चाय की दुकान पर, राजनीतिक हलकों में, समाज के विभिन्‍न तबकों के बीच और अलग-अलग सांस्‍कृतिक कोनों में। 

और बेशक उन मोर्चों पर भी जहां जनता अपने अधिकारों के लिए लड़ रही है- दिल्‍ली की झुग्गियों से लेकर कुडनकुलम तक और जैतापुर से लेकर उन सुदूर गांवों तक, जहां ज़मीन की मुसलसल लूट जारी है।

आपको उन ग्रामीण इलाकों में जाना होगा जहां बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां संसाधनों को लूट रही हैं: उन राजधानियों व महानगरों में जाइए, जहां कॉरपोरेट ताकतों ने कानूनों और नीतियों को अपना बंधक बना रखा है और करोड़ों लोगों की आजीविका से खिलवाड़ कर रही हैंकश्‍मीर और उत्‍तर-पूर्व को मत भूलिएगा जहां जम्‍हूरियत संगीन की नोक पर है। इस देश के लोगों को आपकी ज़रूरत है।

सबसे कमज़ोर कड़ी

इन लोगों के संघर्षों को महज़ अपनी कहानियों और कविताओं में जगह देने से बात नहीं बनने वाली, न ही आपका पुरस्‍कार लौटाना जनता की अभिव्‍यक्ति की आज़ादी को बहाल कर पाएगा। अगर आप ऐसा वाकई चाहते हैं, तो आपको इसे जीवन-मरण का सवाल बनाना पड़ेगा। आपको नवजागरण का स्‍वर बनना पड़ेगा।

ऐसा करना इसलिए भी ज़रूरी है क्‍योंकि सरकार अब इस सिलसिले की सबसे कमज़ोर कडि़यों को निशाना बनाने की कोशिश में जुट गई है। उर्दू के शायर मुनव्‍वर राणा, जिन्‍होंने टीवी पर एक बहस के दौरान नाटकीय ढंग से अपना साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटा दिया था, कह रहे हैं कि उन्‍हें प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया था और अगले कुछ दिनों में उन्‍हें मोदी से मिलने के लिए बुलाया गया है।

राणा एक ऐसे लोकप्रिय शायर हैं जिन्‍होंने सियासी मौकापरस्‍ती की फसल काटने में अकसर कोई चूक नहीं की है। उनके जैसी कमज़ोर कड़ी का इस्‍तेमाल कर के सरकार लेखकों की सामूहिक कार्रवाई को ध्‍वस्‍त कर सकती है।

ऐसा न होने पाए, इसका इकलौता तरीका यही है कि जनता का समर्थन हासिल किया जाए। लेखक और कवि आज यदि जनता के बीच नहीं गया, तो टीवी की बहसें और उनमें नुमाया लिजलिजे चेहरे एजेंडे पर कब्‍ज़ा जमा लेंगे।

जनता का समर्थन हासिल करने, अपना सिर ऊंचा उठाए रखने, इस लड़ाई को आगे ले जाने और पुरस्‍कार वापसी की कार्रवाई को सार्थकता प्रदान करने के लिए हरकत में आने का सही वक्‍त यही है। मेरे लेखकों और कवियों, बात बस इतनी सी है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। किसका इंतज़ार है और कब तकजनता को तुम्‍हारी ज़रूरत है!


(साभार: कैच न्‍यूज़, अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्‍तव) 



हमारे ऋषि-मुनियों ने हज़ारों साल पहले खोज लिया था सारी समस्‍याओं का समाधान : कैलाश सत्‍यार्थी

हमारे ऋषि-मुनियों ने हज़ारों साल पहले खोज लिया था सारी समस्‍याओं का समाधान : कैलाश सत्‍यार्थी

शांति के लिए नोबल पुरस्‍कार मिलने के बाद कैलाश सत्‍यार्थी की सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया बेहद कम देखने में आई है। इधर बीच उन्‍होंने हालांकि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्‍य को एक लंबा साक्षात्‍कार दिया है जो 9 नवंबर को वहां प्रकाशित हुआ है। उससे दो दिन पहले बंगलुरु प्रेस क्‍लब में उन्‍होंने समाचार एजेंसी पीटीआइ से बातचीत में कहा था कि देश में फैली असहिष्‍णुता से निपटने का एक तरीका यह है कि यहां की शिक्षा प्रणाली का ''भारतीयकरण'' कर दिया जाए। उन्‍होंने भगवत गीता को स्‍कूलों में पढ़ाए जाने की भी हिमायत की, जिसकी मांग पहले केंद्रीय मंत्री सुषमा स्‍वराज भी उठा चुकी हैं। शिक्षा के आसन्‍न भगवाकरण और देश में फैले साम्‍प्रदायिक माहौल के बीच नोबल पुरस्‍कार विजेता सत्‍यार्थी के पांचजन्‍य में छपे इस अहम साक्षात्‍कार के कुछ अंश हम यहां साभार पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं। -मॉडरेटर 



कैलाश सत्‍यार्थी 



नोबल पुरस्कार ग्रहण करते समय आपने अपने भाषण की शुरुआत वेद मंत्रों से की थी। इसके पीछे क्या प्रेरणा थी?
शांति के नोबल पुरस्कार की घोषणा के बाद जब मुझे पता चला कि भारत की मिट्टी में जन्मे किसी भी पहले व्यक्ति को अब तक यह पुरस्कार नहीं मिल पाया है तो मैं बहुत गौरवान्वित हुआ। अपने देश और महापुरुषों के प्रति नतमस्तक भी। मैंने सोचा कि दुनिया के लोगों को शांति और सहिष्णुता का संदेश देने वाली भारतीय संस्कृति और उसके दर्शन से परिचित करवाने का यह उपयुक्त मंच हो सकता है। मैंने अपना भाषण वेद मंत्र और हिंदी से शुरू किया। बाद में मैंने उसे अंग्रेजी में लोगों को समझाया। मैंने
संगच्छध्वम् संवदध्वम् संवो मनांसि जानताम्
देवा भागम् यथापूर्वे संजानानाम् उपासते!!
का पाठ करते हुए लोगों को बताया कि इस एक मंत्र में ऐसी प्रार्थना, कामना और संकल्प निहित है जो पूरे विश्व को मनुष्य निर्मित त्रासदियों से मुक्ति दिलाने का सामर्थ्य रखती है। मैंने इस मंत्र के माध्यम से पूरी दुनिया को यह बताने की कोशिश की कि संसार की आज की समस्याओं का समाधान हमारे ऋषि मुनियों ने हजारों साल पहले खोज लिया था। बहुत कम लोग जानते होंगे कि मैंने विदेशों में भारतीय संस्कृति और अध्यात्म पर अनेक व्याख्यान भी दिए हैं। मेरे घर में नित्य यज्ञ होता है। पत्नी सुमेधा जी ने भी गुरुकुल में ही पढ़ाई की हुई है।

विदिशा से नोबल पुरस्कार मंच तक की यात्रा में आप ने अलग-अलग सीढि़यां चढ़ीं, इस सीढ़ी में संस्कृत भाषा को आप कहां देखते हैं?
मुझे आध्यात्मिक गहराई तक ले जाने में संस्कृत का बहुत बड़ा योगदान है। बचपन से ही मुझे धार्मिक अनुष्ठानों में गहरी रुचि थी। बहुत कम लोग विश्वास कर पाते हैं कि 12-13 वर्ष की उम्र में ही मुझे रामचरितमानस कंठस्थ हो गई थी। मैं एक ही बैठकी में इसका पाठ कर लेता था। लोग मुझे इसके पाठ के लिए अपने घर बुलाते... उसके बाद मैंने उपनिषदों को पढ़ना शुरू किया। बाद में मैं आर्य समाज से जुड़ गया तो अध्यात्म में और दिलचस्पी बढ़ गई। इसके लिए मेरा संस्कृत सीखना जरूरी था। जिस भाषा में मूल रचनाएं होती हैं और जो गहरा भाव उनमें होता है, अनुवाद की भाषा में वह भाव उतनी गहराई से नहीं आ पाता। मैं तो किशोरावस्था में ही अध्यात्म में इतने गहरे उतर गया था कि 15-16 साल की उम्र में संन्यास लेना चाह रहा था।

तो फिर संन्यासी क्यों नहीं बने?
बचपन में मैं स्वामी विवेकानंद से बहुत प्रभावित था। उनको न केवल खूब पढ़ा बल्कि उनके जैसे बनने का सोचने भी लगा। मैंने पढ़ा कि उन्हें ईश्वर के दर्शन हुए थे। बस इसी से मेरे मन में संन्यास की भावना पैदा हुई। मैं संन्यास की तरफ अग्रसर हो रहा था कि इसी दौरान मेरा संपर्क आर्य समाज से हुआ। यह घटना तब की है जब मैं बीई के प्रथम वर्ष में था। आर्य समाज के द्वारा आयोजित एक भाषण प्रतियोगिता के दौरान मैंने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा। इससे इतना प्रभावित हुआ कि इंजीनियरिंग की किताबों के साथ-साथ मैंने आर्य समाज के साहित्य को पढ़ना शुरू कर दिया। बाद में मैंने सत्यार्थ प्रकाश की हिंदी में संक्षिप्त टीका भी की। स्वामी दयानंद के जीवन ने मुझे बहुत प्रभावित किया। स्वामी दयानंद ने बताया कि समाज के हाशिए पर खड़े व्यक्ति की सेवा में ही ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। मैंने संन्यास और मोक्ष का विचार छोड़ दिया और अपने को समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों की सेवा में लगा दिया। 

आपके आदर्श कौन रहे हैं या कहें कि आप को किस से ऊर्जा मिलती है?
बचपन में तो स्वामी विवेकानंद ही थे। बाद में किशोरावस्था में मुझे लगा कि महर्षि दयानंद जी को हमारे वेदों और उपनिषदों की गहरी समझ थी। उन्होंने जिस तरह से वेदों की वैज्ञानिक व्याख्या की है, उसने मुझे बहुत प्रभावित किया। आजादी के नायकों और क्रांतिकारियों की जीवनियों ने ही मुझे सामाजिक बदलाव के लिए प्रेरित किया। 

तो क्या आपने अपना उपनाम सत्यार्थी आर्य समाज यानी स्वामी दयानंद से प्रभावित होकर ही रखा है?
यह समाज में व्याप्त छुआछूत के खिलाफ मेरे विद्रोह की परिणति हैं। मैं बचपन से ही जाति व्यवस्था और छुआछूत का विरोधी था। किसी दोस्त ने कहा कि तुम हमेशा सामाजिक बुराइयों के खिलाफ विद्रोह करते रहते हो इसलिए उपनाम में विद्रोही जोड़ लो, तो किसी ने कहा कि हमेशा सच बोलते हो और सच के लिए लड़ते हो, इसलिए सत्यार्थी जोड़ लो। किसी ने कहा संस्कृत में कोविद हो, इसलिए कोविद लगा लो। मैं भी सत्यार्थ प्रकाश से बहुत प्रभावित था इसलिए उपनाम में सत्यार्थी ही जोड़ लिया। इस तरह से मैं कैलाश नारायण शर्मा से कैलाश सत्यार्थी बन गया।

आपने कहा कि आप आध्यात्मिक हैं और मानने में कम और जानने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। एनजीओ क्षेत्र को लेकर सवाल उठते रहते हैं। यह बताइए कि इस काम में दूध कितना है और पानी कितना? और आपने इसे कैसे जाना है?
देखिए, सत्तर और अस्सी के दशक में बाल श्रम और बच्चों के अधिकारों को लेकर कोई भी संस्था या सरकार कुछ सोचती तक नहीं थी। साल 1989 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा बाल अधिकार घोषणापत्र जारी करने से पहले बच्चों के अधिकारों और सवालों को लेकर कोई आवाज तक नहीं थी। जब बाल अधिकार घोषणापत्र जारी हुआ और कई देशों ने उस पर हस्ताक्षर कर दिए, जिसमें भारत भी शामिल था, उसके बाद तो बच्चों के लिए काम करने वालों की बाढ़ ही आ गई। नब्बे के दशक में बाल श्रम और बाल मजदूरी के खिलाफ मोर्चा संभालने के लिए कई संस्थाएं खड़ी हो गईं। हालांकि इनमें से ज्यादातर संस्थाएं पहले ग्रामीण विकास, महिला सशक्तीकरण और स्वास्थ्य आदि पर काम करती थीं। इनमें कई गांधीवादी संस्थाए भी थीं। लेकिन, जब संस्थाओं को विदेशी धन और सरकारी पैसा मिलने लगा तो लोग संस्था बनाकर लाभ कमाने लगे। सरकारी अधिकारियों और नेताओं की पत्नियों व बच्चों ने भी संस्थाएं बना लीं। अब 'सोशलाइट' और 'फैशनेबल' सिविल सोसायटी भी तैयार हो गई हैं। मैंने अपने 40 साल के सार्वजनिक जीवन में सब तरह के उतार-चढ़ाव देखे हैं। इसमें समाज में जनचेतना का ज्वार भी देखा है तो आंदोलनों में क्रांतिकारी विचारों से ओत-प्रोत युवा शक्ति का जोश भी। वैचारिक प्रदूषण फैला रहे और बुद्धि विलासिता कर रहे उन एनजीओ को भी देखा है जिन्होंने सामाजिक बदलाव और समाज कल्याण को कारोबार बना दिया है। फाइव स्टार होटलों में मीटिंग और पार्टियां करने वाले और शराब, पैसे व ताकत के नशे में चूर इन लोगों को भूख और गरीबी का न तो संज्ञान है और न ही सरोकार। इनमें से अधिकांश लोग समाज के हाशिए पर खड़े जिस व्यक्ति के नाम पर करोड़ों रुपये का चंदा ले रहे हैं और बढि़या रपट बना रहे हैं, उस गांव के गरीब को तो उन्होंने देखा तक नहीं है। पिछले करीब दो दशकों में एनजीओ का एक वर्ग सामाजिक बदलाव का नहीं बल्कि करियर बनाने का जरिया बन गया है।

लोग एनजीओ को करियर, दुकानदारी और मुनाफे का माध्यम समझते हैं। मैं देखता हूं कि जो दानदात्री संस्थाए हैं उनका अपना भी एक एजेंडा है। मेरा इन संस्थाओं से हमेशा से झगड़ा रहा है। दुनिया में हर जगह भले लोग हैं और वह भले लोग चाहते हैं कि समाज का कुछ भला हो। उनके पास पैसा भी है और वे दान भी देते हैं। वह लोग जिन संस्थाओं को पैसा देते हैं उनसे कुछ उम्मीद भी नहीं करते, सिवाय इसके कि पैसा ईमानदारी से उस उद्देश्य के लिए खर्च हो जिसके लिए दिया जा रहा है। लेकिन दूसरी तरफ कई बड़ी संस्थाए हैं जिनके अपने एजेंडे हैं जिनकी पहचान कर पाना अब मुश्किल नहीं है, जो पहले इंटरनेट के न होने से मुश्किल था। हमारे संगठन का पूरे साल का उतना खर्च नहीं होता, जितना ऐसी किसी दानदात्री संस्था के सीईओ की सैलरी होती है। जबकि हम सैकडों बच्चों को छुड़वा रहे हैं। उन्हें पुनर्वासित करके शिक्षा दिलवा रहे हैं।

अभी आप ने जैसा बताया कि दानदात्री संस्थाओं का अपना एक एजेंडा होता है। भारत के संदर्भ में वह एजेंडा क्या हो सकता है?
देखिए, कई तरह के लोग हैं। कॉरपोरेट जगत और राजनीति के लोग भी अब अपने मकसद के लिए एनजीओ बना रहे हैं। धर्म परिवर्तन के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। एनजीओ गरीबी के नाम पर पैसा बनाने की मशीन बन रहे हैं। ऐसे में सबका अपना अलग-अलग एजेंडा है। कई संस्थाएं नक्सलवाद से प्रभावित हैं जो कहीं न कहीं हिंसा को बढ़ावा देती हैं। यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है। इनको पैसा उन संस्थाओं से मिलता है जो कहने को तो समाजिक विकास के लिए कार्य कर रही हैं, लेकिन असल में उनका चरित्र ऐसा है नहीं। मेरा यह निजी अनुभव है कि मोटे अनुदान, सुविधाओं और विदेशी यात्राओं का लालच देकर अंतर्राष्ट्रीय संगठन भारत के एनजीओ समुदाय को तोड़ते और एक दूसरे से लड़वाते भी है।

क्या मानवाधिकार भी ऐसा ही मुद्दा है?
नहीं। समाज कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, महिला सशक्तीकरण और पर्यावरण रक्षा के लिए उठाए गए कदम से वास्तव में मानवाधिकारों की रक्षा होती है, लेकिन मानवाधिकार की आड़ में छद्म एजेंडा बढ़ाना गलत है। 

कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाए हैं जो एजेंडे के साथ दानदात्री संस्थाओं को चला रही हैं। इसके पीछे आपको क्या ताकत नजर आती है? क्या ये अपने आप में संगठित तौर पर बहुत मजबूत हैं या पीछे से कोई और समर्थन भी मिलता है?
अब पर्दे के पीछे क्या चल रहा है, यह तो मुझे भी नहीं पता, लेकिन जहां तक हमारे संगठन का सवाल है, उसकी दिशा और काम को लेकर हम बिल्कुल स्पष्ट हैं। हमारा साफ मानना है कि किसी भी उद्योग को नुकसान पहुंचाने से इस समस्या का समाधान नहीं होने वाला है। हमारी दुश्मनी उद्योग से नहीं बल्कि उस बुराई से है, जो उस उद्योग में नहीं होनी चाहिए। इनको दूर करने के लिए संविधान, कानून और अंतरराष्ट्रीय मापदंड हैं।

 यह देश 'सेकुलर' है और जय राम जी करके आप इतने आगे आ गए?

(हंसते हुए) जी, हमने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।  मैं शुद्घ शाकाहारी हूं और शराब व मांसाहार का घोर विरोधी हूं। कभी किसी दानदात्री संस्था के व्यक्ति के लिए हमारी संस्था ने शराब और मांस की व्यवस्था नहीं की जबकि लोग कहते हैं यह तो छोटी सी बात है। आप छोटी-छोटी बातों पर क्यों अड़े रहते हैं। संस्थाएं मुद्दे उठाती रहती हैं। कई ऐसे मुद्दे भारत में भी हमारे साथी संगठनों ने उठाए लेकिन बाद में हमें पता लगा वह यह मुद्दे इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि जिनसे उन्हें पैसा मिल रहा है, वह लोग यह सब उनसे करवा रहे हैं। यानी पैसा देने वाला इस शर्त पर पैसा दे रहा है कि तुम यह सवाल उठाओगे।जब समाज की समस्याओं और उसका समाधान जनता से पूछे बगैर पैसा देने वाला निर्धारित करेगा तो फिर बदलाव कैसे आएगा? हमने कभी भी सत्य, करुणा, धर्म और कर्म का मार्ग नहीं छोड़ा मैंने  न तो कभी भारतीयता, राष्ट्रीय गौरव और अपनी महान संस्कृति के साथ समझौता किया है और न ही कभी करूंगा।

गुजरात दंगों में गैर-सरकारी संगठनों की बहुत किरकरी हुई थी। एक संगठन पर तो वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप भी लगे। जांच में पता चला कि उस संगठन को दान में जो पैसा मिला था उसमें से एक बड़ी रकम से सजने-संवरने का सामान खरीदा गया था। ऐसे कामों को आप किस तरह से देखते हैं?
देखिए, जिन मुद्दों के लिए और जिन कामों के लिए हमें लोगों से पैसा मिलता है, हमारी नैतिक जवाबदेही उन्हीं के लिए सबसे ज्यादा होनी चाहिए। जहां तक गुजरात दंगों के संबंध में कुछ गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका की बात है तो इस बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन अखबारों से पता चला है कि इस मामले की अभी न्यायिक जांच चल रही है। मैं देखता हूं कि आज गैर-सरकारी संगठनों में नैतिक जवाबदेही का बहुत अभाव है बल्कि नैतिकता की कमी दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है। अगर आप किसी सामाजिक मुद्दे के साथ चल रहे हैं तो आपकी नैतिक जवाबदेही तो बनती ही है। अगर आपको बेहतर भारत और बेहतर समाज बनाना है तो यह जवाबदेही अनिवार्य है।

आपने जो बातें बताईं, वह नक्सलवाद और कन्वर्जन पर साफ दिखाई देती हैं। आपको कहीं लगता है कि सेकुलरवाद का लबादा ओढ़कर कोई एक लॉबी है जो काम कर रही है?
देखिए, हमारा जो दर्शन है वह सर्वधर्म समभाव का दर्शन है। यह दुनिया का महानतम दर्शन है। इस दर्शन में दुनिया की सभी समस्याओं का हल और सभी प्रश्नों का उत्तर है लेकिन यह दु:ख की बात है कि लोगों ने जाति, पाखंड और कर्मकांड के नाम पर उसका सत्यानाश कर दिया है। हमारा जो मूल दर्शन है वह सर्वे भवन्तु सुखिन: और वसुधैव कुटुम्बकम् के आधार पर है।
अयं निज: परोवेति, गणनां लघु चेतसाम्।
उदार चरितानाम् तु, वसुधैव कुटुम्बकम्।

हमारा वेद तो वसुधैव कुटुम्बकम् की बात करता है। हमारी संस्कृति हमारा देश इन्हीं मूल्यों पर तो खड़ा है। इन मूल्यों में किसी भी तरह की हिंसा और धोखाधड़ी का स्थान नहीं है। मैं अंहिसा में विश्वास रखता हूं। मैं चाहता हूं कि दुनिया में हर समस्या का समाधान अहिंसा से ही हो। हम जिन बातों में उलझे हुए हैं, वे बहुत ही सतही और उथली बातें हैं। हम शांति की बात करते हैं। पूरे ब्रह्मांड की शांति की बात करते हैं। हम दुनिया में शांति के लिए शांति पाठ करते हैं। ॐ द्यौ: शांति: अंतरिक्ष शांति: पृथ्वी: शांति़: आप: शांति़: - यह जो पूरा का पूरा शांति पाठ है यह दुनिया को शांति का संदेश देता है।

पूरी दुनिया में हिंसा फैली हुई है। ऐसे में विश्व शांति में आप भारत की क्या भूमिका देखते हैं।
हजारों साल पहले हमारे ऋषि-मुनियों ने समाज में ही नहीं, जल-वायु, पेड़-पौधे, वनस्पति और औषधि तक में शांति स्थापना की बात की है। आज इतने सालों बाद समुद्र को शांत और सुरक्षित रखने की बात को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने स्वीकार किया है। भारत में एक तरफ जहां आर्थिक रूप से संपन्न राष्ट्र बनने की संभावना है, हमारे आध्यात्मिक दर्शन की जो गहराई है, उस गहराई में से वर्तमान समस्याओं का समाधान निकालकर हम दुनिया के सामने रखें। मैं दुनिया में जगह-जगह वेद मंत्रों को कई बार बोलता हूं। लोग सुनते हैं, समझते हैं और आत्मसात करने की बात करते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि हमारी जो आध्यात्मिक बुनियाद है और वह जिन मूल्यों पर खड़ी है, उन मूल्यों की सही ढंग से व्याख्या, पालन और लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रचार का काम नगण्य हुआ है। कई देशों में नौजवानों की संख्या बहुत ज्यादा है। भारत भी उनमें से एक है। हमारे पास जो आध्यात्मिक ज्ञान है उस पर ज्यादा गर्व होना चाहिए, क्योंकि यह ज्ञान दुनिया में सिर्फ हमारे पास है। मैं संप्रदायों, मतों और पंथों को धर्म नहीं मानता। धर्म एक ही है संसार में। मनुस्मृति में कहा गया है धार्यते इति धर्म:। यानि मनुष्य के लिए धारण करने वाले जो गुण होते हैं वही धर्म हैं। मनुस्मृति में ही इसकी व्याख्या है-
धृति: क्षमा दमोस्तेयं, शौचमिन्द्रिय निग्रह।
धीर्विद्या सत्यमक्रोध:, दशैकं धर्म लक्षणं।
क्षमा, सत्य, अक्रोध, करुणा, आत्म नियंत्रण आदि दस मानवीय गुणों का जो पालन करता है वही धार्मिक है। इसके अलावा कोई धर्म नहीं है।

आपने कहा कि बच्चों के सवाल पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के बाद बहुत सारी गांधीवादी संस्थाएं चोला बदलकर बच्चों के काम में लग गईं। आपको लगता है कि गांधी जी के मूल विचार और उनके नाम पर जो देश में चल रहा है, उसमें बहुत बडा फर्क है?
लोहियाजी कहते थे कि तीन तरह के गांधीवादी होते हैं। एक सरकारी गांधीवादी जो सत्ता में बैठ गए हैं। दूसरे मठी गांधीवादी जो इस तरह की संस्थाएं चला रहे हैं और तीसरे कुजात गांधीवादी। लोहियाजी खुद की तुलना करते हुए कहते थे कि वे गांधीवादी तो हैं लेकिन कुजात गांधीवादी। मुझे लोहिया जी की इन बातों ने बहुत प्रभावित किया। लोगों का मानना है कि कैलाशजी पर गांधीवाद का प्रभाव है। मैं यह मानता हूं कि गांधी जी ने एक महान काम किया जो कोई भी नहीं कर पाया। मेरा मानना है कि दुनिया में जितने भी क्रांतिकारी हैं वह सब राष्ट्र की सेवा के अपने जुनून की वजह से क्रांतिकारी बने, लेकिन गांधी जी मेरी नजर में एकमात्र ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने भारतीय आध्यात्मिक मूल्यों को जन-आंदोलन में परिवर्तित किया। सत्य और अहिंसा की बात हम लोग मंदिरों में ही समझते थे, लेकिन जो सत्य है वह ईश्वर का ही एक प्रतिबिंब है। जिन बातों को हम मंदिर, मस्जिद और चर्च में पढ़ा और सुना करते थे, गांधी जी ने उन्हीं बातों को आधार बनाकर शांति, अहिंसा और सत्य के माध्यम से कई जन-आंदोलन खड़े किए। वह सब हमारे आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ी हुई बातें थीं तो जनता भी उनसे जुड़ने लगी। हम भारतीयों के खून में ही शांति है। 

यह मौका भुनाने से ज्यादा भाव जगाने वाले हैं या मौका भुनाने के लिए लोग खड़े हो जाते हैं?
हमारे आंदोलन के शुरू में जो लोग जुड़े थे वे आज की पीढ़ी से बहुत अलग थे। अब तो इनमें से कई लोगों का स्वर्गवास भी हो चुका है। जो नई पीढ़ी के लोग आते हैं अगर उन्हें कहीं थोड़ा ज्यादा पैसा मिलता है तो वह वहां दौड़े चले जाते हैं। मेरे शुरुआती साथियों और वरिष्ठ सहयोगियों ने सामाजिक कार्य में बेहतर नौकरी और पैसे का लालच कभी नहीं किया। हिंदुस्तान समाचार के संस्थापक और राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के प्रचारक बालेश्वर अग्रवाल जी हमारे पिता समान थे। मेरी पत्नी उनकी दत्तक पुत्री समान थीं। वह हमारी सगाई करवाने विदिशा भी आए थे। मेरे उनके संबंध बहुत अच्छे थे। वह मुझे दामाद मानते थे। एक बार शादी के बाद दिल्ली में हमारे घर आए। तब हम लोगों के पास बिस्तर नहीं थे, अखबार के बंडल के ऊपर दरी बिछाकर हम सोते थे। घर की हालत देखकर उन्होंने मुझे नौकरी का ऑफर दिया, लेकिन मैंने मनाकर दिया। एक बार मेरे कॉलेज के प्राचार्य, जो मुझसे बड़ा स्नेह करते थे, मेरे घर आए। उन्होंने भी मेरी हालत देखी तो दिल्ली के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में मेरे लिए अध्यापन की व्यवस्था कर दी। मैंने उसे भी ठुकरा दिया। मैंने कहा जिसका संकल्प लिया है वही करूंगा। एक तरफ हमारे बेटे के लिए दूध और फल जरूरी था तो दूसरी तरफ गुलाम बच्चों को आजाद करना था। मैंने दूसरा विकल्प चुना। हम तब एनजीओ जानते भी नहीं थे। मित्रों की आर्थिक मदद से ही सामाजिक बदलाव में जुटे हुए थे।

(साभार: पांचजन्‍य) 

सहिष्णुता के अहंकार में डूबा समाज

सहिष्णुता के अहंकार में डूबा समाज


आमिर खान के बयान के बाद छिड़े विवाद पर विद्या भूषण रावत की टिप्पणी।

आमिर खान की पत्नी के 'विदेश में बसने की खबर' से हर 'भारतीय' सदमे में हैं और उनको शाहरुख़ खान के साथ पाकिस्तान भेजने की बात कह रहे है। आमिर के पुतले जलाए जा रहे हैं और देश की विभिन्न अदालतों में उनके खिलाफ मुकदमे किए गए हैं जिनमें देशद्रोह का मुकदमा भी शामिल है। सबसे मज़ेदार बात यह है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय इस अभियान को बहुत हवा दे रहे हैं. वैसे भारत में रहने वाले लोग भी कह रहे हैं कि आमिर ने गद्दारी की है और उनको इसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। है न कितनी अच्छी बात कि हम पश्चिमी लोकतान्त्रिक देशों में रहकर पूरे अधिकार के साथ भारत माता की जय बोलना चाहते हैं, मंदिर बनाना चाहते हैं, मोदी की बड़ी बड़ी रैलियां करना चाहते हैं लेकिन अपने देश में हम पूरी दबंगई दिखाना चाहते हैं। अगर यही बात अमिताभ करते तो क्या उन्हें कहीं भेजने की बात होती?

हम फ़िल्मी कलाकारों को भगवान बनाकर न देखें। व्यक्तिगत तौर पर मैं आमिर खान को ढकोसलेबाज़ मानता हूँ क्योंकि उनकी सत्य की जीत 'रिलायंस' के चंदे से होती है और भारत में अगर हम भ्रष्टाचार को लेकर लालू को इतना गरियाते हैं तो अम्बानी तो उस बीमारी के जनक थे। क्या अर्नब गोस्वामी जैसे भारत में 'ईमानदारी' का राग अलापने वाले मसीहा लोग अम्बानी और अडानी के बारे में बात करेंगे? जब करप्शन की बात हो तो राजनेताओं का ही हिसाब किताब क्यों हो, उद्योगपतियों का क्यों नहीं, क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगा उनकी ही दुकानों से निकलती है। इसलिए आमिर ने जो कहा वो बहुत सोच-विचार, रिहर्सल के बाद कहा और वो उनका व्यू पॉइंट है और उसे रखने की उनको छूट होनी चाहिए। उनको पाकिस्तान भेजने और उनको गाली देकर हिंदुत्व के लठैत आमिर की ही बात को सही साबित कर रहे हैं।

हालांकि, मैं आमिर की बातों से कत्तई इतेफाक नहीं रखता। सबसे पहले तो आमिर की यह बात गलत है कि भारत में असिहष्णुता अचानक बढ़ गई। हमारा देश असल में असभ्य और क्रूर है, जहाँ दहेज़ के लिए लड़कियां रोज जलती हैं, जहाँ प्रेम विवाह करने पर माँ बाप अपने ही बच्चों की निर्ममता से हत्या करने से नहीं घबराते, जहाँ किसी भी लड़की का शाम को घर से बाहर निकलना मुश्किल होता है। जहाँ सती का आज भी महिममंडन होता हो और विधवा होने पर औरतों की जिंदगी नरक बना दी जाती हो, जहाँ आज भी मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर उनकी हत्या कर दी जाती हो, जहाँ किसी के घर में क्या बन रहा हो उस पर समाज नियंत्रण करना चाहता हो, जहाँ स्कूलों से बच्चे इसलिए निकल कर चले जाते हो कि खाना किसी दलित महिला ने बनाया है, उस देश की महानता और संस्कृति का क्या कहें, जहां एक समाज को पढ़ने का हक़ नहीं और दूसरे को केवल मलमूत्र उठाने की जिम्मेवारी दी गई हो, जिसके छूने भर से लोग अछूत हो जाएं! लेकिन भारत की महान सभ्यता का ढोंग करने वालों का ध्यान इधर कभी नहीं गया। ऐसा नहीं कि इस विषय में लिखा नहीं गया हो या बात नहीं की गई हो।

असहिषुणता का इतिहास लिखें तो शर्म आएगी, तब आमिर खान से क्यों इतनी नाराज़गी है? मतलब साफ़ है। भारत के इलीट मुस्लिम सेकुलरिज्म के खेल में भारत की सहिष्णुता के सबसे बड़े 'ब्रांड' एम्बेसडर हैं। और जो व्यक्ति 'अतुलनीय भारत' की नौटंकी करता रहा हो वो अचानक पाला क्यों बदल बैठा! आमिर खान और अन्य कलाकारों ने भारत के 'सहिष्णु' होने के सबूत दिए और साथ ही दलितों या पसमांदा मुसलमानों की हालतों पर चुप रहकर उन्होंने हमेशा ही 'सहिष्णु' परम्परा का 'सम्मान' किया है। शायद रईसी परंपरा में केवल बड़े बड़े लोगों की बड़ी बड़ी बातें सेकुलरिज्म होती हैं लेकिन हलालखोर, कॅलण्डर, नट या हेला भी कोई कौम है, इसका शायद इन्हें पता भी नहीं होगा। हमें पता है कि अभी तक मैला ढोने की प्रथा के विरुद्ध आमिर ने कभी निर्णायक बात नहीं की, वो केवल टीवी शो में आंसू बहाने तक सीमित थी।

तो फिर क्या बदला? लोग कहते हैं कि कांग्रेस के ज़माने में भी सेंसरशिप लगी और फिल्में प्रतिबंधित हुईं। बिलकुल सही बात है। हम इमरजेंसी के विरुद्ध खड़े हुए लेकिन अब ऐसा लगता है कि सत्तारूढ़ दल का मुख्य आदर्श संजय गांधी और चीखने चिल्लाने वाले मुल्ले हैं जो किसी भी उदार विचार को या उनसे विपरीत विचार को डंडे और धमका डरा के रुकवाना चाहते हैं। फ़िल्मी लोगों को उतनी ही तवज्जो मिलनी चाहिए जिसके वे हक़दार हैं। पिछले कुछ वर्षों में बम्बइया फ़िल्मी लोग हिंदुत्व का एजेंडा लागू करने में सबसे प्रमुख रहे हैं और उनकी प्रसिद्धि ने चुनाव भी जितवाया है लेकिन उनमें कोई भी ऐसे नहीं हैं जो शाहरुख़, आमिर या अमिताभ का दूर दूर तक मुकाबला कर सके। अमिताभ हालाँकि गुजरात या अन्य सरकारी विज्ञापनों में आते हैं लेकिन वो भी राजनैतिक हकीकतों से वाकिफ हैं, इसलिए चुप रहते हैं। हालाँकि देर सवेर उन्हें मुंह खोलना पड़ेगा। आज के हिंदुत्व कॉर्पोरेट के दौर में भारत की आक्रामक मार्केटिंग चल रही है इसलिए आमिर या शाहरुख़ जो वाकई में भारत के सवर्णों की 'सहनशीलता' के 'प्रतीक' हैं इसलिए उनसे ये 'उम्मीद' ये की जाती है कि वे डॉ. ए. पी. जे. कलाम की तरह अपने 'भारतीय' होने का सबूत दें। कोई मुसलमान यदि अपने दिल की बात रख दे तो वो 'देशद्रोही' है। जिन लोगों को सुनकर हम बड़े हुए उन साहिर, दिलीप कुमार, मोहम्मद रफ़ी, बेगम अख्तर को धर्म के दायरे में डाला जा रहा क्योंकि वे अपनी एक राय रखते हैं। कई बार फिल्म स्टार, गायक या खिलाड़ी लोग वो बात कह देते हैं जो उनके कई प्रशंसकों को नहीं जंचती। उसमें कोई बुरी बात नहीं है। हम आमिर खान से साम्प्रदायिकता और सहिष्णुता का ज्ञान नहीं लेते, अपितु उनकी फिल्म इसलिए देखते हैं कि वो साफ सुथरी फिल्म बनाते हैं। क्या हम रवीना टंडन, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान या मनोज तिवारी से ज्ञान लें? हाँ फिल्मो में बहुत से लोग रहे हैं जिन्होंने गंभीर विषयों पर बोला है और उनकी समझ समझ है। बाकी हमको कोई कलाकार इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि हमें उसकी एक्टिंग अच्छी लगती है या फिल्म अच्छी लगती है। अगर आप आमिर या शाहरुख़ की फिल्मों का बॉयकॉट इसलिए करना चाहते हैं कि उनकी कोई बात आपको अच्छी नहीं लगी तो फैसला आपका है क्योंकि फिर आपको मनोज तिवारी, अनुपम खेर, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान आदि की फिल्मे देखनी पड़ेंगी क्योंकि उनके विचार आपको अच्छे लगते हैं।

आमिर खान ने जो कहा वो उनका हक़ था और शायद देश का बहुत बड़ा तबका वैसे ही सोच रहा है। अपने दिल की बात को अगर वो कह दिए तो हमारा क्या फ़र्ज़ है? उसको गालियों से लतियाएं या भरोसा दिलाएं? आमिर ने बस एक ही बात गलत कही कि असहिष्णुता बढ़ रही है, क्योंकि वो पहले से ही है। इस देश के लोगों ने उनको प्यार दिया है। जो लोग इस वक़्त दबंगई कर रहे हैं वो हमें आपातकाल के संजय गांधी के गुंडों की याद दिला रहे हैं। आमिर को कहना चाहिए कि कौन लोग ऐसा तमाशा कर रहे हैं। ये पूरे देश के लोग नहीं हैं, ये एक पार्टी विशेष और जमात विशेष के लोग हैं जिन्होंने उन सभी को गरियाने और धमकाने का लाइसेंस लिया हुआ है जो इनकी विचारधारा से मेल नहीं खाते। इसलिए आमिर साहेब सबको न गरियाएं। साफ़ बोलिए वो कौन हैं जो असहिष्णुता फ़ैला रहे हैं। इमर्जेन्सी का विरोध करने वालों का सबसे बड़ा मॉडल इमरजेंसी का दौर ही है और वही व्यक्तिवादी राजनीति आज हावी है। केवल फर्क इतना है कि उस दौर में दूरदर्शन और रेडियो पर समाचार सरकार सेंसर करती थी और आज सरकार और सरकारी पार्टी के दरबारी पत्रकार पूरी ताकत से ये काम कर रहे हैं। आज अर्नब गोस्वामी और सुधीर चौधरी का दौर है जिसमें सरकार से मतभेद रखने वालों की खबरें सेंसर ही नहीं होंगी बल्कि उनको अच्छे से गरियाया जाएगा। आखिर 9 बजे के प्राइम टाइम शोज का यही उद्देश्य है। हकीकत यह है कि हम वाकई में एक भयानक दौर से गुजर रहे हैं जिसमें तिलिस्मी राष्ट्रवादी नारों की गूँज में हमारे मानवाधिकारों और अन्य संवैधानिक अधिकारों की मांग की आवाज़ों को दबा दिया जा रहा है। पूंजीवादी ब्राह्मणवादी लोकतंत्र से आखिर आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं? वो तो सन्देश वाहक को ही मारना चाहता है ताकि खबर ही न रहे और खबरें बनाने और बिगाड़ने के वर्तमान युग में मीडिया निपुण होता जा रहा है, जो बहुत ही शर्मनाक है।

असहिष्णुता से असहमति Author: पंकज बिष्ट


असहिष्णुता से असहमति


छ घटनाएं सारी सीमाओं के बावजूद ऐसी चिंगारी का काम कर डालती हैं जो लपटों में बदल अंतत: सारे संदर्भ को नया ही आयाम दे देती हैं। केंद्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हत्या पर अकादेमी द्वारा चुप्पी लगा देने की प्रतिक्रिया स्वरूप शुरू हुए सामान्य से विरोध ने जिस तरह से साहित्य अकादेमी पुरस्कारों को लौटाने के सिलसिले में बदला, वह सामान्य घटना नहीं है। समयांतर के पिछले अंक में इसकी शुरुआत करने वाले पर गंभीर आशंका जताई गई थी। अपनी जगह वह यथावत है। वैसे उस टिप्पणी (‘सार्वजनिक विरोध का निजी चेहरा’, दिल्ली मेल) में यह भी कहा गया था कि ”हम जिस माहौल में रह रहे हैं वह ऐसे संकट का दौर है जिसका विरोध निश्चित तौर पर और समय रहते किया जाना चाहिए क्योंकि यह हमारे समाज के मूल आधार सहिष्णुता और विविधता को ही खत्म करने पर उतारू नहीं है बल्कि यह हमें हर तरह की तार्किकता और वैज्ञानिक समझ से वंचित कर देने का प्रयास भी है। इसलिए यह चिंता किसी ‘अकेले लेखक’ या कलाकार की न तो हो सकती है और न ही होनी चाहिए। पर यह विरोध समझ-बूझकर किया जाना चाहिए। बेहतर तो यह है कि यह सामूहिक हो क्योंकि आज व्यवस्था जिस तरह की है और वह जिस हद तक असंवेदनशील नजर आ रही है, उसमें इक्की-दुक्की आवाजों की परवाह करने वाला कोई नहीं है।”
प्रसन्नता की बात है कि पुरस्कार लौटाने का यह कदम मात्र किसी एक व्यक्ति, भाषा या क्षेत्र तक सीमित न रह कर राष्ट्रव्यापी रूप ले चुका है। अब तो चित्रकार, फिल्मकार, वैज्ञानिक और इतिहासकार भी इस विरोध का हिस्सा हो चुके हैं। आशा करनी चाहिए, अगर सरकार ने समय रहते उचित कदम नहीं उठाए तो, अन्य बौद्धिक वर्ग भी देश की प्रगति, वैज्ञानिक विकास, तार्किक चिंतन, सांस्कृतिक समरसता, सहिष्णुता और विविधता को बचाने की इस मुहिम में शामिल होने में देर नहीं लगाएंगे।
हर लेखक या उस तरह से कोई भी बुद्धिजीवी अंतत: एक समाज की ही देन होता है। वह उसी के दायरे में विकसित होता है और स्वयं को अभिव्यक्त करता है। दूसरे शब्दों में उसका विकास समाज के विकास से गहरे जुड़ा होता है। ऐसे दौर में जब देश के शासक वर्ग का एक हिस्सा निहित स्वार्थों के लिए आंखमूंद कर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से सांप्रदायिकता को और अतार्किक स्तर पर हमारे विगत को महिमा मंडित करने पर तुला हो, वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता की मजाक उड़ाता नजर आ रहा हो, ऐसे में समाज के भविष्य को लेकर देश के रचनाकारों, चिंतकों और बुद्धिजीवी वर्ग में अगर चिंता न हो तो यह जीवंत समाज का लक्षण नहीं माना जा सकता।
प्रतिक्रियावादी विचारों का बढ़ता खतरा
देखा जाए तो ये चिंताएं, जो अंतत: दुनिया को देखने-समझने और उसे बदलने की आधारभूत मानवीय प्रवृत्ति से जुड़ी हैं, किस व्यापक खतरे का सामने कर रही हैं इसका उदाहरण पिछले सिर्फ डेढ़ साल के वक्फे में पनपे प्रतिक्रियावादी विचारों और अभिव्यक्तियों में देखा जा सकता है। आश्चर्य की बात यह है कि यह सब सत्ता के संरक्षण में हो रहा है। देश को दुनिया के सबसे विकासशील देश में बदलने का सपना दिखलाने वाला प्रधानमंत्री एक आधुनिक चिकित्सालय का उद्घाटन करते हुए, यह कहते नहीं झिझकता कि हमारे यहां प्राचीन काल में चिकित्सा का स्तर यह था कि जानवर के सर को आदमी के सर पर ट्रांसप्लांट किया जाता था। बिना सहवास के, जैसा कि कर्ण के संदर्भ में हुआ था, संतान उत्पन्न की जा सकती थी। उनके अनुसार हमारे यहां जेनेटिक साइंस व प्लास्टिक सर्जरी अनादिकाल से विकसित थे। गुजरात में स्कूली पाठ्यक्रमों में एक ऐसे व्यक्ति की किताब को पढ़ाया जा रहा है जो कहता है कि महाभारत काल में आईवीएफ की तकनीक उपलब्ध थी।
एक और महाशय विज्ञान कांग्रेस में देश के चुनींदा वैज्ञानिकों के सामने दावा करने से जरा नहीं झिझकते कि हमारे पुष्पक विमान ग्रहों के बीच उड़ान भरते थे।
ऐसा प्रतीत होने लगा था मानो नया निजाम और उसके समर्थक अब तक के इतिहास और विज्ञान के अध्ययनों और उनकी उपलब्धियों को जड़-मूल से उखाडऩे पर उतारू हैं। बहुमत के नशे में चूर सत्ताधारी दल ने ज्ञान-विज्ञान की विश्वस्तरीय संस्थाओं को तहस-नहस करने का जैसे बीड़ा ही उठा लिया है। इस विवेकहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण आईआईटी, दिल्ली जैसी संस्था पर एक स्वामी का थोपा जाना है। शिक्षण और शोध संस्थानों पर जिस तरह से और जिस तरह के अयोग्य और कुंद व्यक्तियों को सरकार लादने पर लगी हुई है वह आतंककारी है। सरकार का अहंकार किस स्तर का है इसका उदाहरण पुणे का फिल्म व टेलीविजन संस्थान है जिस पर एक दोयम दर्जे के अभिनेता को थोप दिया गया है। सरकार ने लगभग पांच महीने चले छात्रों के आंदोलन की अनसुनी करके जिस तरह की निर्ममता का परिचय दिया है वह बतलाता है कि इस सरकार का किसी भी तरह के लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास नहीं है। वह लोकतंत्र का इस्तेमाल कर इस देश को एक बर्बर मध्यकालीन धार्मिक राज्य में को बदल देना चाहती है।
एफटीआईआई का संदेश
पर देखने की बात यह है कि एफटीआईआई के छात्रों को मजबूर करने का जो संदेश देश के बुद्धिजीवियों और विचारवान तबके तक गया है उसने सरकार की अडिय़ल और दमनकारी छवि को मजबूत करने और दूसरी ओर उसका विरोध करने की लहर के जन्म में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिन फिल्मकारों ने अपने राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाने की बात की है उनका तो सीधा संबंध ही एफटीआईआई के घटनाचक्र से है।
इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं रही है कि आज की तारीख तक सात सौ से ज्यादा देश के शीर्ष से लेकर युवातर वैज्ञानिकों ने इस अवैज्ञानिक, अतार्किक और सांप्रदायिक माहौल के विरोध में जारी बयान पर हस्ताक्षर किए हैं। यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। 87 वर्षीय पीएम भार्गव जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक का तो स्पष्ट ही कहना है कि ”तार्किकता और रेशनलिज्म, जो कि विज्ञान की आधारशिला होते हैं, खतरे में हैं। इस सरकार के मन में विज्ञान के प्रति कोई सम्मान नहीं है।ÓÓ और इसमें दो राय नहीं हो सकती। पर संभवत: इसीलिए आश्चर्य यह है कि ये वैज्ञानिक तब क्यों नहीं बोले जब इस आक्रमण की शुरुआत हो रही थी। विज्ञान कांग्रेस को प्रमादियों द्वारा कब्जा लिए जाने पर भारतीय वैज्ञानिकों की तब की चुप्पी पर दुनिया भर में सवाल उठाए जा रहे थे और उनकी खिल्ली उड़ाई जा रही थी।
यह स्थिति इसलिए आई कि भारत को तीसरी दुनिया में प्रगतिशील, उदार, ज्ञान-विज्ञान के लिए समर्पित और एक महत्त्वपूर्ण लोकतांत्रिक देश के रूप में जाना जाता था। एक ऐसा देश और समाज जहां समानता और सर्वधर्म समभाव का आदर्श प्राप्त करने का प्रयत्न अपनी सारी सीमाओं के बावजूद सतत जारी था। इसमें कई खामियां थीं पर ऐसा कभी नहीं था कि विगत सात दशकों में सत्ता पर आई किसी सरकार ने कट्टरपंथी, सांप्रदायिक और अलोकतांत्रिक तत्वों को इस तरह से खुलेआम बढ़ावा दिया हो। सांप्रदायिकता और हत्याओं के आरोपियों को केंद्र में जगह दी हो।
वैज्ञानिकों की वह प्रारंभिक चुप्पी के दो संभावित कारण समझ में आते हैं। पहला, पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई सरकार और उसके नेतृत्व की दमनकारी छवि का आतंक। और दूसरा, यह कि वैज्ञानिक समुदाय नई सरकार और इसके नेतृत्व को कुछ समय देना चाहता हो।
व्यक्ति नहीं समाज के अस्तित्व का सवाल
असल में लेखकों के विरोध ने देश के शेष चेतना संपन्न और विवेकवान बौद्धिक तबके को झिंझोड़ कर रख दिया है। समाज का यह प्रभावशाली और चेतना संपन्न वर्ग, जो पिछले डेढ़ वर्ष से लगभग स्तब्ध था, अपनी तंद्रा से जाग गया है। उसे समझते देर नहीं लगी है कि पानी सर से गुजर गया है। यह संकट मात्र उसी के अस्तित्व से नहीं जुड़ा है बल्कि उस समाज के अस्तित्व का सवाल भी इसी में निहित है जिसका वह अविभाज्य अंग है। वह तभी बच सकता है जब यह समाज बचेगा। उसके सामने बहुत दूर के नहीं आसपास के ही उदाहरण हैं कि किस तरह से एक नहीं अनेकों समाज और देश सत्ताधारियों और सत्ताकामियों की महत्त्वाकांक्षाओं और तिकड़मों के चलते तबाही और अराजकता के शिकार हुए हैं। यहां भी जिस तरह से पुराणपंथ को स्थापित किया जा रहा है वह मूलत: एक वर्ग विशेष की सत्ता को स्थायी बनाए रखने से ही जुड़ा है। बहुसंख्यकवाद मूलत: लोकतंत्र के माध्यम से सत्ता पर काबिज होने का सबसे आजमाया हुआ पर विनाशकारी तरीका है। यह तरीका नए समाज के निर्माण के किसी भी स्वप्न से रहित एक परंपरावादी सत्ताधारी वर्ग के हितों का ही पोषण करता है। इसके उदाहरण एशिया और अफ्रीका के कई क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं। प्रश्न है क्या हम भी उन्हीं देशों की तरह धार्मिक और रूढि़वादी होने की राह पर नहीं हैं? अब और तटस्थ रहने का समय नहीं है। यह विरोध सत्ता प्राप्त करने का नहीं है बल्कि ज्ञान को अपनी स्वाभाविक दशा में बढऩे देने का रास्ता सुनिश्चित करने का है। यह विरोध एक लोकतांत्रिक व्यवस्था व धर्मनिरेपक्ष समाज को बचाने का है। क्योंकि इस असहिष्णुता सफल होना भारतीय गणतंत्र की आधारभूत अवधारणा का ही अंत होना नहीं है बल्कि इस पूरे महादेश को असंतोष और अराजकता में धकेल देना है। यह निश्चय है कि देश की जनता इतनी आसानी से यह सब होने नहीं देगी। इससे आगे के पेजों को देखने  लिये क्लिक करें NotNul.com

Viagra in Tea Spoon!चाय की कप में वियाग्रा! सत्यं शिवम् सुदरम्! सत्यमेव जयते! तमसोमाज्योतिर्गमय!
देश में बढ़ती असहिष्णुता के मुद्दे पर आमिर खान, शाहरुख खान जैसे लोकप्रिय कलाकारों के बयानों पर उठे विवाद के बीच अभिनेत्री नंदिता दास ने भी देश के हालात पर चिंता जताई है।
दुनिया रोज बदलती है और जिंदगी तकनीक!
अतीत सुहाना है,हर मोड़ पर भटकाव भी वहीं!

जिनने मेरा प्रार्थनासभा में गाधी की हत्या वीडियो देख लिया, उन्होंने जरुर गौर किया होगा कि नाथुराम गोडसे के उद्गार, हत्या की दलील की क्लीपिंग और गांधी हत्या के दृश्यों के मध्य बैकग्राउंड में मर्डर इन द कैथेड्रल का अविराम मंचन है।रेश्मा की आवाज है।

गौर करें कि आर्कविशप की हत्या से पहले उसे देश छोड़ने का फतवा है और उसकी हत्या के औचित्य की उद्घोषणा है।यह दृश्य अब इंडिया लाइव का अतीत में गोता,ब्लैक होल गर्भ में महाप्रस्थान।

मनुस्मृति शासन की जान का कहे,वहींच मनुस्मृति है।
जाति खत्म कर दो, मनुस्मृति खत्म!
ई जौन फ्री मार्केटवा ह,उ भी खत्म,चाय कप में वियाग्रा छोडो़ तनिको!

फिर आपेआप बौद्धमय भारत।

सनातन एकच रक्त अखंड भारत वर्ष और सनातन उसका धर्म हिंदूधर्म।पहिले मुक्ताबाजार का यह वियाग्रा छोड़िके बलात्कार सुनामी को थाम तो लें!

सध्याच्या परिस्थितीसाठी असहिष्णू हा शब्दही अपुरा – अरूंधती रॉय

महात्मा फुले यांच्या पुण्यतिथीच्या निमित्ताने अखिल भारतीय महात्मा फुले समता परिषदेतर्फे देण्यात येणारा यंदाचा

यावेळी रॉय म्हणाल्या, 'संपूर्ण उपखंडात रसातळाला जाण्याची स्पर्धाच सुरू झाली आहे आणि त्यात भारताचा उत्स्फूर्त सहभाग आहे. सगळ्या शिक्षणसंस्था, महत्त्वाच्या संस्थांमध्ये सरकारच्या मर्जीतील माणसे भरली जात आहेत. देशाचा इतिहासच बदलण्याचे प्रयत्न केले जात आहेत. धर्मातून बाहेर गेलेल्यांना आरक्षणाची लालूच दाखवून चालणारा 'घर वापसी'चा प्रकार क्रूर आहे. डॉ. आंबेडकरांच्या तत्त्वांचा त्यांच्याच विरोधात वापर करण्यात येत आहे. बाजीराव-मस्तानी चित्रपटावरून मोठा वाद होतो. मात्र पेशव्यांच्या काळात दलितांवर झालेल्या अन्यायाची चर्चाही होत नाही.' -