Tuesday, January 26, 2016

Priyankar Paliwal रोहित वेमुला और प्रकाश साव को याद करते हुए !



Priyankar Paliwal
रोहित वेमुला और प्रकाश साव को याद करते हुए !
जब रोहित वेमुला और प्रकाश साव जैसे स्वप्नशील युवा आत्महत्या करते हैं तब एक व्यवस्था की सड़ांध की ओर हमारा ध्यान जाता है . उस गलाज़त की ओर जिसे अब हमने लगभग सहज-स्वाभाविक मान लिया है . वरना, पद सृजित किए जाने और भरे जाने की बन्दरबांट के बारे में अब कौन नहीं जानता . कम से कम हिंदी विभागों में सबको पता है.
रोहित को मैं नहीं जानता था पर प्रकाश से परिचित था; प्रकाश की कविताओं से भी . एक संवेदनशील और गम्भीर युवा कवि-सम्पादक के रूप में उसकी पहचान थी. आर्थिक परेशानियों की आशंका के बावजूद रोहित और प्रकाश की मृत्यु के कारण आर्थिक तो निश्चय ही नहीं हैं. पर कुछ लोग मूल बातों से ध्यान भटकाने के लिए ऐसा प्रचार जोर-शोर से कर रहे हैं.
रोहित वजीफायाफ्ता पीएचडी छात्र था, हालांकि कई महीनों से उसे छात्रवृत्ति का भुगतान नहीं हुआ था. पर वह उसे देर-सवेर मिल ही जानी थी. प्रकाश भी केंद्रीय हिंदी संस्थान में कार्यरत था, भले अस्थायी रूप में. शायद सोलह हज़ार प्रति माह मिलते थे . यह कोई अच्छी स्थिति और अच्छी तनख्वाह नहीं है पर शायद बचे रहने के लिए यह बेरोज़गारी से निस्संदेह बेहतर स्थिति है.
तब ऐसा क्या है जो इन युवाओं को बेचैन करता है ? वही जो इधर हमको-आपको नहीं करता. वही भ्रष्टाचार,वही बंदरबांट,वही जातिवाद,प्रतिभा की वही नाकदरी,स्वाभिमान का वही अपमान,वही चापलूसी और चेला-प्रतिस्थापन, वही अवसरों और पुरस्कारों की छीनाझपटी...... सूची बहुत लम्बी है.
हम सबके आसपास सीमित-प्रतिभा और असीमित शक्ति-सम्पन्न ऐसे अवसरवादी लोग मिल जाएंगे जिनकी कीर्ति-कथा लगभग हरिकथा की तरह अनंत है . उनकी शक्ति के स्रोत भी इतने जाहिर हैं कि किसी शोध की नहीं सिर्फ आंख-कान खुले रखने की ज़रूरत है.
हो सकता है जाति की संकीर्ण हदबंदी के हिसाब से रोहित और प्रकाश दलित की श्रेणी में फिट न बैठें, बावजूद इसके कि कुछ बीफ-फेस्टिवल-फेम दलितवादी खुले गले से ऐसा प्रचारित कर रहे हैं. पर हिंदुस्तान में अब हर वंचित व्यक्ति दलित की श्रेणी में और हर ईमानदार आदमी अल्पसंख्यक की गिनती में आना चाहिए .रोहित और प्रकाश जैसे युवा इसी अर्थ में दलित हैं.
क्या इन शिक्षित,संवेदनशील और स्वप्नशील युवाओं का आत्मघात हमें एक न्यायपूर्ण समाज के गठन के लिए संवेदित करता है ?
या इस श्मशानी वैराग्य के बाद हम सब अपने-अपने कारोबार और अपनी-अपनी दुनियादारी में मगन हो जाएंगे. वही दुनियादारी जिसमें बेचैनी के वे सारे कारण मौजूद हैं जो रोहित और प्रकाश को लील गये . वही दुनियादारी जो भ्रष्टाचार और अन्याय और लेन-देन पर टिकी है.
आइए कुछ आत्ममंथन करें ताकि रोहित और प्रकाश आत्महत्या न करें बल्कि इस व्यवस्था से लड़ने का और इसे बदलने का हौसला पाएं .
Comments
Hitendra Patel आत्म मंथन का कुछ फल मिले भी या यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है ? 'हम क्या कर सकते हैं इसके अलावा 'वाली मुद्रा हम कब तक लिए रहेंगे ? कम से कम खुल कर बोलें और लाभ पाने व्यक्ति के साथ खड़े न हों। कम से कम यह तो हम कर ही सकते हैं। किसी प्रकाश और उस जैसे उपेक्षित के साथ हमारा व्यवहार ही उन्हें सहारा दे सकते हैं। उसके लिए कुछ सोचिए।
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Lavanya Shah There are 2 types of Deaths ! The suicides of promising young man fills our hearts with remorse while the other fills our hearts with a surge of pride !

Last week Snehalata returned to her home in Basa village in Himachal Pradesh's Chamba district after immersing her martyred husband's ashes in the Ganga in Haridwar.

Sepoy Jagdish Chand, 48, died battling terrorists at the Indian Air Force base in Pathankot on January 2. He was in the cookhouse when terrorists launched an attack and killed three of his mates.

Unarmed, the trooper ran after one of the terrorists and wrestled him to the ground. The terrorist was armed with an AK-47, grenades, knives, many rounds of ammunition. Sepoy Jagdish Chand's weapons were his bare hands and enormous courage. He turned the terrorist's own rifle on him and shot him dead. Tragically, he was felled by another terrorist's bullet.
http://www.rediff.com/.../india-needs-to.../20160114.htm
The terrorists were armed with AK-47s, grenades, pistols, knives, many rounds of ammunition. Sepoy…
REDIFF.COM
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Priyankar Paliwal आत्ममंथन हो और समान सोच वालों की एकजुटता हो तब तो फल मिले . फल कोई लटक थोड़े रहा है कि हाथ बढ़ाकर तोड़ लें . बल्कि ऐसा तुरंता फल तो लाभ-पीठ के आचार्यों के पास ही उपलब्ध हो सकता है . हां ! अन्याय के शिकार प्रतिभाशाली लोगों के साथ खड़ा होना और उन्हें अपना समर्थन देना बहुत ज़रूरी है . कम से कम साथ में आओ और कुछ किया हो तो बताओ ताकि 'मुद्राओं' से बचते हुए हम मिलकर आगे की कार्रवाई तय करें .
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Hitendra Patel फल तो फल है वह खाने तोड़ने से अलग जैसा भी हो सकता है। हम 40 पार करने के बाद संतई की मुद्रा में आ जाते हैं और सोचते हैं कि कोई करे और हम सोचें। कल से ही सीधे सीधे संवाद शुरू करिए और फर्क देखिए। दो चार लोग ही तो होते हैं आसपास। 27 से पुस्तक मेले का चक्कर शुरू होगा। यहीं से शुरू हो जाए। मैं इस बार नियमित जाने की सोच रहा हूँ। एक बार फिर जाल फ़ेंक मछेरे ...
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Palash Biswas
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B Gopal Reddy समान सोच वाले सारे लोग, इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का राजनैतिक फायदा कैसे उठाया जाए, इसी प्रपंच में लगे हुए है । इस राजनीति के चक्कर में सामजिक सारोकार पिछली सीट पर जा चुके है । ऐसी स्थिति में वही फल मिलेगा जैसा बीज बोया जा रहा है ।
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