Monday, September 19, 2016

2 persons died in the periphery of the Kaziranga National Park while resisting eviction from their land (as updated till 10.00 am on 19th)

2 persons died in the periphery of the Kaziranga National Park while resisting eviction from their land (as updated till 10.00 am on 19th)



Dear All
1.       On 19th morning, the district administration of Nagaon in Assam arrived in Bandardubi area near the Kaziranga National Park to evict several hundreds of peasant families.
2.       In 2015 the Gauhati High Court gave a judgment to evict people from the proposed additions of the Kaziranga National Park. The high court has ordered that due process of law must be completed before eviction would be carried out.
3.       The peasant families were settled by the AGP government in 1980s, and land leases were given to them.
4.       During the election campaign, the BJP led a high pitch campaign to evict these people to save Kaziranga National Park.
5.       In the last few days, the Assam government had begun preparation for eviction. Few of days before, Assam finance minister Shri Himanta Biswa Sarma told the gathering of the  peasant families that they must leave and the government may think of compensation only after eviction. 
6.       The peasant families refused to accept the promise of the government and demanded that compensation be given beforehand.
7. The KMSS had a press conference yesterday and demanded that the government must give compensation first, settle the rights of the farmers first, and not to communalise the question of the livelihood the peasant families.
7.       Early in the morning of 19th more than 1000 personnel from the Assam Police, CRPF elephants, JCB arrived there and started burning the houses. When the peasant families started resisting, the police fired at them leading to the death of 2 women on the spot and leaving more than 10 people severely injured.
8.       As this report is being written, the police have burned down large numbers of houses or the property has been trampled down with the help of elephants.


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Akhil Gogoi
Krishak Mukti Sangram Samiti, Assam
KMSS Office
Dakshya Prasad Bhavan, Gandhi Basti, Guwahati-781003
Cell. 094350-54140



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Akhil Gogoi
President
Krishak Mukti Sangram Samiti, Assam
KMSS Office
Dakshya Prasad Bhavan, Gandhi Basti, Guwahati-781003
Cell. 094350-54140


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Ms. Roma ( Adv)
Dy. Gen Sec, All India Union of Forest Working People(AIUFWP) /
Secretary, New Trade Union Initiative (NTUI)
Coordinator, Human Rights Law Center
c/o Sh. Vinod Kesari, Near Sarita Printing Press,
Tagore Nagar
Robertsganj,
District Sonbhadra 231216
Uttar Pradesh
Tel : 91-9415233583
Email : romasnb@gmail.com
http://jansangarsh.blogspot.com

Sunday, September 18, 2016

एक और कारगिल की तैयारी,लेकिन कश्मीर में हालात बेकाबू! पलाश विश्वास

एक और कारगिल की तैयारी,लेकिन कश्मीर में हालात बेकाबू!
पलाश विश्वास
उरी में भारतीय सैन्य शिविर में हुए हमले के बाद फिर एक और कारगिल की तैयारी है।राजनाथ सिंह फिर लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी के अवतार में हैं और अंध राष्ट्रवाद रामजन्मभूमि आंदोलन के दौर में है।हाट परसुट का विकल्प खुला है और भारत सरकार कश्मीर समस्या सुलझाये बिना पाकिस्तान को सबक सिखाने के बंदोबस्त में लगा है।बलोच राजनय का यह दूसरा पहलू है।
मुश्किल यह है,जैसे कि जेएनयू में पढ़ने आयी, माले की राजनीति कर रही सेहला रशीद का कहना है, कश्मीर के लोगों को भारत का नागरिक माना नहीं जाता और उनमें से जो अलगाववाद के खिलाफ हैं,उन्हें भी अलगाववादी करार दिया जाता है,क्योंकि वे मुसलमान हैं।कश्मीर मसला पेचीदा इसलिए है कि कश्मीर घाटी की आबादी मुसलमान है और भारतीय जनता या भारत सरकार को फर्क नहीं पड़ता कि कौन अलगाववादी है और कौन नहीं है।यह वैमनस्य हालात सुधारने नहीं देता।
सत्ता पर काबिज संघ परिवार के साथ साझा सरकार चला रही महबूबा मुफ्ती की भी अब सर्वोच्च प्राथमिकता सरकार में बने रहने की है।इसलिए नागरिक और मानवाधिकारों की कहीं कोई बात नहीं हो रही है,कुछ गिने चुने बुद्धिजीवी मुंह जबानी चर्चा कर रहे हैं,लेकिन सरकारी सैन्य दमन का सिलसिला जारी है और पूरा कश्मीर आग के हवाले है।उसी आग को भड़काने की अब फिर वही सरहदों के आर पार साझा उपक्रम है और फिर  खामोशी हमारी मजबूरी है।
पाकिस्तान के हुक्मरान जाहिर है कि दूध के धुले नहीं है।आजाद कश्मीर में भी हालात अलग नहीं है और वहां भी नागरिक और मानवाधिकार का उल्लंघन आम जनता पर ढाये जा रहे जुल्मोसितम का रोजनामचा है।फिर वहां फौजी हुकूमत है,जो हर संकट का एकमात्र समाधान भारत पाकिस्तान युद्ध मानता है और भारत पाक संबंधों की कुल मिलाकर ब्यथा कथा यही है।हमारे हुक्मरान भी वही हैं।
इसलिए प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष युद्ध का यह सिलसिला खत्म होने के आसार कतई नहीं हैं।युद्ध का विकल्प अगर भारत सरकार चुनती है तो यह पाकिस्तान के हुक्मरान के फंदे में गला फंसाने की हरकत होगी और हमारे जवानों की शहादतें भी भविष्य में सरहदों के आर पार अमन चैन बहला कर सकेंगी,इसमें शक है।जैसे तीन तीन भारत पाक युद्धों और कारगिल के बाद भी कश्मीर का मसला सुलझा नहीं है,दो चार युद्ध और लड़ भी लें तो हम अंदरुनी हालात पर जबतक काबू नहीं पाते ,सरहदों पर जवानों का खून बहाकर और शायद एक और युद्ध जीतकर भी कुछ हरासिल नहीं कर सकते।
दरअसल युद्ध का विकल्प चुनने से कश्मीर घाटी के हालात सुधरने के आसार एकदम नहीं हैं,यह बात दोनों तरफ के हुक्मरान के समझने की जरुरत है।मुश्किल यह है कि सत्ता पर दखलदारी की गरज से युद्ध दोनों के हितों के माफिक है,तो जाहिर है कि समझकर हबी वे नासमझ बने रहेंगे।जाहिर हैकि फिर कश्मीर में सरहदों के आर पार आजादी की लड़ाई और तेज होनी है और भारत तो फिर भी हालात से निबट सकता है,लेकिन पाकिस्तान के लिए कश्मीर के उसके कब्जाये हिस्से का दखल रख पाना सिरे से असंभव होगा।हमारी कश्मीर में मौजूदगी के खिलाफ भी बगावत रुकेगी नहीं।
दरअसल पाकिस्तानी फौजी हुक्मरान के लिए भी कश्मीर शतरंज की बाजी है,जिससे सियासत और मजहब की आड़ में सत्ता की बागडोर हर हाल में अपने पास रखने की उनकी मजबूरी है।हमारे हुक्मरान के लिए भी कश्मीर अब शतरंज की बाजी है।हमारे तमाम राजनीतिक दलों के लिए भी वैसा ही है,कुछ अलग नहीं है।
अब हमें सोचना है कि अगर हम कश्मीर को भारत का हिस्सा मानते हैं तो हमें कश्मीर घाटी के  जरुरी मसलों, वहां के भारतीय नागरिकों के नागरिक अधिकारों और मानवाधिकारों के बारे में पाकिस्तानी हुक्मरान के नजरिये से,उनके बिछाये जाल में फंसकर फैसला करना है या इसे अपना अंदरुनी मामला मानकर सुलझाने की पहल करनी चाहिेए।सरका्रक्या करती है,इससे ज्यादा जरुरी नागरिक पहल की है जो आजादी के बाद से अबतक व्यापक क्या छिटपुट भी हो नहीं सकी है।कश्मीर घाटी की जो हो सोहो,हमारा अलगावकश्मीर से बेहद आत्मघाती है।
अंदेशा यही है कि भारत और पाकिस्तान के सत्तावर्ग के हितों के मुताबिक युद्धकालीन परिस्थितियां कयामती फिजां बनते जाने से कश्मीर में बांग्लादेश जैसे हालात गहराते जा रहे हैं,जो किसीके हक में नहीं है।लोकतांत्रिक संवाद कमसकम कश्मीर के मामले में असंभव है,इससे कहीं किसी की सुनवाई हो नहीं रही है।सैन्य दमन के बाद फिर विकल्प वही कारगिल है।
ये बेहद खतरनाक हालात हैं।विकासदर की अर्थव्यवस्था के लिए यह सैन्य विकल्प आत्मघाती है तो यह अंध राष्ट्रवाद मिली जुली भारत की आबादी के लिए बेहद विघटनकारी है,जबकि हम मजहबी,जाति पहचान के बूते हर मसले को सुलझाने की बेबुनियाद कोशिश कर रहे हैं।
हम यह भूल रहे हैं कि बांग्लादेश और पाकिस्तान में कुल जितने मुसलमान हैं,उससे कहीं ज्यादा मुसलमान भारत के वफादार नागरिक हैं।युद्ध पाकिस्तान के खिलाफ भले आप लड़ लें,अगर आपकी सियासत और मर्जी यही है,लेकिन भारत के नागरिक करीब एक तिहाई आबादी के मुसलमानों के खिलाफ युद्ध घोषणा का यह अंध राष्ट्रवाद देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे बड़ा संकट है,इसे समझ लें।
सबसे मुश्किल मसला यह है कि भरतीय वामपंथ की कोई दिशा नहीं है।शुरु से इस देश की सरजमीं से कटे सामंती तत्वों ने वामपंथ का अपहरण किया हुआ है और उन तत्वों ने भारतीय जनता को वाम आंदोलन में शामिल करने की कोई कोशिश किये बिना वैचारिक हवा हवाई कवायद में हवा में लाठियां भांजने के सिवाय कुछ किया कभी नहीं है।अंबेडकर के वर्कर्स पार्टी के अवसान के बाद बहुजन मेहनतकशों की पार्टी कोई अभी बनी नहीं है और कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में बहुजन निषिद्ध हैं।
राष्ट्र का चरित्र क्या है,संरचना क्या है,अधिसंरचना क्या है,फासीवाद खिल रहा है या अभी खिलने को है,ऐसे मुद्दों को लकर बहसबाजी में भारतीय वामपंथ का शैशव अभी बीता ही नहीं है।अभ्यंतरीन मामलों में मौकापरस्त विरोध और विदेशी मामलों में केंद्र का अंध समर्थन भारत चीन विवाद के बाद वामपंथी संसदीय सौदेबाज राजनीति है। जनता के मुद्दों के बजाय वे अभी अवधारणाओं और परिकल्पनाओं के शीत ताप नियंत्रित खेल में मशगुल हैं और जनता के बीच वे कहीं भी नहीं है।बंगाल,केरल और त्रिपुरा में भी नहीं।जहां वे सत्ता की राजनीति करते हुए भारतभर में वामपंथ का बेडा़ गर्क करते रहे हैं।
बंगाल में भूमि सुधार,तेभागा और खाद्यांदोलन को छोड़ दें तो पूरे भारत के संदर्भ में भारतीय वामपंथ विकल्प राजनीति  बनाने में सिरे से नाकाम है और उनकी इसी नाकामी की वजह से जो भी है,जैसा भी है ,देश का यह हाल है। क्योंकि शुरु से लेकर अब तक वामपंथियों का राजधर्म भी ब्राह्मणधर्म है और मां राधिका औरकन्हैया कुमार को मंच पर बिठाकर मनुस्मृति के खिलाफ वाम जिहाद वैदिकी रस्म अदायगी के सिवाय कुछ नहीं है।
वाम नेतृत्व में सेहला रशीद,सोनी सोरी, इरोम शर्मिला,जिग्नेश जैसे बहुचन और स्त्री चेहरे कभी न थे और न होंगे।वृंदा और सुभाषिणी तो लोगों के मुंह बंद करने के लिए हैं और वाम रणनीति में उनकी कोई भूमिका नहीं है।
सत्तर के दशक में बांग्लादेश युद्ध और इमरजेंसी,अस्सी के दशक में असम, त्रिपुरा और पंजाब के संकटकाल में और फिर नब्वे के दशक से अबतक के मुक्तबाजारी राजकाज के संदर्भ और प्रसंग में निंदा प्रस्ताव और पोलित ब्यूरो के रस्मी बयानों और पार्टी कांग्रेस के कभी लागू न होने वाले प्रस्तावों के सिवाय कभी कीकत की जमीन पर कोई वाम आंदोलन हुआ ही नहीं है।मजदूर और किसान संगठनों के बावजूद।
फासीवाद के खिलने, न खिलने के विवाद से परे सच यह है कि पूरा महादेश अब कारगिल बनने को है और राष्ट्रवाद और राष्ट्र दोनों दक्षिणपंथियों के हवाले हैं,वामपंथी बेचारों की क्या कहें, गांधीवादी,समाजवादी,अंबेडकरी वगैरह वगैरह विचारधाराओं के झंडेवरदार भी इस तिलिस्म को तोड़ नहीं सकते। सपनों,विचारों और आकांक्षाओं पर भी पहरा है।अभिव्यक्ति पराधीन है।
विडंबना है कि बाहैसियत नागरिक हम राष्ट्र के इस दुस्समय पर उसीतरह खामोस होने को मजबूर हैं,जैसे हमारे बड़बोले कामरेड कश्मीर के मामले में खामोशी अख्तियार करके इंदिराकाल में जिन्हें फासीवादी कहते रहे हैं,बाद में जिनके साथ सत्ता में वे हिस्सेदार रहे, आज उनके दक्षिणपंथी जनसंहारी राष्ट्रवाद के खिलाफ महज निंदा प्रस्ताव तक सीमबद्ध है।अब उनकी विचारधारा का संकट फासीवाद खिलने,न खऱिलने का अहम सवाल है।बाकी जनता के सवालों से उनका कोई लेना देना है नहीं।अपनी अपनी खाल बचाकर मौज मस्ती की सियासत यही है।बाकी जनता तो भेड़ धंसान हैं।

দেখেছেন কখোনো, কিছুই না পাওয়া,বঞ্চিত, নীপিড়িত মানুষের মুখ? স্বামী, সন্তান হারা মায়েদের চোখেরপাতা গুলো?

Hiranmay Sarkar wrote
দেখেছেন কখোনো, কিছুই না পাওয়া,বঞ্চিত, নীপিড়িত মানুষের মুখ? স্বামী, সন্তান হারা মায়েদের চোখেরপাতা গুলো?
এদের ভুল একটাই, ভুলটা সরাসরি করেনি, বংশানুক্রম এ বয়ে নিয়ে যেতে হচ্ছে, হিন্দুর ঘরে জন্ম নেওয়া।
যার কারনে বারবার হতে হচ্ছে অত্যাচারিত, নির্যাতিত, সর্বশেষ এ উদ্বাস্ত।
১৯৯২ সালে বাংলাদেশ থেকে প্রান হাতে নিয়ে,সমস্তকিছু হারিয়ে এদেশে এসেছেন লক্ষ লক্ষ মানুষ। কিন্তুু বাচতে গেলে চাই অন্ন বস্ত্র বাসস্থান। অন্নের জন্য গভীর সমুদ্রে মাছ ধরতে গিয়ে অনেকেই আর ফিরে আসেনা,নির্মম পরিণতি সব সময়েই অপেক্ষা করে থাকে।আর বাসস্থান?? দেখলুম রাস্তার দুধারে তাবুর ছাউনি। ২৪ বৎসর বসবাস করলেও এখনো কোনো সরকারি সাহায্য এদের কপালে জোটেনি।৭০% মানুষ রেশনব্যবস্থার অন্তর্গত হয়নি। ভোটবাস্কে কোনো প্রভাব ফেলতে যাতে না পারে, সেজন্য আধার কার্ড, ভোটার কার্ড ও হয়নি।সমুদ্র থেকে নিখোজ হলেও কোনো সরকারি সাহায্য এদের জন্য বরাদ্দ হয় না। কিছু হলেও এই সমস্ত মানুষের কাছে তা পৌছয় না।
আজ আমাদের দিদি মিনতি গোলদার ও শ্রদ্ধেয় বীরেন বাবুর ঐকান্তিক প্রচেষ্টায়,নারায়ণ বাবুর সহযোগীতায় কুলতলিতে কয়েকশত মানুষের উপস্থিতিতে কিছু স্বজনহারা,দুস্থ মায়েদের হাতে শাড়ী তুলে দিয়ছেন নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্ত সমন্বয় সমিতির নির্ভীক যোদ্ধারা।

ভারতের ভলতেয়ার, যুক্তিবাদী, Self-Respect Movement এর কারিগর Erode Venkata Ramasamy পেরিয়ারের জন্ম দিনে



Saradindu Uddipan
আজ ১৭ই সেপ্টেম্বর। ভারতের ভলতেয়ার, যুক্তিবাদী, Self-Respect Movement এর কারিগর Erode Venkata Ramasamy পেরিয়ারের জন্ম দিনে দলিত-বহুজন স্বাধিকার আন্দোলনের পক্ষ থেকে বিনম্র অভিবাদন জানাই।
পেরিয়ার ১৮৭৯ সালের ১৭ই সেপ্টেম্বর মাদ্রাসের এক সম্ভ্রান্ত পরিবারে জন্ম গ্রহণ করেন। যুবক বয়সেই তিনি মাদ্রাসে জাতপাত এবং লিঙ্গ বৈষম্যের নানা ঘটনা প্রত্যক্ষ করেন। ১৯২৫ সালে তিনি জাতীয় কংগ্রেস ছেড়ে জাস্টিস পার্টি গঠন করেন। তিনি ঘোষণা করেন যে কংগ্রেস পার্টি শুধু ব্রাহ্মণদের সেবা করার জন্য গঠিত হয়েছে। ১৯৪৪ সালে তিনি গঠন করেন ডিএমকে পার্টি।
তিনি জাত ব্যবস্থাকে ধ্বংস করার জন্য যুক্তিবাদী আন্দোলন, আত্তমর্যাদা রক্ষার আন্দোলন এবং লিঙ্গ বৈষম্য দূর করার আন্দোলন শুরু করেন।
রামস্বামী ঘোষণা করেছিলেন "যদি উত্তর ভারতের লোকের রাবন, কুম্ভকর্ণ এবং মেঘনাদকে পোড়ানোর অধিকার থাকে তবে আমাদেরো রাম লক্ষ্মণকে পোড়ানোর আধিকার আছে। যুক্তিবাদী আন্দোলনের অংশ হিসেবে তিনি হিন্দু ধর্মের দেবদেবীর মূর্তি তৈরি করে লরিতে তুলে শোভাযাত্রা করেন। এই মাটির মূর্তিগুলিকে জুতো এবং ঝাঁটা মেরে প্রমান করেন যে এদের মধ্যে কোন শক্তি নেই। ব্রাহ্মণেরা এই মূর্তিগুলিকে সামনে রেখে বৃথা ভয় দেখিয়ে ধর্ম ব্যবসা করে।
UNESCO ইভি রামস্বামীকে "The prophet of the new age", "The Socrates of South East Asia", "Father of social reform movement" হিসেবে স্বীকৃতি দেন।
রামসবামীর বিখ্যাত উক্তিঃ
" Those who believe in god are uncivilized".
তিনি আরো ব্লেন যে, “If god is the root cause for our degradation destroy that god. If it is religion destroy it. If it is Manu Darma, Gita, or any other Mythology (Purana), burn them to ashes. If it is temple, tank, or festival, boycott them. Finally if it is our politics, come forward to declare it openly.”

Pilibhite udbastura nikhilbharater patakatale sangathito hochhe.

Pilibhite udbastura nikhilbharater patakatale sangathito hochhe.

কবি বসন্ত কুমার মণ্ডল রচিত “অ আ ক খয় অচ্ছুত কথা”



শ্রী বসন্ত কুমার মণ্ডল রচিত “অ আ ক খয় অচ্ছুত কথা” বইটি আমার হাতে আসে ছেলেবেলায় । সম্ভবত ১৯৯৪ সাল । আমি তখন ক্লাস সিক্সে পড়ি । সেই থেকে বইটি আমি যত্ন করে রেখে দিয়েছি । বইটি আমার খুবই ভালো লেগেছিল । প্রকাশক “বাংলা দলিত সাহিত্য সংস্থা” । কবি বসন্ত কুমার মণ্ডলকে এই বইটি লেখার জন্য ধন্যবাদ জানাই । আমি এই বইটি থেকে অনেক কিছু শিখেছি । চলুন আজ থেকে আমরা সকলে মিলে কবি বসন্ত কুমার মণ্ডল রচিত “অ আ ক খয় অচ্ছুত কথা” –র মাধ্যমে বাংলা স্বরবর্ণ ও ব্যঞ্জনবর্ণ শিখি । বলো “অ” -

अलविदा आम आदमी पार्टी बल्ली सिंह चीमा ।

अलविदा आम आदमी पार्टी
बल्ली सिंह चीमा ।
(फेसबुक वाल से)
अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ईमानदार सच्चे और अच्छे व्यक्ति होने के बावजूद पार्टी में आंतरिक लोकतन्त्र
को जिन्दा नहीं रख पाये । उत्तराखण्ड में दिल्ली से आये अब्जर्वरों की जियादितियों सह प्रभारी की संविधान विरोधी कार्यशैली और ताना शाही रवैये के खिलाफ उठी कार्यकर्तायों की जायज आवाज़ को भी दिल्ली नेतृत्व ने अनसुना कर दिया परिणाम स्वरूप उत्तराखण्ड में सैकड़ों 
कार्यकर्ता पार्टी छोड़ चुके हैं सैकड़ों पार्टी छोड़ने के बारे में 
सोच रहे हैं। बहुत सारे लोग वेट ए
ंड वाच की स्थिति में घर
पर बैठे हुए हैं।
जिन विचारों व् मूल्यों को लेकर आप बनी थी
उन पर कायम रहते हुए संविधान के अनुसार अपने अंदर लोकतन्त्र को बहाल रखते हुए अगर आप पार्टी काम करती है
तो मैं भविषय में पार्टी का समर्थक बना रहूंगा क्योंकि मेरा मानना है कि बहुत सारी गलतियां करने के बावजूद आप पार्टी आज भी भाजपा और कांग्रेस जैसी से बेहतर है परन्तु जो मानदण्ड आप पार्टी ने स्वंम अपने लिए बनाये या तय किये थे उन पर पार्टी खरी नहीं उतर पा रही है इस लिए मैं आम आदमी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता छोड़ रहा हूँ ।
अनुशासन समिति के अध्यक्ष पद को और प्रदेश कार्यकारिणी की सदस्यता को मैं मई माह में पहले ही छोड़
चूका हूँ ।
इसे कहकर बड़ी तकलीफ झेली है मगर सोचो
मेरे अंदर अगर सच मर गया होता तो क्या होता।