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Friday, November 6, 2015

देश चला रहे शख्स के संवेदनशील मामलों पर चुप रहने और उनके सहयोगियों की गैरजिम्मेदाराना बयानबाज़ी पर मानव अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी का लेख.

फिर देश बोलेगा और आपको सुनना होगा!

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/02/2015 07:46:00 PM

देश चला रहे शख्स के संवेदनशील मामलों पर चुप रहने और उनके सहयोगियों की गैरजिम्मेदाराना बयानबाज़ी पर मानव अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी का लेख. 

आज देश के हर क्षेत्र के नामचीन लोग यह कह रहे है कि देश में सहिष्णुता का माहौल नहीं है, लोग डरने लगे हैं. अविश्वास और भय की स्थितियां बन गई हैं, फिर भी सत्ता प्रतिष्ठान के अधिपति इस बात को मानने को राजी नहीं दिखाई दे रहे हैं. साहित्यकारों द्वारा अवार्ड लौटाए जाने को उन्होंने साज़िश करार दिया है. उनका कहना है कि ये सभी साहित्यकार वर्तमान सत्ता के शाश्वत विरोधी रहे हैं तथा एक विचारधारा विशेष की तरफ इनका रुझान है, इसलिए इनकी नाराजगी और पुरस्कार वापसी कोई गंभीर मुद्दा नहीं है.

सत्ताधारी वर्ग और उससे लाभान्वित होने वाले हितसमूह के लोग हर असहमति की आवाज़ को नकारने में लगे हुए हैं. ऐसा लगता है कि नकार इस सत्ता का सर्वप्रिय लक्षण है. शुरुआती दौर में जब वर्तमान सत्ता के सहभागियों के अपराधी चरित्र पर सवाल उठे और एक मंत्री पर दुष्कर्म जैसे कृत्य का आरोप लगा तो सत्ताधारी दल ने पूरी निर्लज्जता से उसका बचाव किया और उन्हें मंत्रिपद पर बनाए रखा. इसके बाद मानव संसाधन जैसे मंत्रालय में अपेक्षाकृत कम पढ़ी लिखी मंत्री महोदया के आगमन पर बात उठी तो वह भी हवा में उड़ा दी गयी. ललित गेट का मामला उठा और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तथा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का इस्तीफ़ा माँगा गया तब भी वही स्थिति बनी रही. व्यापमं में मौत दर मौत होती रही मगर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान निर्भयता से शासन का संचालन करने के लिए स्वतंत्र बने रहे.

महंगाई ने आसमान छुआ. सत्ता के सहयोगी बेलगाम बोलते रहे, मगर फिर भी प्रधानमंत्री ने कुछ भी कहना उचित नहीं समझा दहाड़ने वाले मोदी लब हिलाने से भी परहेज़ करने लगे. गोमांस के मुद्दे पर जमकर राजनीति हुई, सिर्फ संदेह के आधार पर देश भर में तीन लोगों की जान ले ली गयी. एक पशु जिसे पवित्र मान लिया गया, उसके लिए तीन तीन लोग मार डाले गए. पर इसका सिंहासन पर कोई असर नहीं पड़ा. सत्ताधारी दल के अधिकृत प्रवक्ता इन हत्याओं की आश्चर्यजनक व्याख्याएं करते रहे, कई बार तो लगा कि वे हत्याओं को जायज ठहराने का प्रयास कर रहे है. भूख और गरीबी के मुद्दे गाय की भेंट चढ़ गए, फिर भी प्रधानमंत्री नहीं बोले. शायद मारे गए लोगों की हमदर्दी के लिए मुल्क के वजीरे आज़म के पास कोई शब्द तक नहीं बचे थे, इस सत्ता का कितना दरिद्र समय है यह?

तर्कवादी, प्रगतिशील, वैज्ञानिक सोच के पैरोकार और अंधविश्वासों के खिलाफ़ जंग लड़ रहे तीन योद्धा नरेंद्र दाभोलकर, कामरेड गोविन्द पानसरे एवं प्रोफेसर कलबुर्गी मारे गये. यह सिर्फ तीन लोगों का क़त्ल नहीं था, यह देश में तर्क, स्वतंत्र विचार और वैज्ञानिक सोच की हत्या थी, मगर प्रधानमंत्री फिर भी नहीं बोले.

देश भर में दलित उत्पीड़न की वारदातों में बढ़ोतरी हुई, दक्षिण में विल्लपुरम से लेकर राजस्थान के डांगावास तथा हरियाणा के सुनपेड़ तक दलितों का नरसंहार हुआ, दलित नंगे किए गए, महिलाओं को बेइज्जत किया गया, दलित नौजवान मारे गए, मोदी जी को उनके आंसू पूंछने की फुर्सत नहीं मिली. हर जनसंहार पर सत्ता के अहंकारियों ने या तो पर्दा डालने की कोशिश की या उससे अपने को अलग दिखाने की कवायद की. एक केन्द्रीय मंत्री ने तो मारे गए दलित मासूमों की तुलना कुत्तों से कर दी और हंगामा होने पर यहाँ तक कहने में भी कोई संकोच नहीं किया कि जब मैं मीडिया से बात कर रहा था, तब वहां से कुत्ता गुजरा, इसलिये मैंने उसका नाम ले लिया, अगर भैंस निकल आती तो भैंस का नाम ले लेता! यह गाय, भैंस सरकार है या देश की सरकार है?

महिलाओं की अस्मत पर खतरे कम नहीं हुए, बल्कि बढ़े हैं. डायन बता कर हत्या करने, अपहरण, बलात्कार के मामलों में कई प्रदेश भयंकर रूप से कुख्यात हुए. मासूमों से दुष्कर्म और उनकी निर्मम हत्याओं की देशव्यापी बाढ़ आई हुई है, जिनकी जिम्मेदारी है इन्हें रोकने की, वो सत्तासीन लोग उलजलूल बयानबाज़ी करके पीड़ितों के घाव कुरेदते रहे फिर भी हमारे महान देश के पंतप्रधान मौनी बाबा बने रहे. लोग यह कह सकते है कि उनका ज्यादातर समय बाहर के मुल्कों की यात्रा में बीता है, इसलिए वो पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाए. मगर जब घर में आग लगी हो तो कोई घूमने नहीं जाता सिवाय हमारे प्रधानमंत्री जी के.

मोदीजी आप किस तरह के प्रधानमंत्री हैं. क्या वाकई आपको कुछ भी पता नहीं है, या आपको सब कुछ पता है और आप ऐसा होने देना चाहते हैं. आपके देश में साहित्यकार धमकियों के चलते लिखना छोड़ देते हैं, तर्क करने वाले मार दिये जाते हैं. पड़ोसी मुल्क के कलाकार अपने फन की प्रस्तुति नहीं कर सकते हैं. कहीं खेल रोके दिये जाते हैं तो कहीं किसी के चेहरे पर स्याही छिड़की जाती है. प्रतिरोध के स्वरों को विरोधी दल की आवाज कह कर गरियाया जाता है. जाति और धर्म के नाम पर मार काट मची हुई है. वंचितों के अधिकार छीने जा रहे हैं. अल्पसंख्यकों को भयभीत किया जा रहा है. बुद्धिजीवियों को हेय दृष्टि से देखा जा रहा है, मगर आप है कि 'मेक इन इंडिया', 'डिजिटल इंडिया' और 'विकास' का ढोल पीट रहे हैं. जब पूरा मुल्क ही अशांत हो तो वह कैसे विकास करेगा? कैसा विकास और किनका विकास? किनके लिए विकास? सिर्फ नारे, भाषण और नए नए नाम वाली योजनाओं की शोशेबाजी, आखिर इस तरह कैसे यह देश आगे बढ़ेगा. यह देश एक भी रहेगा या बांट दिया जायेगा. कैसा मुल्क चाहते हैं आपके नागपुरी गुरुजन? शुभ दिनों के नाम पर कैसा अशुभ समय ले आए आप? और आपके ये बेलगाम भक्तगण जिस तरह की दादागिरी पर उतर आये हैं वे आपातकाल नामक सरकारी गुंडागर्दी से भी ज्यादा भयानक साबित हो रही है.

बढ़ती हुई असहिष्णुता और बिगड़ते सौहार्द पर देश के साहित्यकार, चित्रकार, फ़िल्मकार, उद्योगपति, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, रिजर्व बैंक के गवर्नर और यहाँ तक कि राष्ट्रपति तक बोल रहे हैं. आप कब बोलेंगे? कब आपकी ये अराजक वानर सेना नियंत्रित होगी? चुप्पी तोड़िए पीएम जी, केवल रेडियो पर मन की बात मत कीजिए, देश के मन की बात भी समझिए और उसके मन से अपने मन की बात को मिला कर बोलिए, ताकि देशवासियों का भरोसा लौट सके. देश के बुद्धिजीवी तबके की आवाज़ों को हवा में मत उड़ाइए. असहमति के स्वरों को कुचलिए मत और अपने अंध भक्तों को समझाइए कि सत्ता का विरोध देशद्रोह नहीं होता है, और ना ही प्रतिरोध करने वालों को पड़ोसी मुल्कों में भेजने की जरूरत होती है. एक देश कई प्रकार की आवाज़ों से मिलकर बनता है. हम सब मिलकर एक देश है, ना कि नाम में राष्ट्रीय लगाने भर से कोई राष्ट्र हो जाता है.

भारत अपनी तमाम बहुलताओं, विविधताओं और बहुरंगी पहचान की वजह से भारत है. इसलिए यह भारत है क्योंकि यहाँ हर जाति, धर्म, पंथ, विचार, वेश, भाषा और भाव के व्यक्ति मिलकर रह सकते हैं. तभी हम गंगा जमुनी तहज़ीब बनाते हैं. सिर्फ गाय का नारा लगाने और गंगा की सफाई की बातें करने और देश विदेश के सैर सपाटे से राष्ट्र नहीं बनता, ना ही आगे बढ़ता है. सबको साथ ले कर चलना है तो भरोसा जीतिएगा. डर पैदा करके सत्ताई दमन के सहारे दम्भी शासन किसी भी मुल्क को ना तो कभी आगे ले गया है और ना ही ले जा पाएगा.  उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर फैलाया जा रहा कट्टरपंथ हमें एक तालिबानी मुल्क तो बना सकता है मगर विकसित राष्ट्र नहीं. यह आप भी जानते है और आपके आका भी, फिर भी अगर आप चुप रहना चाहते हैं तो बेशक रहिये, फिर यह पूरा देश बोलेगा और आप सिर्फ सुनेंगे.
https://youtu.be/HTPcgI6usZk

गर्म हवा,कुछ भी नहीं बदला।नफरतें वहीं,सियासतें वहीं बंटवारे की,अलगाव और दंगा फसाद वहीं,चुनावी हार जीत से कुछ नहीं बदलता।
हमें फिजां यही बदलनी है!
Garm Hawa,the scorching winds of insecurity inflicts Humanity and Nature yet again!
https://www.youtube.com/watch?v=QZTvF_1AN8A


पाकिस्तान बना तो क्या इसकी सजा हम अमन चैन,कायनात को देंगे और कयामत को गले लगायेंगे ?
बिरंची बाबा हारे तो नीतीश लालू के जाति अस्मिता महागबंधन की जीत होगी और मंडल बनाम कमंडल सिविल वार फिर घनघोर होगा और भारत फिर वही महाभारत होगा।फिर वहीं दंगा फसाद।

हमारे लिए चिंता का सबब है कि हमारे सबसे अजीज कलाकार शाहरुख खान को पाकिस्तानी बताया जा रहा है और उनकी हिफाजत का चाकचौबंद इतजाम करना पड़ रहा है।यही असुरक्षा लेकिन गर्म हवा है।सथ्यु की फिल्म गर्म हवा।

पलाश विश्वास

मैं यह सम्मान क्यों लौटा रही हूं: अरुंधति रॉय

कल अरुंधती राय जिनने मैसी साहेब की हिरोइन का रोल भी किया है,जिन्हें बुकर पुरस्कार मिला है,जिनने नियमागिरि पहाड़ को पूजने वाले कौंध आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ आवाज उठायी और सलवा जुड़ुम के खिलाफ जो जंगल जंगल भटकी,जिनने हाल में भारत के कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो बाबासाहेब के जाति उन्मूलन वाले आलेख को नये सिरे से अपनी प्रस्तावन के साथ जारी किया है,अब असहिष्णुता विरोधी देश जोड़ो,दुनियाजोड़ो आंदोलन के मोर्चे पर हैं।

कल अरुंधति ने भी अपना पुरस्कार लौटा दिया।कल 24 फिल्मकारों,कलाकारों ने असहिष्णुता के खिलाफ अपने राष्ट्रीय पुरस्कार लौटा दिये।जिनमें कुंदन शाह और सईद मिर्जा जैसे फिल्मकार भी शामिल हैं।

इससे पहले दिवाकर बंदोपाध्याय और आनंद पटवर्द्धन की अगुवाई में 12 पिल्मकारों ने पुरस्कार लौटाये हैं।फिलहाल भारतीय फिलमों से 36 लोगों ने पुरस्कार लौटा दिये हैं।दूसरी तरफ साहित्य अकादमी के पुरस्कार और पद छोड़ने वाले कम से कम 42 लेखक और कवि हैं।कलाकारों ने भी पुरस्कार लौटाये हैं।

शुरुआत हिंदी के कवि उदय प्रकाश ने की।यह हमार गर्व है।150 देशों का विवेक हमारे साथ है और राष्ट्र का विवेक बोल रहा है।कारवां लगातार लबा होता जा रहा है।किसी की हार जीत से हमारे लिए उम्मीत की बात यही है और बदलाव की पकी हुई जमीन भी यही है।
पलाश विश्वास


मैं यह सम्मान क्यों लौटा रही हूं: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/06/2015 03:09:00 AM

एक पुरस्कार लौटाते हुए अरुंधति रॉय यहां उन सब बातों को याद कर रही हैं जिन पर हमें नाज करना चाहिए और उन सब पर भी, जिनसे हमें शर्म आनी चाहिए और जिसके खिलाफ उठ खड़े होना चाहिए. अनुवाद: रेयाज उल हक.

हालांकि मैं इसमें यकीन नहीं करती कि सम्मान हमारे किए गए कामों का पैमाना हैं, लेकिन मैं लौटाए जा रहे सम्मानों की बढ़ती हुई तादाद में सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए मिले राष्ट्रीय सम्मान (नेशनल अवार्ड फॉर बेस्ट स्क्रीनप्ले) को शामिल करना चाहूंगी, जो मुझे 1989 में मिला था. मैं यह साफ भी करना चाहूंगी कि मैं इसे इसलिए नहीं लौटा रही हूं कि उस सबसे मैं ‘हिल’ गई हूं जिसे मौजूदा सरकार द्वारा फैलाई जा रही ‘बढ़ती हुई असहिष्णुता’ कहा जा रहा है. सबसे पहले, अपने जैसे इंसानों को पीट-पीट कर मारने, गोली मारने, जलाने और सामूहिक कत्लेआम के लिए ‘असहिष्णुता’ एक गलत शब्द है. दूसरे कि हमारे सामने जो आने वाला था, उसके काफी आसार हमारे पास पहले से थे – इसलिए भारी बहुमत से डाले गए उत्साही वोटों के साथ सत्ता में भेजी गई इस सरकार के आने के बाद से जो कुछ हुआ है, उससे मैं हिल जाने का दावा नहीं कर सकती. तीसरे, ये खौफनाक हत्याएं एक कहीं गहरी बीमारी के ऊपर से दिखने वाले आसार भर हैं. जो लोग जिंदा हैं, जिंदगी उनके लिए भी जहन्नुम है. पूरी की पूरी आबादी, दसियों लाख दलित, आदिवासी, मुसलमान और ईसाई खौफ की एक जिंदगी में जीने के लिए मजबूर कर दिए गए हैं और कुछ पता नहीं कि कब और कहां से उन पर हमला हो जाए.

आज हम एक ऐसे मुल्क में रह रहे हैं, जहां नए निजाम के ठग और कारकुन ‘गैरकानूनी हत्याओं’ की बात करते हैं, तो उनका मतलब एक काल्पनिक गाय से होता है जिसको मारा गया है – उनका मतलब एक सचमुच के इंसान की हत्या से नहीं होता. जब वे अपराध की जगह से ‘फोरेंसिक जांच के लिए सबूतों’ की बात करते हैं तो उसका मतलब फ्रिज में रखे गए खाने से होता है, न कि पीट पीट कर मार दिए गए इंसान की लाश से. हम कहते हैं कि हमने ‘तरक्की’ की है, लेकिन जब दलितों का कत्ल होता है और उनके बच्चों को जिंदा जलाया जाता है, तो आज कौन ऐसा लेखक है जो हमले, पीट-पीट कर मारे जाने, गोली या जेल से डरे बिना आजादी से यह कह सकता है कि ‘अछूतों के लिए हिंदू धर्म सचमुच में खौफ की एक भट्टी है’ जैसा बाबासाहेब आंबेडकर ने कभी कहा थाॽ कौन सा लेखक वह सब लिख सकता है, जिसे सआदत हसन मंटो ने ‘चचा साम के नाम’ में लिखा थाॽ यह बात मायने नहीं रखती कि जो कहा जा रहा है उससे हम सहमत हैं कि नहीं. अगर हमें आजादी से बोलने का हक नहीं है, तो हम एक ऐसा समाज बन जाएंगे, जो बौद्धिक कुपोषण का शिकार, बेवकूफों का राष्ट्र होगा. इस पूरे उपमहाद्वीप में नीचे गिरने की होड़ मची हुई है – और यह नया भारत बड़े जोशोखरोश के साथ इसमें शामिल हुआ है. यहां भी अब भीड़ को सेंसरिशप का जिम्मा दे दिया गया है.

मुझे इससे खुशी हो रही है कि मुझे (अपने अतीत में किसी वक्त का) एक राष्ट्रीय सम्मान मिल गया है, जिसे मैं लौटा सकती हूं, क्योंकि यह मुझे इस मुल्क के लेखकों, फिल्मकारों और अकादमिक दुनिया द्वारा शुरू की गई सियासी मुहिम का हिस्सा बनने की इजाजत देता है, जो एक तरह की विचारधारात्मक क्रूरता और सामूहिक समझदारी पर हमले के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं. अगर हम अभी उठ खड़े नहीं हुए तो यह हमें टुकड़े-टुकड़े कर देगा और बेहद गहराई में दफ्न कर देगा. मैं यकीन करती हूं कि कलाकार और बुद्धिजीवी जो अभी कर रहे हैं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ, और उसकी तारीख में कोई मिसाल नहीं मिलती. यह भी सियासत का एक दूसरा तरीका है. इसका हिस्सा बनते हुए मुझे बहुत फख्र हो रहा है. और इतनी शर्म आ रही है उस सब पर जो आज इस मुल्क में हो रहा है.

आखिर में: ताकि सनद रहे कि मैंने 2005 में साहित्य अकादेमी सम्मान को ठुकरा दिया था जब कांग्रेस सत्ता में थी. इसलिए कृपया मुझे कांग्रेस-बनाम-भाजपा की पुरानी घिसी-पिटी बहस से बख्श दीजिए. बात इससे काफी आगे निकल चुकी है. शुक्रिया.


गर्म हवा,कुछ भी नहीं बदला।नफरतें वहीं,सियासतें वहीं बंटवारे की,अलगाव और दंगा फसाद वहीं,चुनावी हार जीत से कुछ नहीं बदलता।
हमें फिजां यही बदलनी है!
Garm Hawa,the scorching winds of insecurity inflicts Humanity and Nature yet again!


पाकिस्तान बना तो क्या इसकी सजा हम अमन चैन,कायनात को देंगे और कयामत को गले लगायेंगे ?
बिरंची बाबा हारे तो नीतीश लालू के जाति अस्मिता महागबंधन की जीत होगी और मंडल बनाम कमंडल सिविल वार फिर घनघोर होगा और भारत फिर वही महाभारत होगा।फिर वहीं दंगा फसाद।

हमारे लिए चिंता का सबब है कि हमारे सबसे अजीज कलाकार शाहरुख खान को पाकिस्तानी बताया जा रहा है और उनकी हिफाजत का चाकचौबंद इतजाम करना पड़ रहा है।यही असुरक्षा लेकिन गर्म हवा है।सथ्यु की फिल्म गर्म हवा।

पलाश विश्वास