Monday, October 19, 2015

फासीवादी दौर में वरिष्ठ कवि मनमोहन का वक्तव्य


हिंदी के वरिष्ठ कवि मनमोहन का वक्तव्य। उन्होंने हरियाणा साहित्य अकादमी का 2007-08 में मिला महाकवि सूर सम्मान और इसके साथ मिली 1 लाख रुपये की राशि लौटा दी है। हालांकि, यह राशि उन्होंने तभी नवजागरण आंदोलन के काम में लगी एक संस्था हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति को लौटा दी थी।

देश के हालात अच्छे नहीं हैं। जिन्हें अभी नहीं लगता, शायद कुछ दिन बाद सोचें। जिन लोगों ने नागरिक समाज का ख़याल छोड़ा नहीं है और जिनके लिए मानवीय गरिमा और न्याय के प्रश्न बिल्कुल व्यर्थ नहीं हो गए हैं, उन्हें यह समझने में ज्यादा कठिनाई नहीं होगी कि परिस्थिति असामान्य रूप से चिन्ताजनक है।

हममें से अनेक हैं जिन्होंने 1975-76 का आपातकाल देखा और झेला है। साम्प्रदायिक हिंसा और दलित आबादियों पर जघन्य हमलों की कितनी ही वारदातें पिछले 50 वर्षों में हुई हैं। 1984, 1989-1992 और 2002 के हत्याकांड, फ़ासीवादी पूर्वाभ्यास और नृशंसताएं हमारे सामने से गुजरी हैं। ये सरकार और वो सरकार, सब कुछ हमारे अनुभव में है। फिर भी लगता है कुछ नई चीज़ है जो  घटित हो रही है। पहली बार शायद इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि जैसे राज्य, समाज और विचारधारा के समूचे तंत्र के फ़ासिस्ट पुनर्गठन की किसी दूरगामी और विस्तृत परियोजना पर काम शुरू हुआ है। कोई भोला-भाला नादान ही होगा जो आज के दिन इस बात पर यक़ीन कर लेगा कि नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे, एम.एम. कलबुर्गी जैसे बुद्धिजीवियों की हत्याएं या रक्तपिपासु उन्मत्त भीड़ बनाकर की गई दादरी के अख़लाक़ की हत्या में कोई अन्दरुनी रिश्ता नहीं है या ये कानून और व्यवस्था की कोई स्थानीय या स्वतःस्फूर्त घटनाएं हैं। लगता है, ये सब सिलसिला एक उदीयमान फ़ासिस्ट संरचना का अनिवार्य हिस्सा है। 


इसी के तहत साहित्य, कला-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा और शोध की श्रेष्ठ परंपराओं और तमाम छोटे-बड़े संस्थागत ढांचों को छिन्न-भिन्न और विकृत किया जा रहा है और पेशेवराना साख और उत्कृष्टता के मानदंडों को हिक़ारत से परे धकेलकर इन्हें ज़ाहिल और निरंकुश कूपमंडूकों के हवाले किया जा रहा है। और इसी के तहत सार्वजनिक विमर्शों में और लोगों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में साम्प्रदायिक नफ़रत और विद्वेष का जहर घोला जा रहा है, स्त्रियों और दलितों को `सुधारने` के कार्यक्रम चल रहे हैं, इसी के तहत देशभर में अपराधी फ़ासिस्ट गिरोह `धर्म`, `संस्कृति` और `राष्ट्र` के `कस्टोडियन` बनकर घूम रहे हैं। गांवों और कस्बों में अल्पसंख्यकों, स्त्रियों, दलितों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं पर संगठित हमले कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर उन्हें धमका रहे हैं और अपमानित कर रहे हैं।

लगता है, लोगों का खानपान, पहनावा, पढ़ना-लिखना, आना-जाना, सोच-विचार, भाषा, धार्मिक विश्वास, तीज-त्यौहार, यहां तक कि मानवीय सम्बन्ध, जीवन व्यवहार और रचनात्मक अभिव्यक्ति- सब कुछ यही तय करेंगे। यह बहुत साफ है कि ये लंपट तत्व सत्तातंत्र की गोद में खेल रहे हैं। उन्हें नियंत्रित किया जाए, इसके बजाय लगातार संरक्षण मिल रहा है और उनकी हौसला अफजाई की जा रही है।

फ़ासीवाद मानवद्रोह की मुक़म्मल विचारधारा है। हम जानते हैं कि नवजागरणकालीन उदार, मानववादी, विवेकवादी, जनतांत्रिक और आधुनिक मूल्य परम्पराओं के साथ उनकी बद्धमूल शत्रुता है और इन्हें वह गहरी हिक़ारत और नफ़रत से देखती है। अग्रणी बुद्धिजीवियों, लेखकों, फिल्मकारों, संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों और समाजविज्ञानियों को निशाना बनाए बिना उसका काम पूरा नहीं होता। अब यह स्पष्ट है कि बौद्धिक रचनात्मक बिरादरी की नियति उत्पीड़ित आबादियों, स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों इन सभी के साथ एक ही सूत्र में बंधी है। लड़ाई लंबी और कठिन है। पुरस्कार लौटाना प्रतीकात्मक कार्रवाई सही, पर इससे प्रतिरोध की ताकतों का मनोबल बढ़ा है।

यह दुखद और शर्मनाक है कि जाने-माने रचनाकारों और बुद्धिजीवियों के इस देशव्यापी प्रतिवाद के गंभीर अर्थ को समझने के बजाय सत्ताधारी लोग इसका मज़ाक उड़ाने की और इसे टुच्ची दलीय राजनीति में घसीट कर इसकी गरिमा को कम करने की व्यर्थ कोशिशें कर रहे हैं।

अब जरूरत है कि हम और करीब आएं, मौजूदा चुनौतियों को मिलकर समझें और ज्यादा सारभूत बड़े वैचारिक हस्तक्षेप की तैयारी करें। अगर हमने यह न किया तो इसकी भारी क़ीमत इस मुल्क को अदा करनी होगी। 


We,the apolitcal activists of creativity from 150 nations stand United Rock solid to sustain Humanity and nature!
दुनियाभर के लेखकों,कलाकारों,कवियों को मेहनतकश जनता का लाल सलाम।
बहुजन समाज का नील सलाम!

বাংলার সুশীল সমাজ 1857 সালে মহাবিদ্রোহে সুশীল বালক ছিল!
তাঁরা চুয়াড় বিদ্রোহ,সন্যাসী বিদ্রোহ,নীল বিদ্রোহ,সাঁওতাল মুন্ডা ভীল বিদ্রোহের সমর্থনে দাঁড়াননি!তাঁরা চিরকালই শাসক শ্রেণীর অন্তর্ভুক্ত!
আজও তাঁরা নিরুত্তাপ!প্রতিবাদ করবেন কিন্তু সম্মান পুরস্কার ফেরত নৈব নৈব চ!শুধু এই শারদে মন্দাক্রান্তা বাংলার মুখ!ভালোবাসার মুখ!
সারা বিশ্বের শিল্প সাহিত্য সংস্কৃতির দায়বদ্ধতার মুখ!ভালোবাসা!

हमें जनजागरण का इंतजार है।चूंकि जनादेश हिटलर को भी मिला था और कोई जनादेश अंतिम निर्णायक नहीं होता।मनुष्यता हर हाल में जीतती है और फासिज्म हर हाल में हारता है।भारत में भी हारने लगा है फासिज्म क्योंकि मनुष्यता की रीढ़ सीधी है फिर।
Palash Biswas
Thanks Outlook team to stand with us.Outlook focused on Creativity in protest in its current issue!

हमें मूक वधिर जनगण,भेढ़ धंसान में तब्दील लोकतंत्र के पंजाब के अग्निपाखी की तरह जागने का इंतजार है।विश्वभर में मनुष्यता फासीवाद के खिलाफ लामबंद हो रही है कायनात की रहमतें बरकतें नियामतें बहाल रखने के लिए।

हमें जनजागरण का इंतजार है।चूंकि जनादेश हिटलर को भी मिला था और कोई जनादेश अंतिम निर्णायक नहीं होता।
मनुष्यता हर हाल में जीतती है और फासिज्म हर हाल में हारता है।
भारत में भी हारने लगा है फासिज्म क्योंकि मनुष्यता की रीढ़ सीधी है फिर।

हमें अपने दोस्त दुश्मन उदय प्रकाश,हिंदी के कवि की इस पहल पर गर्व है।1976 से जिस राजा का बाजा बजा के कवि मनमोहन को जानता हूं,हमारे आदरणीय काशीनाथ सिंह,हमारे बड़े भाई डूब में तब्दील टिहरी के कवि मंगलेश डबराल,जेएनयू से मित्र प्रोफेसर चमनलाल,मध्यप्रदेश के कवि राजेश जोशी,करानाटक की वह सत्रह साल की लड़की,कोलकाता पुस्तक मेले में 2003 में मिली मंदाक्रांता सेन से लेकर कृष्णा सोबती,मृदुला गर्व सभीने पुरस्कार और सम्मान लौटा दिये हैं।यह अभूतपूर्व है।

नवारुण दा और वीरेन दा होते तो वे भी लौटा देते।
हमें उम्मीद है कि हमारी महाश्वेता दी,गिरिराज किशोर, गिरीश कर्णाड,जावेद अख्तर से लेकर अमिताभ बच्चन और रजनीकांत भी औऱ आखिरकार बंगाल के संस्कृतिकर्मी भी हर हाल में मनुष्यता और प्रकृति के पक्ष में मेहनकशों और बहुजन समाज,छोटे मध्यम कारोबारियों के हक में,भारतीय उद्योग धंधे के हक में फासिज्म के राजकाज के खिलाफ मूक वधिर भारतीय जनता की आवाज बनकर हमारे कारवां में शामिल होंगे।

साझा चूल्हा जो अब भी जल रहा है,जैसा सविता बाबू का कहना है कि साझा चूल्हा सरहदों के आर पार सुलग रहा है,उसे अब घर घर में जलाना है।

उनका मिशन: The Economics of Making in!
उनका मिशन:The institution of the religious partition and the Politics of religion
उनका मिशन: the strategy and strategic marketing of blind nationalism based in religious identity!

मृत मनुष्यता,समाज और सभ्यता की देह में प्राण फूंकना हमारा एजंडा है नरसंहार संस्कृति और नस्ली रंगभेद के इस फासीवाद के खिलाफ,जो भारत में सात सौ साल के इस्लामी शासन और दो सौ साल के अंग्रेजी हुकूमत के बावजूद जीवित सनातन हिंदू धर्म के लोकतंत्र,उसकी आत्मा और उसके मूल्यबोध, नैतिकता, आदर्श और स्थाईभाव विश्वबंधुत्व की हत्या कर रहा है।

संविधान की हत्या कर रहा है।
देश को मृत्यु उपत्यका,गैस चैंबर बना रहा है।

हमारा एजंडा मनुष्यता और कायनात का एजंडा है उनके आर्थिक सुधारों के वधस्थल के विरुद्ध,उनकी मजहबी सियासत के विरुद्ध, उनकी बेइंतहा नफरत के खिलाफ हम मुहब्बत के लड़ाके हैं।

हम खेतों,खलिहानों,कारखानों को आवाज लगा रहे हैं।

हमने हस्तक्षेप को हर बोली हर भाषा में जनसुनवाई का मंच बनाया है।हम फतवों के खिलाफ हैं।

हम नरसंहार संस्कृति और बलात्कारसंस्कृति के खिलाफ देश दुनिया जोड़ने की मुहिम चला रहे हैं।

जिसे घर फूंकना है आपणा इस दुनिया को हमारे बच्चों की खातिर बेहतर बनाने के लिए,वे हमारे कारंवा में शामिल हो।

हस्तक्षेप पर आपके हस्तक्षेप का इंतजार है।
মন্ত্রহীণ,ব্রাত্য,জাতিহারা রবীন্দ্র,রবীন্দ্র সঙ্গীত!



-- 
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

No comments:

Post a Comment