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Friday, January 15, 2016

जनवादी समाज और जाति का उन्मूलन' की भूमिका: आनंद तेलतुंबड़े

'जनवादी समाज और जाति का उन्मूलन' की भूमिका: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/15/2016 02:29:00 PM


जाने-माने जनवादी अधिकार कार्यकर्ता और चिंतक आनंद तेलतुंबड़े ने यह भूमिका आधार प्रकाशन से रुबीना सैफी के संपादन में प्रकाशित हुई अपनी किताब जनवादी समाज और जाति का उन्मूलनके लिए लिखी है. किताब में शामिल निबंध जाति के उन्मूलन को एक केंद्रीय कार्यभार के रूप में देखते हुए एक सच्चे जनवादी समाज के निर्माण की चुनौतियों, संघर्षों, वैचारिकी और जरूरत को रेखांकित करते हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

मुझे युवा अध्येता रूबीना सैफी द्वारा तैयार किए गए इस संकलन की भूमिका लिखते हुए बहुत खुशी हो रही है, जिसके निबंध मैंने अलग अलग वक्त में अलग अलग विषयों पर लिखे हैं लेकिन वे किसी न किसी तरीके से जाति के सवाल के साथ जुड़े हुए हैं. ये मूल लेख अंग्रेजी में हैं और पढ़नेवालों के एक बड़े तबके के लिए वे यहां हिंदी में पेश किए जा रहे हैं.

जाति को लेकर मेरा नजरिया ज्यादातर लोगों और स्थापित बौद्धिक जमात से बहुत अलग है, और इसीलिए वर्ग को लेकर मेरा नजरिया भी अलग है. बुनियादी तौर पर मैं इन दोनों अवधारणाओं को आपस में एक दूसरे से अलग अलग करके देखने के रुझान में समस्याएं पाता हूं. खास तौर से बौद्धिक बहसों में जाति और वर्ग का इस कदर अलग अलग होना मुझे उलझन में डालता है. मार्क्सवादी सिद्धांत में वर्ग, इतिहास में द्वंद्ववाद को आगे बढ़ाने की एक अवधारणात्मक श्रेणी थे. इस खांचे में जातियों को कैसे और कहां समोया जा सकता था? वे कैसे एक साथ वजूद में रह सकती हैं? इसी तरह मैं आंबेडकर द्वारा जातियों की जड़ को हिंदू धर्मशास्त्रों में देखने और धर्म बदल लेने के उनके समाधान को लेकर भी बेचैनी महसूस करता हूं. मुझे इस पर हैरानी थी कि आंबेडकर ने कम्युनिस्टों के इस दावे के लिए सामान मुहैया कराया कि जातियां महज ऊपरी ढांचे का हिस्सा थीं. आंबेडकर वाजिब ही कम्युनिस्टों से परेशान थे कि उन्होंने जातियों के सवाल को नजरअंदाज किया और क्रांति को लेकर अड़े हुए थे. लेकिन जब आंबेडकर ने अपनी जाति-विरोधी दलील को पेश किया, तो अनजाने में ही, उनकी दलील ने कम्युनिस्टों की मदद की. यह सब तो एक बात, आखिर जाति कैसे बस हिंदू धर्मशास्त्रों में ही हो सकती है, या फिर हिंदू धर्म की तरकीब हो सकती है? अगर ऐसा है तो भारत के दूसरे धर्मों में जातियों के वजूद को कैसे समझा जा सकता है? मैं इस खयाल को हजम नहीं कर पाया कि किसी एक इंसान ने कुछ लिख दिया और समाज उसके आधार पर ढल गया. जातियों के पैदा होने की कुछ भौतिक वजह होनी चाहिए. धर्म के आधार पर विचारधारा इसको कायम रखने में अपना योगदान दे सकती है, लेकिन यकीनन यह इसे पैदा नहीं कर सकती.

शुरू-शुरू में मुझे अपने नजरिए के लिए आंबेडकरियों और मार्क्सवादियों दोनों से ही खासे विरोध का सामना करना पड़ा. आंबेडकरी मार्क्सवाद की अपनी सतही धारणाओं के साथ आसानी से मुझे मार्क्सवादी करार देते थे. मार्क्सवादियों को उतना सतही होने की भी जरूरत नहीं थी, उनके लिए मेरा दलित होना ही मुझसे आंबेडकरी के रूप में पेश आने के लिए काफी था. यह एक ऐसा नसीब है, जो भारत में हरेक प्रगतिशील दलित कार्यकर्ता के हिस्से आता है. आप हमेशा ही जाति के खोखल में वापस फेंक दिए जाते हैं या फिर आपको जाति से बाहर कर दिया जाता है, उसी तरह जैसे जातियां बुनियादी तौर पर काम करती हैं. इसने भी इसे साबित किया कि भारतीय समाज में अभी भी कितना जहर है कि मार्क्सवादी भी इससे बचे नहीं रह सकते. यह बुश की उस दलील से मिलती जुलती है, कि या तो आप हमारे साथ हैं या फिर हमारे खिलाफ. इसके लिए दलितों को माफ किया जा सकता था, पहली बात तो इसलिए कि मार्क्सवादियों के उलट वे अपने को राह दिखाने वाले किसी महान सिद्धांत का दावा नहीं करते और दूसरी कि वे शासक वर्गों द्वारा की जा रही हर तरह की सियासी धांधलियों से महफूज नहीं हैं.

लेकिन इन सबसे मुझे फिक्र नहीं हुई; क्योंकि मैं जानता था कि मैं क्या था. इसके उलट, इस पूरे दौरान मुझे इन वादों के बारे गंभीर संदेह पैदा होने लगे, जो अपने मानने वालों में पहचान पर आधारित पूर्वाग्रहों का जहर भरने के अलावा कोई काम नहीं करते. मैंने अनेक ऐसे लोगों को देखा है, जो पक्के आंबेडकरी होने का दावा करते थे, मगर लेकिन जिन्होंने असल में आंबेडकर की लिखी हुई एक भी किताब नहीं पढ़ी है. और इसी तरह मैं ऐसे मार्क्सवादियों को जानता हूं (अब वे महज मार्क्सवादी ही नहीं हैं, वे मार्क्सवादी-लेनिनवादी और माओवादी हैं) जो इसी तरह से मार्क्सवाद के बुनियादी उसूलों से अनजान हैं. यह इन संभावित क्रांतिकारी आंदोलनों के लिए हंसी के काबिल, लेकिन साथ ही त्रासदी भरी हुई हालत है (हालांकि आंबेडकरी शायद इसे क्रांति कहें या न कहें, लेकिन जातियों का उन्मूलन भारत में किसी क्रांति से कम नहीं है) कि वे अपनी नादानी पर फिदा होने वाली खोखली पहचानों में सिमट कर रह गए हैं. बेशक, दोनों तरफ ऐसे लोग हैं जो अपने क्रांतिकारी वायदों को लेकर काफी संजीदा हैं लेकिन वे अपने चारों ओर मौजूद, पहचान पर काम करने वाली भीड़ में दब गए हैं. मेरा लिखी हुई रचनाओं का अनुवाद होता है, उन पर जवाब आते हैं और उनके आधार पर आगे चीजें लिखी जाती हैं, यह तथ्य दिखाता है कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. और फिर बोहेमियाई खुशफहमियों के हाथों बिक चुके नौजवानों के उस बड़े से नवउदारवादी हिस्से को अलग कर देने के बाद भी, नौजवानों की एक बढ़ती हुई आबादी है, जो अपने भविष्य को लेकर बहुत उलझन में है. यह आबादी मेरी बातों को सुनती हुई लगती है. इस नजरिए से, मुझे महसूस होता है कि यह किताब मेरे विचारों को समझने में और भी मदद करेगी.

जाति और वर्ग पर मेरी समझदारी न तो प्रयोगों से पैदा हुई है और न ही किताबों से. अपनी सार्वजनिक सक्रियता (एक्टिविज्म) के जरिए भी जाति के सवाल पर सोचना मैंने काफी बाद में शुरू किया. हालांकि मैं एक दलित के रूप में पैदा हुआ था, लेकिन दूसरों के उलट मुझे अपने बचपन में जाति के कड़वे अनुभवों का सामना नहीं हुआ हालांकि दलितों का ढांचागत अलगाव दूसरे किसी भी गांव की तरह मेरे गांव में भी था. दलितों और गैर-दलितों को एक सड़क अलग करती थी, जो आगे चल कर खेतों से होते हुए एक पतली सी पगडंडी में बदल जाती और दो खेतों के बाद दलितों के एक कुएं तक और फिर आखिर में एक दूसरे गांव तक ले जाती थी. हालांकि दलितों और दूसरों के बीच आपसी रिश्तों में यह कोई मायने नहीं रखता था. लोगों ने शायद इस बात को अपने अंदर जज्ब कर लिया था कि उन्हें क्या करना है और वे अपनी अपनी दुनिया के दायरों में जी रहे थे.

अब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूं तो लगता है कि इसकी बड़ी वजह गांव की अजीबोगरीब राजनीतिक अर्थव्यवस्था थी. यह गांव कोयले, चूनापत्थर, डोलोमाइट वगैरह से भरपूर था, यहां देश की सबसे पुरानी कोयले की खदानों में से एक खदान थी, हालांकि यह मेरे पूरे बचपन के दौरान बंद रही थी. दूसरी तरफ यहां दो दर्जन चूना भट्ठियां थीं और उनके लिए चूनापत्थर का खनन होता था. पूरा इलाका गतिविधियों से भरपूर था. सबसे अहम तथ्य ये था कि कोलियरी की वजह से मुख्य गांव से दोएक किलोमीटर दूर एक महानगरीय आबादी वाला एक औद्योगिक कस्बा (टाउनशिप) विकसित हो गया था, जिसमें देश के करीब-करीब सभी इलाकों से आए लोग रहते थे, लेकिन उनमें दलित आबादी सबसे ज्यादा थी. यहां तक कि हमारे गांव से भी ज्यादातर दलित मर्द और औरतें दोनों, चूना कारखानों और चूनापत्थर की खदानों में काम करते थे. इस तरह दूसरे गांवों के उलट, यहां के दलित अपने गुजर-बसर के लिए कुनबी किसानों पर निर्भर नहीं थे. इसके उलट, दलितों को हर हफ्ते नकद मजदूरी मिलने के कारण वे ज्यादातर किसानों से बेहतर हालत में दिखते थे, जिनके पास नकद रकम सिर्फ अपनी पैदावार बेचने के बाद ही आती थी. सूखी जमीन पर खेती के कारण वैसे भी आमदनी कम ही थी. इसका असर दलितों और गैर-दलितों के बीच रिश्तों में दिखता था, जिन्हें किसी न किसी रिश्ते के नाम से ही बुलाया जाता था, जैसे कि मामा, काका (चाचा), आजा, आजी (दादा, दादी) वगैरह.

इसके बजाए, मेरे बचपन का अनुभव अपने आसपास की गैरबराबरी को लेकर बेचैनी वाला था. गांव में भी, जहां कोई भी बहुत अच्छी हालत में नहीं था, कुछ लोगों के पक्के घर थे जो अपने चूने से रंगी दीवारों के साथ आस पास की मिट्टी की झोंपड़ियों के बीच अलग ही दिखते थे. इन कुछ घरों को छोड़ कर, जो सड़क के दोनों और स्थित थे, दलितों और दूसरों के घरों के बीच कोई खास फर्क नहीं था. घरों के अलावा, ज्यादातर लोगों के पास मवेशी थे, जिन्हें मैं गांव के किसी भी बच्चे की तरह पसंद करता था, लेकिन हमारे पास एक भी जानवर नहीं था. असल में हमारा परिवार अकेला परिवार था, जिसके पास न जमीन थी न जानवर. अपनी मां से मैं भोलेपन से पूछता कि हमारे पास कोई बकरी क्यों नहीं है और फिर इसकी मांग करते हुए आसमान सिर पर उठा लेता कि वो अभी के अभी मेरे लिए एक बकरी लेकर आएं. किसी तरह वो जवाब देने की कोशिश करतीं लेकिन जल्दी ही वो सब्र खो देतीं और मुझे पीटने लगतीं. न तो उनकी पिटाई ने मुझे उन सवालों को उठाने से रोका और न ही उनके जवाब मुझे कायल कर पाए.

जवाब का इंतजार करते उन सभी सवालों का एक दिन अचानक ही जवाब मिल गया, या शायद ऐसा मुझे लगा, जब मुझे अपनी तीसरी कक्षा में अव्वल आने पर मुझे ईनाम में एक किताब दी गई. असल में मैं बीमार होने की वजह से परीक्षा ही नहीं दे सका था, लेकिन मेरे शिक्षकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. इम्तहान दूं या न दूं, मेरे लिए अव्वल जगह तय थी. ईनाम में मिली हुई किताब जोसेफ स्तालिन की मराठी जीवनी थी. यहां तक कि जिस शिक्षक ने तहसील के कस्बे की अकेली दुकान से वह किताब खरीदी थी, उसे भी इसका अंदाजा नहीं था कि वह क्या थी. यह उनके लिए बस एक किताब थी, जो स्कूल के रिवाज के मुताबिक इनाम में देने के लिए उनके बजट के भीतर थी. लेकिन मेरे हाथ में यह किताब एक बम का गोला बन जानेवाली थी. एक तरह से इसने मुझे भीतर तक इस कदर बिखेर दिया कि अब मैं वह पहले वाला बच्चा नहीं रह गया. मैंने उस किताब को पढ़ा और बार बार पढ़ा. स्तालिन की शख्सियत बहुत असरअंदाज थी, लेकिन मार्क्सवाद, समाजवाद, साम्यवाद और रूस में बोल्शेविक क्रांति जैसे एकदम नए शब्दों ने मुझे बांध लिया. एक झटके में मुझे महसूस हुआ कि मेरे सारे सवालों के जवाब हासिल हो गए. आठ साल की नाजुक उम्र में, मैंने मार्क्सवाद, साम्यवाद और रूसी क्रांति के बारे में जानकारी खोजनी शुरू कर दी. जब भी मैं शहर में अपने चाचा के घर जाता, मैं उन्हें सुत्रवे बुक सेलर के यहां खींच ले जाता, जो अपनी छोटी सी गुमटी में अपना किताबों और कैलेंडरों का सौदा फैलाए रहते. वे बुजुर्ग मेरी मांगें सुन कर हैरान होते. लेकिन उन्होंने मेरे चाचा के जरिए मुझे किताबें भेजनी शुरू कर दीं. मैंने सोचा कि मैं कम्युनिस्ट बन चुका था जिसका मिशन भारत में एक ऐसी क्रांति लाना थी, जिसमें सभी बच्चों के पास चूना पुती दीवारों वाले पक्के मकान, उनके अपने खेत, अपनी बकरियां, गाएं और भैंसे और बेशक बहुत सारी मुर्गियां होंगी.

अगले साल मैंने भगत सिंह के बारे में पढ़ा, जिन्होंने फौरन मेरे नायक के रूप में स्तालिन की जगह ले ली. मैंने कल्पना से उनकी एक तस्वीर बनाई और उसका शीर्षक रखा ‘भारत रत्न शहीद भगत सिंह’, जो मेरे स्कूल छोड़ने के बरसों बाद भी स्कूल के दफ्तर में सजा रहा. यह तब की बात है, जब मैंने नहीं जाना था कि ‘भारत रत्न’ एक सरकारी सम्मान है. यह हमेशा एक प्रेरणा देने वाले शहीद के लिए मेरी तस्दीक थी, जिसका मेरे नायक के रूप में रुतबा आज कर जस का तस बना हुआ है.

जाति के साथ मेरी मुलाकात गांव में एक अनोखी घटना से हुई, जिसमें मेरी मां ने एक नायक जैसी भूमिका निभाई थी. एक शाम, जब वे पीने का पानी लाने के लिए हमारे कुएं पर गईं, तो औरतों के बीच हलचल थी जिन्होंने पानी पर गंदगी तैरती हुई देखी थी. ऐसा शक किया गया कि कुनबी परिवार के बच्चों ने यह हरकत की थी, जो उस खेत के मालिक थे, जिनमें हमारा कुआं था. शायद उन्होंने सोचा होगा कि दलित लोग कुएं का इस्तेमाल बंद कर देंगे, और तब यह कुआं उनका हो जाएगा और खेतों की सिंचाई करने के काम आएगा. मेरी मां अभी अभी खेतों में हाड़तोड़ मेहनत करके लौटी थी. वो आगबबूला हो गईं और उन्होंने औरतों को कहा कि वे उनके साथ गांव में सवर्णों के कुएं तक चलें. आशंका के मुताबिक, कुछ कुनबी औरतों ने इसका विरोध किया और दलित औरतों के घड़े फेंक दिए. मेरी मां ने उनमें से एक को पीट कर उन्हें डरा कर भगा दिया और पानी लाने के लिए कुएं तक पहुंच गईं. खबर फैली कि महार औरतों ने कुएं को गंदा कर दिया है और कुछ आगे बढ़े हुए कुनबियों ने इसका विरोध करने के लिए लोगों को जमा किया.

अगली सुबह जब मेरी मां दलित औरतों को लेकर कुएं से पानी लाने गईं तो वहां मर्दों की भीड़ लगी हुई थी. उन्होंने रोकने की कोशिश की लेकिन दलित औरतों के चेहरों पर चुनौती के भाव देख कर वे पीछे हट गए. कुछ झड़प हुई, लेकिन दलित औरतों को जीत हासिल हुई. इसने गांव में एक साफ-साफ तनाव पैदा कर दिया. ऐसी अफवाहें थीं कि कुनबी लोग दलितों पर हमले करेंगे. उस शाम दलितों की एक बैठक बुलाई गई. हम बच्चे लड़ाई लड़ने का मौका मिलने से खासे उत्साहित थे. लेकिन मर्द लोग डरे हुए थे. उनमें से कुछ ने सिर पर आ खड़ी हुई इस मुसीबत के लिए औरतों को दोष देने की कोशिश की. लेकिन मेरी मां की चुनौती को देख कर और दूसरी औरतों द्वारा उनके साथ खड़े होने की वजह से वे पीछे हट गए. हालांकि मैं दूसरे बच्चों के साथ इस बहस को देख रहा था, लेकिन मैं अपनी ब्रिगेड का नेतृत्व करने का मौका मिलने की कल्पना में खो चुका था. बैठक के बाद, हमने पास के मैदान से पत्थर जमा करने, घरों से लोहे के सरिए और छुरियां निकालने और तैयार रहने का फैसला किया. हमने अपनी फॉर्मेशन तय की और जिम्मेवारियां आपस में बांट लीं यानी जंग की रणनीति तय हो गई.

लेकिन कोई भी हम पर हमला करने नहीं आया. अगली सुबह गांव के कोलियरी वाले हिस्से में खबर भेजी गई, जहां दलित कहीं ज्यादा संगठित और जुझारू थे. कुछ नौजवान महिलाएं एक समूह में आईं और पानी भरने जा रही हमारी गांव की औरतों की हिफाजत में खड़ी रहीं. कुनबी लोग पास फटकने से भी डर रहे थे. दोपहर बाद कोलियरी के अनेक लोगों के साथ एक बैठक हुई, जिसमें तय किया गया कि जिला आरपीआई के नेता को बुलाया जाए और इस मुद्दे पर एक बड़ी जनसभा की जाए. इस बीच, महारों को कोलियरी से मिली मदद से डरे हुए कुनबी इस मामले को दोस्ताना तरीके से सुलझाना चाहते थे. यह तय किया गया कि वे दलितों को तब तक कुएं से पानी लेने देंगे, जब तक हमारे कुएं की सफाई नहीं हो जाती, जो इसके फौरन बाद कर दी गई. लेकिन दलित गांव में साफ साफ तनाव बना रहा, क्योंकि उन्हें डर था कि कुनबी लोग हालात के सामान्य होने के बाद अपनी बेइज्जती का बदला ले सकते हैं. इस पूरे दौरान कोलियरी के नौजवान मर्दों और औरतों की एक टोली अक्सर हमारे गांव का दौरा करती रही, जिसकी वजह से कुनबियों को सुलह-सफाई का रुख अपनाना पड़ा था. जैसा कि तय किया गया था, एक बड़ी भारी जनसभा हुई जिसमें आरपीआई के जिला अध्यक्ष मि. सोंडावले आए थे. हिंदू धर्म की निंदा करते हुए और जातिवादी कुनबियों को धमकाते हुए ढेरों भाषण दिए गए. बात में ग्राम पंचायत द्वारा गांव के हमारे हिस्से में एक सार्वजनिक कुआं बनाने का फैसला किया गया, जिसका उपयोग सभी जातियों द्वारा होना था. यह वो घटना थी, जिसने जाति नाम के शैतान से मेरी भेंट करवाई.

लेकिन इस मुलाकात में जातियों का सताने वाला पहलू शामिल नहीं था. यह बात समझ में आई कि जिन लोगों को कुनबी कहा जाता है, उन लोगों से हम अलग थे और अलग रहते थे. इतना ही. कमतर होने का कोई खयाल नहीं था. जाति के साथ इस मुठभेड़ में अगर ऐसा कुछ था भी तो यह था कि जीतनेवाले हम थे. कुनबियों को झुकते हुए पूरे गांव के एक आम कुएं पर आने के लिए मान जाना पड़ा था. स्कूल में पढ़ाई-लिखाई में अच्छा प्रदर्शन करने की वजह से मेरा सम्मान था, हालांकि मेरे अजीबोगरीब व्यवहार से कुछ शिक्षकों द्वारा खास तौर से मुझे पसंद नहीं करते थे. उन दिनों एक बोर्ड के तहत आनेवाले स्कूलों के बीच एक होड़ होती था. चौथी और सातवीं कक्षाओं के लिए इम्तहान बोर्ड द्वारा किसी बड़े गांव में लिए जाते थे. अगर किसी गांव का छात्र बोर्ड में अव्वल आता तो यह उसके लिए बड़ी इज्जत की बात होती थी. चूंकि मैं अपने गांव के लिए यह सम्मान ला सकता था, इसलिए पूरा गांव मेरा आदर करता था. इससे भी आगे बढ़ कर कुछ कुनबी परिवार हमें मट्ठा, दही, घी और खेती की कुछ उपज दे जाते, क्योंकि हमारे परिवार के पास कोई जमीन या मवेशी नहीं थे. शायद इसमें गांव में जातियों की आपसी निर्भरता की झलक मिलती थी.

जाति के साथ मेरी मुलाकात में रत्ती भर भी कमतरी का खयाल जुड़ा हुआ नहीं था. अपने गांव के स्कूल से सातवीं पास करने के बाद जब मैं शहर में उच्च विद्यालय में गया, तो मैं चाचा के घर में रहने लगा. यह घर स्कूलों के झुंड की ओर ले जाने वाली एक सड़क के किनारे था, जिस पर कुछ ब्राह्मण लड़के चलते थे. उन्हें रोक कर उनसे ‘आंबेडकर की जय’ बुलवाना हमारा खेल हुआ करता था. बेचारे लड़के मान जाते और तंग किए जाने से बच जाते. बाद में, वे सड़क के उस हिस्से से दौड़ कर भाग जाते और कुछ तो एक लंबा रास्ता पकड़ लेते और उस सड़क से ही आने से बचते. उच्च विद्यालय में हमें ब्राह्मण बच्चों के खिलाफ एक सीधी लडाई लड़नी पड़ी, जिन्हें आरएसएस की काली टोपियां पहनने की इजाजत थी, जो स्कूली पोशाक का उल्लंघन थी. जब मैं दसवीं में पहुंचा और तब तक पढ़ाई-लिखाई में अच्छे प्रदर्शन के चलते मेरा कहना मानने वाले बच्चों की एक बड़ी तादाद हो गई थी, एक दिन हमने दलित छात्रों को सुबह की प्रार्थनाओं में नीली टोपियां पहनाईं. इस पर पीटी टीचर द्वारा आपत्ति जताई गई, जो खुद भी एक दलित थे. लेकिन हमने उन्हें चुनौती दी. मुसलमान हेडमास्टर ने हमसे बातचीत की और वादा किया कि वे ब्राह्मण अभिभावकों से अपने बच्चों को सिर्फ स्कूली पोशाक पहना कर भेजने को कहेंगे. इसके बाद जल्दी ही, काली टोपियां गायब हो गईं. जाति के साथ ऐसे अनुभव थे, जो मेरे बचपन के इस ‘कम्युनिस्ट’ भरोसे से मेल खाते थे कि अगर हमने संघर्ष किया तो हम जीत सकते हैं.

इस पूरे दौरान, आंबेडकर एक मिथक थे, जिनके बारे में कोई जानकारी नहीं थी, सिवाय उन गीतों के जो कुछ उत्सवों के मौकों पर लाउडस्पीकरों पर जोर जोर से बजते थे. सिर्फ नागपुर पहुंचने बाद ही मैं यूनिवर्सिटी के पुस्तकालय में उनकी किताबें पढ़ पाया. इस पढ़ाई के साथ साथ होस्टलों में साथी छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव की कहानियों ने मुझे जाति के बारे में, और आंबेडकर और मार्क्स के आपस में एक दूसरे की जगह लेने वाले नजरियों के बारे में सोचने पर मजबूर किया जिसके दौरान जाति को बार बार वर्ग के बरअक्स खड़ा करके देखता. तभी मुझे उन तरीकों में कुछ गलत होने का हल्का-हल्का अहसास होने लगा था जिनके तहत जाति और वर्ग के खिलाफ लड़ाइयों को एक दूसरे के समांतर रखा जाता है, जबकि व्यापक तौर पर उनके विषय एक दूसरे में शामिल थे. इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद इंजीनियरिंग कॉलेज में पहुंचने के बाद मैंने अपने होस्टल में, एक दूसरे से पूरी तरह अलग थलग रहने वाले दूसरे छात्रों के साथ दो स्टडी सर्किल शुरू किए, एक स्टडी सर्किल में मार्क्स पर विचार किया जाता और दूसरे में आंबेडकर पर. हम हफ्ते में एक बार मिलते, जब मैं इन लोगों की किसी रचना की व्याख्या करता और इसके बाद बहस होती. मैं वहां अपने नजरिए को परखना चाहता, लेकिन मैं निराश हो जाता क्योंकि उन्हें चुनौती देने वाला वहां कोई नहीं था. नक्सलवादी आंदोलन आम चर्चा में था और अखबारों से रोज ही कोई न कोई खबर या नजरिया सामने आता.

मैंने सोचा कि बेकार ही बौद्धिक की तरह लगने के बजाए, आत्मकथात्मक लगने का जोखिम उठाते हुए यह लंबी भूमिका एक गांव के एक बच्चे के रोज-ब-रोज के आम अनुभवों की दुनिया में वर्ग और जाति के आपसी मेल-जोल को देखने का शायद बेहतर तरीका होगी. मैं सार्वजनिक रूप से अपने बारे में बोलने से बचता हूं कि कहीं यह एक और दलित जीवनी न बन जाए जो हमेशा ही लेखक की अपनी शख्सियत को सामने लाने के लिए सामाजिक पहलू पर हावी हो जाती है. मेरी नजर में यह छोटा सा ब्योरा इसके बारे में समझाता है कि जाति और वर्ग के बारे में मेरे विचारों के बीज कैसे पड़े और कैसे हालात ने उन्हें एक खास तरीके से ढाला. यह आलोचनात्मक सोच की भूमिका को देखने में मदद कर सकती है.

मैं नहीं जानता कि रूबीना ने किस आधार पर इन निबंधों को चुना है. ये मुझे खासे बेतरतीब लगे. लेकिन उन्होंने जिस भी आधार पर इन्हें चुना हो, ये इस मायने में कारगर हैं कि एक परिचय के रूप में यह संकलन जाति और वर्ग के संबंध में अनेक मुद्दों पर मेरे नजरिए का एक जायजा पेश करता है. मैं उनके और विस्तार में जाने के उकसावे में पड़ने से खुद को रोकूंगा और पाठकों को खुद फैसला करने के लिए इसे उन्हीं पर छोड़ देना पसंद करूंगा. इस पहलकदमी के लिए मुझे रूबीना का और तारीफ के काबिल इस अनुवाद के लिए रेयाज का जरूर ही शुक्रिया अदा करना चाहिए.


किताब: जनवादी समाज और जाति का उन्मूलन
लेखक: आनंद तेलतुंबड़े
प्रकाशक: आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा
मूल्य: 200.00 (पेपरबैक)

Monday, November 30, 2015

सहिष्णुता के अहंकार में डूबा समाज

सहिष्णुता के अहंकार में डूबा समाज


आमिर खान के बयान के बाद छिड़े विवाद पर विद्या भूषण रावत की टिप्पणी।

आमिर खान की पत्नी के 'विदेश में बसने की खबर' से हर 'भारतीय' सदमे में हैं और उनको शाहरुख़ खान के साथ पाकिस्तान भेजने की बात कह रहे है। आमिर के पुतले जलाए जा रहे हैं और देश की विभिन्न अदालतों में उनके खिलाफ मुकदमे किए गए हैं जिनमें देशद्रोह का मुकदमा भी शामिल है। सबसे मज़ेदार बात यह है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय इस अभियान को बहुत हवा दे रहे हैं. वैसे भारत में रहने वाले लोग भी कह रहे हैं कि आमिर ने गद्दारी की है और उनको इसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। है न कितनी अच्छी बात कि हम पश्चिमी लोकतान्त्रिक देशों में रहकर पूरे अधिकार के साथ भारत माता की जय बोलना चाहते हैं, मंदिर बनाना चाहते हैं, मोदी की बड़ी बड़ी रैलियां करना चाहते हैं लेकिन अपने देश में हम पूरी दबंगई दिखाना चाहते हैं। अगर यही बात अमिताभ करते तो क्या उन्हें कहीं भेजने की बात होती?

हम फ़िल्मी कलाकारों को भगवान बनाकर न देखें। व्यक्तिगत तौर पर मैं आमिर खान को ढकोसलेबाज़ मानता हूँ क्योंकि उनकी सत्य की जीत 'रिलायंस' के चंदे से होती है और भारत में अगर हम भ्रष्टाचार को लेकर लालू को इतना गरियाते हैं तो अम्बानी तो उस बीमारी के जनक थे। क्या अर्नब गोस्वामी जैसे भारत में 'ईमानदारी' का राग अलापने वाले मसीहा लोग अम्बानी और अडानी के बारे में बात करेंगे? जब करप्शन की बात हो तो राजनेताओं का ही हिसाब किताब क्यों हो, उद्योगपतियों का क्यों नहीं, क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगा उनकी ही दुकानों से निकलती है। इसलिए आमिर ने जो कहा वो बहुत सोच-विचार, रिहर्सल के बाद कहा और वो उनका व्यू पॉइंट है और उसे रखने की उनको छूट होनी चाहिए। उनको पाकिस्तान भेजने और उनको गाली देकर हिंदुत्व के लठैत आमिर की ही बात को सही साबित कर रहे हैं।

हालांकि, मैं आमिर की बातों से कत्तई इतेफाक नहीं रखता। सबसे पहले तो आमिर की यह बात गलत है कि भारत में असिहष्णुता अचानक बढ़ गई। हमारा देश असल में असभ्य और क्रूर है, जहाँ दहेज़ के लिए लड़कियां रोज जलती हैं, जहाँ प्रेम विवाह करने पर माँ बाप अपने ही बच्चों की निर्ममता से हत्या करने से नहीं घबराते, जहाँ किसी भी लड़की का शाम को घर से बाहर निकलना मुश्किल होता है। जहाँ सती का आज भी महिममंडन होता हो और विधवा होने पर औरतों की जिंदगी नरक बना दी जाती हो, जहाँ आज भी मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर उनकी हत्या कर दी जाती हो, जहाँ किसी के घर में क्या बन रहा हो उस पर समाज नियंत्रण करना चाहता हो, जहाँ स्कूलों से बच्चे इसलिए निकल कर चले जाते हो कि खाना किसी दलित महिला ने बनाया है, उस देश की महानता और संस्कृति का क्या कहें, जहां एक समाज को पढ़ने का हक़ नहीं और दूसरे को केवल मलमूत्र उठाने की जिम्मेवारी दी गई हो, जिसके छूने भर से लोग अछूत हो जाएं! लेकिन भारत की महान सभ्यता का ढोंग करने वालों का ध्यान इधर कभी नहीं गया। ऐसा नहीं कि इस विषय में लिखा नहीं गया हो या बात नहीं की गई हो।

असहिषुणता का इतिहास लिखें तो शर्म आएगी, तब आमिर खान से क्यों इतनी नाराज़गी है? मतलब साफ़ है। भारत के इलीट मुस्लिम सेकुलरिज्म के खेल में भारत की सहिष्णुता के सबसे बड़े 'ब्रांड' एम्बेसडर हैं। और जो व्यक्ति 'अतुलनीय भारत' की नौटंकी करता रहा हो वो अचानक पाला क्यों बदल बैठा! आमिर खान और अन्य कलाकारों ने भारत के 'सहिष्णु' होने के सबूत दिए और साथ ही दलितों या पसमांदा मुसलमानों की हालतों पर चुप रहकर उन्होंने हमेशा ही 'सहिष्णु' परम्परा का 'सम्मान' किया है। शायद रईसी परंपरा में केवल बड़े बड़े लोगों की बड़ी बड़ी बातें सेकुलरिज्म होती हैं लेकिन हलालखोर, कॅलण्डर, नट या हेला भी कोई कौम है, इसका शायद इन्हें पता भी नहीं होगा। हमें पता है कि अभी तक मैला ढोने की प्रथा के विरुद्ध आमिर ने कभी निर्णायक बात नहीं की, वो केवल टीवी शो में आंसू बहाने तक सीमित थी।

तो फिर क्या बदला? लोग कहते हैं कि कांग्रेस के ज़माने में भी सेंसरशिप लगी और फिल्में प्रतिबंधित हुईं। बिलकुल सही बात है। हम इमरजेंसी के विरुद्ध खड़े हुए लेकिन अब ऐसा लगता है कि सत्तारूढ़ दल का मुख्य आदर्श संजय गांधी और चीखने चिल्लाने वाले मुल्ले हैं जो किसी भी उदार विचार को या उनसे विपरीत विचार को डंडे और धमका डरा के रुकवाना चाहते हैं। फ़िल्मी लोगों को उतनी ही तवज्जो मिलनी चाहिए जिसके वे हक़दार हैं। पिछले कुछ वर्षों में बम्बइया फ़िल्मी लोग हिंदुत्व का एजेंडा लागू करने में सबसे प्रमुख रहे हैं और उनकी प्रसिद्धि ने चुनाव भी जितवाया है लेकिन उनमें कोई भी ऐसे नहीं हैं जो शाहरुख़, आमिर या अमिताभ का दूर दूर तक मुकाबला कर सके। अमिताभ हालाँकि गुजरात या अन्य सरकारी विज्ञापनों में आते हैं लेकिन वो भी राजनैतिक हकीकतों से वाकिफ हैं, इसलिए चुप रहते हैं। हालाँकि देर सवेर उन्हें मुंह खोलना पड़ेगा। आज के हिंदुत्व कॉर्पोरेट के दौर में भारत की आक्रामक मार्केटिंग चल रही है इसलिए आमिर या शाहरुख़ जो वाकई में भारत के सवर्णों की 'सहनशीलता' के 'प्रतीक' हैं इसलिए उनसे ये 'उम्मीद' ये की जाती है कि वे डॉ. ए. पी. जे. कलाम की तरह अपने 'भारतीय' होने का सबूत दें। कोई मुसलमान यदि अपने दिल की बात रख दे तो वो 'देशद्रोही' है। जिन लोगों को सुनकर हम बड़े हुए उन साहिर, दिलीप कुमार, मोहम्मद रफ़ी, बेगम अख्तर को धर्म के दायरे में डाला जा रहा क्योंकि वे अपनी एक राय रखते हैं। कई बार फिल्म स्टार, गायक या खिलाड़ी लोग वो बात कह देते हैं जो उनके कई प्रशंसकों को नहीं जंचती। उसमें कोई बुरी बात नहीं है। हम आमिर खान से साम्प्रदायिकता और सहिष्णुता का ज्ञान नहीं लेते, अपितु उनकी फिल्म इसलिए देखते हैं कि वो साफ सुथरी फिल्म बनाते हैं। क्या हम रवीना टंडन, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान या मनोज तिवारी से ज्ञान लें? हाँ फिल्मो में बहुत से लोग रहे हैं जिन्होंने गंभीर विषयों पर बोला है और उनकी समझ समझ है। बाकी हमको कोई कलाकार इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि हमें उसकी एक्टिंग अच्छी लगती है या फिल्म अच्छी लगती है। अगर आप आमिर या शाहरुख़ की फिल्मों का बॉयकॉट इसलिए करना चाहते हैं कि उनकी कोई बात आपको अच्छी नहीं लगी तो फैसला आपका है क्योंकि फिर आपको मनोज तिवारी, अनुपम खेर, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान आदि की फिल्मे देखनी पड़ेंगी क्योंकि उनके विचार आपको अच्छे लगते हैं।

आमिर खान ने जो कहा वो उनका हक़ था और शायद देश का बहुत बड़ा तबका वैसे ही सोच रहा है। अपने दिल की बात को अगर वो कह दिए तो हमारा क्या फ़र्ज़ है? उसको गालियों से लतियाएं या भरोसा दिलाएं? आमिर ने बस एक ही बात गलत कही कि असहिष्णुता बढ़ रही है, क्योंकि वो पहले से ही है। इस देश के लोगों ने उनको प्यार दिया है। जो लोग इस वक़्त दबंगई कर रहे हैं वो हमें आपातकाल के संजय गांधी के गुंडों की याद दिला रहे हैं। आमिर को कहना चाहिए कि कौन लोग ऐसा तमाशा कर रहे हैं। ये पूरे देश के लोग नहीं हैं, ये एक पार्टी विशेष और जमात विशेष के लोग हैं जिन्होंने उन सभी को गरियाने और धमकाने का लाइसेंस लिया हुआ है जो इनकी विचारधारा से मेल नहीं खाते। इसलिए आमिर साहेब सबको न गरियाएं। साफ़ बोलिए वो कौन हैं जो असहिष्णुता फ़ैला रहे हैं। इमर्जेन्सी का विरोध करने वालों का सबसे बड़ा मॉडल इमरजेंसी का दौर ही है और वही व्यक्तिवादी राजनीति आज हावी है। केवल फर्क इतना है कि उस दौर में दूरदर्शन और रेडियो पर समाचार सरकार सेंसर करती थी और आज सरकार और सरकारी पार्टी के दरबारी पत्रकार पूरी ताकत से ये काम कर रहे हैं। आज अर्नब गोस्वामी और सुधीर चौधरी का दौर है जिसमें सरकार से मतभेद रखने वालों की खबरें सेंसर ही नहीं होंगी बल्कि उनको अच्छे से गरियाया जाएगा। आखिर 9 बजे के प्राइम टाइम शोज का यही उद्देश्य है। हकीकत यह है कि हम वाकई में एक भयानक दौर से गुजर रहे हैं जिसमें तिलिस्मी राष्ट्रवादी नारों की गूँज में हमारे मानवाधिकारों और अन्य संवैधानिक अधिकारों की मांग की आवाज़ों को दबा दिया जा रहा है। पूंजीवादी ब्राह्मणवादी लोकतंत्र से आखिर आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं? वो तो सन्देश वाहक को ही मारना चाहता है ताकि खबर ही न रहे और खबरें बनाने और बिगाड़ने के वर्तमान युग में मीडिया निपुण होता जा रहा है, जो बहुत ही शर्मनाक है।

Friday, November 6, 2015

देश चला रहे शख्स के संवेदनशील मामलों पर चुप रहने और उनके सहयोगियों की गैरजिम्मेदाराना बयानबाज़ी पर मानव अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी का लेख.

फिर देश बोलेगा और आपको सुनना होगा!

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/02/2015 07:46:00 PM

देश चला रहे शख्स के संवेदनशील मामलों पर चुप रहने और उनके सहयोगियों की गैरजिम्मेदाराना बयानबाज़ी पर मानव अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी का लेख. 

आज देश के हर क्षेत्र के नामचीन लोग यह कह रहे है कि देश में सहिष्णुता का माहौल नहीं है, लोग डरने लगे हैं. अविश्वास और भय की स्थितियां बन गई हैं, फिर भी सत्ता प्रतिष्ठान के अधिपति इस बात को मानने को राजी नहीं दिखाई दे रहे हैं. साहित्यकारों द्वारा अवार्ड लौटाए जाने को उन्होंने साज़िश करार दिया है. उनका कहना है कि ये सभी साहित्यकार वर्तमान सत्ता के शाश्वत विरोधी रहे हैं तथा एक विचारधारा विशेष की तरफ इनका रुझान है, इसलिए इनकी नाराजगी और पुरस्कार वापसी कोई गंभीर मुद्दा नहीं है.

सत्ताधारी वर्ग और उससे लाभान्वित होने वाले हितसमूह के लोग हर असहमति की आवाज़ को नकारने में लगे हुए हैं. ऐसा लगता है कि नकार इस सत्ता का सर्वप्रिय लक्षण है. शुरुआती दौर में जब वर्तमान सत्ता के सहभागियों के अपराधी चरित्र पर सवाल उठे और एक मंत्री पर दुष्कर्म जैसे कृत्य का आरोप लगा तो सत्ताधारी दल ने पूरी निर्लज्जता से उसका बचाव किया और उन्हें मंत्रिपद पर बनाए रखा. इसके बाद मानव संसाधन जैसे मंत्रालय में अपेक्षाकृत कम पढ़ी लिखी मंत्री महोदया के आगमन पर बात उठी तो वह भी हवा में उड़ा दी गयी. ललित गेट का मामला उठा और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तथा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का इस्तीफ़ा माँगा गया तब भी वही स्थिति बनी रही. व्यापमं में मौत दर मौत होती रही मगर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान निर्भयता से शासन का संचालन करने के लिए स्वतंत्र बने रहे.

महंगाई ने आसमान छुआ. सत्ता के सहयोगी बेलगाम बोलते रहे, मगर फिर भी प्रधानमंत्री ने कुछ भी कहना उचित नहीं समझा दहाड़ने वाले मोदी लब हिलाने से भी परहेज़ करने लगे. गोमांस के मुद्दे पर जमकर राजनीति हुई, सिर्फ संदेह के आधार पर देश भर में तीन लोगों की जान ले ली गयी. एक पशु जिसे पवित्र मान लिया गया, उसके लिए तीन तीन लोग मार डाले गए. पर इसका सिंहासन पर कोई असर नहीं पड़ा. सत्ताधारी दल के अधिकृत प्रवक्ता इन हत्याओं की आश्चर्यजनक व्याख्याएं करते रहे, कई बार तो लगा कि वे हत्याओं को जायज ठहराने का प्रयास कर रहे है. भूख और गरीबी के मुद्दे गाय की भेंट चढ़ गए, फिर भी प्रधानमंत्री नहीं बोले. शायद मारे गए लोगों की हमदर्दी के लिए मुल्क के वजीरे आज़म के पास कोई शब्द तक नहीं बचे थे, इस सत्ता का कितना दरिद्र समय है यह?

तर्कवादी, प्रगतिशील, वैज्ञानिक सोच के पैरोकार और अंधविश्वासों के खिलाफ़ जंग लड़ रहे तीन योद्धा नरेंद्र दाभोलकर, कामरेड गोविन्द पानसरे एवं प्रोफेसर कलबुर्गी मारे गये. यह सिर्फ तीन लोगों का क़त्ल नहीं था, यह देश में तर्क, स्वतंत्र विचार और वैज्ञानिक सोच की हत्या थी, मगर प्रधानमंत्री फिर भी नहीं बोले.

देश भर में दलित उत्पीड़न की वारदातों में बढ़ोतरी हुई, दक्षिण में विल्लपुरम से लेकर राजस्थान के डांगावास तथा हरियाणा के सुनपेड़ तक दलितों का नरसंहार हुआ, दलित नंगे किए गए, महिलाओं को बेइज्जत किया गया, दलित नौजवान मारे गए, मोदी जी को उनके आंसू पूंछने की फुर्सत नहीं मिली. हर जनसंहार पर सत्ता के अहंकारियों ने या तो पर्दा डालने की कोशिश की या उससे अपने को अलग दिखाने की कवायद की. एक केन्द्रीय मंत्री ने तो मारे गए दलित मासूमों की तुलना कुत्तों से कर दी और हंगामा होने पर यहाँ तक कहने में भी कोई संकोच नहीं किया कि जब मैं मीडिया से बात कर रहा था, तब वहां से कुत्ता गुजरा, इसलिये मैंने उसका नाम ले लिया, अगर भैंस निकल आती तो भैंस का नाम ले लेता! यह गाय, भैंस सरकार है या देश की सरकार है?

महिलाओं की अस्मत पर खतरे कम नहीं हुए, बल्कि बढ़े हैं. डायन बता कर हत्या करने, अपहरण, बलात्कार के मामलों में कई प्रदेश भयंकर रूप से कुख्यात हुए. मासूमों से दुष्कर्म और उनकी निर्मम हत्याओं की देशव्यापी बाढ़ आई हुई है, जिनकी जिम्मेदारी है इन्हें रोकने की, वो सत्तासीन लोग उलजलूल बयानबाज़ी करके पीड़ितों के घाव कुरेदते रहे फिर भी हमारे महान देश के पंतप्रधान मौनी बाबा बने रहे. लोग यह कह सकते है कि उनका ज्यादातर समय बाहर के मुल्कों की यात्रा में बीता है, इसलिए वो पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाए. मगर जब घर में आग लगी हो तो कोई घूमने नहीं जाता सिवाय हमारे प्रधानमंत्री जी के.

मोदीजी आप किस तरह के प्रधानमंत्री हैं. क्या वाकई आपको कुछ भी पता नहीं है, या आपको सब कुछ पता है और आप ऐसा होने देना चाहते हैं. आपके देश में साहित्यकार धमकियों के चलते लिखना छोड़ देते हैं, तर्क करने वाले मार दिये जाते हैं. पड़ोसी मुल्क के कलाकार अपने फन की प्रस्तुति नहीं कर सकते हैं. कहीं खेल रोके दिये जाते हैं तो कहीं किसी के चेहरे पर स्याही छिड़की जाती है. प्रतिरोध के स्वरों को विरोधी दल की आवाज कह कर गरियाया जाता है. जाति और धर्म के नाम पर मार काट मची हुई है. वंचितों के अधिकार छीने जा रहे हैं. अल्पसंख्यकों को भयभीत किया जा रहा है. बुद्धिजीवियों को हेय दृष्टि से देखा जा रहा है, मगर आप है कि 'मेक इन इंडिया', 'डिजिटल इंडिया' और 'विकास' का ढोल पीट रहे हैं. जब पूरा मुल्क ही अशांत हो तो वह कैसे विकास करेगा? कैसा विकास और किनका विकास? किनके लिए विकास? सिर्फ नारे, भाषण और नए नए नाम वाली योजनाओं की शोशेबाजी, आखिर इस तरह कैसे यह देश आगे बढ़ेगा. यह देश एक भी रहेगा या बांट दिया जायेगा. कैसा मुल्क चाहते हैं आपके नागपुरी गुरुजन? शुभ दिनों के नाम पर कैसा अशुभ समय ले आए आप? और आपके ये बेलगाम भक्तगण जिस तरह की दादागिरी पर उतर आये हैं वे आपातकाल नामक सरकारी गुंडागर्दी से भी ज्यादा भयानक साबित हो रही है.

बढ़ती हुई असहिष्णुता और बिगड़ते सौहार्द पर देश के साहित्यकार, चित्रकार, फ़िल्मकार, उद्योगपति, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, रिजर्व बैंक के गवर्नर और यहाँ तक कि राष्ट्रपति तक बोल रहे हैं. आप कब बोलेंगे? कब आपकी ये अराजक वानर सेना नियंत्रित होगी? चुप्पी तोड़िए पीएम जी, केवल रेडियो पर मन की बात मत कीजिए, देश के मन की बात भी समझिए और उसके मन से अपने मन की बात को मिला कर बोलिए, ताकि देशवासियों का भरोसा लौट सके. देश के बुद्धिजीवी तबके की आवाज़ों को हवा में मत उड़ाइए. असहमति के स्वरों को कुचलिए मत और अपने अंध भक्तों को समझाइए कि सत्ता का विरोध देशद्रोह नहीं होता है, और ना ही प्रतिरोध करने वालों को पड़ोसी मुल्कों में भेजने की जरूरत होती है. एक देश कई प्रकार की आवाज़ों से मिलकर बनता है. हम सब मिलकर एक देश है, ना कि नाम में राष्ट्रीय लगाने भर से कोई राष्ट्र हो जाता है.

भारत अपनी तमाम बहुलताओं, विविधताओं और बहुरंगी पहचान की वजह से भारत है. इसलिए यह भारत है क्योंकि यहाँ हर जाति, धर्म, पंथ, विचार, वेश, भाषा और भाव के व्यक्ति मिलकर रह सकते हैं. तभी हम गंगा जमुनी तहज़ीब बनाते हैं. सिर्फ गाय का नारा लगाने और गंगा की सफाई की बातें करने और देश विदेश के सैर सपाटे से राष्ट्र नहीं बनता, ना ही आगे बढ़ता है. सबको साथ ले कर चलना है तो भरोसा जीतिएगा. डर पैदा करके सत्ताई दमन के सहारे दम्भी शासन किसी भी मुल्क को ना तो कभी आगे ले गया है और ना ही ले जा पाएगा.  उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर फैलाया जा रहा कट्टरपंथ हमें एक तालिबानी मुल्क तो बना सकता है मगर विकसित राष्ट्र नहीं. यह आप भी जानते है और आपके आका भी, फिर भी अगर आप चुप रहना चाहते हैं तो बेशक रहिये, फिर यह पूरा देश बोलेगा और आप सिर्फ सुनेंगे.
https://youtu.be/HTPcgI6usZk

गर्म हवा,कुछ भी नहीं बदला।नफरतें वहीं,सियासतें वहीं बंटवारे की,अलगाव और दंगा फसाद वहीं,चुनावी हार जीत से कुछ नहीं बदलता।
हमें फिजां यही बदलनी है!
Garm Hawa,the scorching winds of insecurity inflicts Humanity and Nature yet again!
https://www.youtube.com/watch?v=QZTvF_1AN8A


पाकिस्तान बना तो क्या इसकी सजा हम अमन चैन,कायनात को देंगे और कयामत को गले लगायेंगे ?
बिरंची बाबा हारे तो नीतीश लालू के जाति अस्मिता महागबंधन की जीत होगी और मंडल बनाम कमंडल सिविल वार फिर घनघोर होगा और भारत फिर वही महाभारत होगा।फिर वहीं दंगा फसाद।

हमारे लिए चिंता का सबब है कि हमारे सबसे अजीज कलाकार शाहरुख खान को पाकिस्तानी बताया जा रहा है और उनकी हिफाजत का चाकचौबंद इतजाम करना पड़ रहा है।यही असुरक्षा लेकिन गर्म हवा है।सथ्यु की फिल्म गर्म हवा।

पलाश विश्वास

मैं यह सम्मान क्यों लौटा रही हूं: अरुंधति रॉय

कल अरुंधती राय जिनने मैसी साहेब की हिरोइन का रोल भी किया है,जिन्हें बुकर पुरस्कार मिला है,जिनने नियमागिरि पहाड़ को पूजने वाले कौंध आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ आवाज उठायी और सलवा जुड़ुम के खिलाफ जो जंगल जंगल भटकी,जिनने हाल में भारत के कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो बाबासाहेब के जाति उन्मूलन वाले आलेख को नये सिरे से अपनी प्रस्तावन के साथ जारी किया है,अब असहिष्णुता विरोधी देश जोड़ो,दुनियाजोड़ो आंदोलन के मोर्चे पर हैं।

कल अरुंधति ने भी अपना पुरस्कार लौटा दिया।कल 24 फिल्मकारों,कलाकारों ने असहिष्णुता के खिलाफ अपने राष्ट्रीय पुरस्कार लौटा दिये।जिनमें कुंदन शाह और सईद मिर्जा जैसे फिल्मकार भी शामिल हैं।

इससे पहले दिवाकर बंदोपाध्याय और आनंद पटवर्द्धन की अगुवाई में 12 पिल्मकारों ने पुरस्कार लौटाये हैं।फिलहाल भारतीय फिलमों से 36 लोगों ने पुरस्कार लौटा दिये हैं।दूसरी तरफ साहित्य अकादमी के पुरस्कार और पद छोड़ने वाले कम से कम 42 लेखक और कवि हैं।कलाकारों ने भी पुरस्कार लौटाये हैं।

शुरुआत हिंदी के कवि उदय प्रकाश ने की।यह हमार गर्व है।150 देशों का विवेक हमारे साथ है और राष्ट्र का विवेक बोल रहा है।कारवां लगातार लबा होता जा रहा है।किसी की हार जीत से हमारे लिए उम्मीत की बात यही है और बदलाव की पकी हुई जमीन भी यही है।
पलाश विश्वास


मैं यह सम्मान क्यों लौटा रही हूं: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/06/2015 03:09:00 AM

एक पुरस्कार लौटाते हुए अरुंधति रॉय यहां उन सब बातों को याद कर रही हैं जिन पर हमें नाज करना चाहिए और उन सब पर भी, जिनसे हमें शर्म आनी चाहिए और जिसके खिलाफ उठ खड़े होना चाहिए. अनुवाद: रेयाज उल हक.

हालांकि मैं इसमें यकीन नहीं करती कि सम्मान हमारे किए गए कामों का पैमाना हैं, लेकिन मैं लौटाए जा रहे सम्मानों की बढ़ती हुई तादाद में सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए मिले राष्ट्रीय सम्मान (नेशनल अवार्ड फॉर बेस्ट स्क्रीनप्ले) को शामिल करना चाहूंगी, जो मुझे 1989 में मिला था. मैं यह साफ भी करना चाहूंगी कि मैं इसे इसलिए नहीं लौटा रही हूं कि उस सबसे मैं ‘हिल’ गई हूं जिसे मौजूदा सरकार द्वारा फैलाई जा रही ‘बढ़ती हुई असहिष्णुता’ कहा जा रहा है. सबसे पहले, अपने जैसे इंसानों को पीट-पीट कर मारने, गोली मारने, जलाने और सामूहिक कत्लेआम के लिए ‘असहिष्णुता’ एक गलत शब्द है. दूसरे कि हमारे सामने जो आने वाला था, उसके काफी आसार हमारे पास पहले से थे – इसलिए भारी बहुमत से डाले गए उत्साही वोटों के साथ सत्ता में भेजी गई इस सरकार के आने के बाद से जो कुछ हुआ है, उससे मैं हिल जाने का दावा नहीं कर सकती. तीसरे, ये खौफनाक हत्याएं एक कहीं गहरी बीमारी के ऊपर से दिखने वाले आसार भर हैं. जो लोग जिंदा हैं, जिंदगी उनके लिए भी जहन्नुम है. पूरी की पूरी आबादी, दसियों लाख दलित, आदिवासी, मुसलमान और ईसाई खौफ की एक जिंदगी में जीने के लिए मजबूर कर दिए गए हैं और कुछ पता नहीं कि कब और कहां से उन पर हमला हो जाए.

आज हम एक ऐसे मुल्क में रह रहे हैं, जहां नए निजाम के ठग और कारकुन ‘गैरकानूनी हत्याओं’ की बात करते हैं, तो उनका मतलब एक काल्पनिक गाय से होता है जिसको मारा गया है – उनका मतलब एक सचमुच के इंसान की हत्या से नहीं होता. जब वे अपराध की जगह से ‘फोरेंसिक जांच के लिए सबूतों’ की बात करते हैं तो उसका मतलब फ्रिज में रखे गए खाने से होता है, न कि पीट पीट कर मार दिए गए इंसान की लाश से. हम कहते हैं कि हमने ‘तरक्की’ की है, लेकिन जब दलितों का कत्ल होता है और उनके बच्चों को जिंदा जलाया जाता है, तो आज कौन ऐसा लेखक है जो हमले, पीट-पीट कर मारे जाने, गोली या जेल से डरे बिना आजादी से यह कह सकता है कि ‘अछूतों के लिए हिंदू धर्म सचमुच में खौफ की एक भट्टी है’ जैसा बाबासाहेब आंबेडकर ने कभी कहा थाॽ कौन सा लेखक वह सब लिख सकता है, जिसे सआदत हसन मंटो ने ‘चचा साम के नाम’ में लिखा थाॽ यह बात मायने नहीं रखती कि जो कहा जा रहा है उससे हम सहमत हैं कि नहीं. अगर हमें आजादी से बोलने का हक नहीं है, तो हम एक ऐसा समाज बन जाएंगे, जो बौद्धिक कुपोषण का शिकार, बेवकूफों का राष्ट्र होगा. इस पूरे उपमहाद्वीप में नीचे गिरने की होड़ मची हुई है – और यह नया भारत बड़े जोशोखरोश के साथ इसमें शामिल हुआ है. यहां भी अब भीड़ को सेंसरिशप का जिम्मा दे दिया गया है.

मुझे इससे खुशी हो रही है कि मुझे (अपने अतीत में किसी वक्त का) एक राष्ट्रीय सम्मान मिल गया है, जिसे मैं लौटा सकती हूं, क्योंकि यह मुझे इस मुल्क के लेखकों, फिल्मकारों और अकादमिक दुनिया द्वारा शुरू की गई सियासी मुहिम का हिस्सा बनने की इजाजत देता है, जो एक तरह की विचारधारात्मक क्रूरता और सामूहिक समझदारी पर हमले के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं. अगर हम अभी उठ खड़े नहीं हुए तो यह हमें टुकड़े-टुकड़े कर देगा और बेहद गहराई में दफ्न कर देगा. मैं यकीन करती हूं कि कलाकार और बुद्धिजीवी जो अभी कर रहे हैं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ, और उसकी तारीख में कोई मिसाल नहीं मिलती. यह भी सियासत का एक दूसरा तरीका है. इसका हिस्सा बनते हुए मुझे बहुत फख्र हो रहा है. और इतनी शर्म आ रही है उस सब पर जो आज इस मुल्क में हो रहा है.

आखिर में: ताकि सनद रहे कि मैंने 2005 में साहित्य अकादेमी सम्मान को ठुकरा दिया था जब कांग्रेस सत्ता में थी. इसलिए कृपया मुझे कांग्रेस-बनाम-भाजपा की पुरानी घिसी-पिटी बहस से बख्श दीजिए. बात इससे काफी आगे निकल चुकी है. शुक्रिया.


गर्म हवा,कुछ भी नहीं बदला।नफरतें वहीं,सियासतें वहीं बंटवारे की,अलगाव और दंगा फसाद वहीं,चुनावी हार जीत से कुछ नहीं बदलता।
हमें फिजां यही बदलनी है!
Garm Hawa,the scorching winds of insecurity inflicts Humanity and Nature yet again!


पाकिस्तान बना तो क्या इसकी सजा हम अमन चैन,कायनात को देंगे और कयामत को गले लगायेंगे ?
बिरंची बाबा हारे तो नीतीश लालू के जाति अस्मिता महागबंधन की जीत होगी और मंडल बनाम कमंडल सिविल वार फिर घनघोर होगा और भारत फिर वही महाभारत होगा।फिर वहीं दंगा फसाद।

हमारे लिए चिंता का सबब है कि हमारे सबसे अजीज कलाकार शाहरुख खान को पाकिस्तानी बताया जा रहा है और उनकी हिफाजत का चाकचौबंद इतजाम करना पड़ रहा है।यही असुरक्षा लेकिन गर्म हवा है।सथ्यु की फिल्म गर्म हवा।

पलाश विश्वास