पल प्रतिपल78 में प्रकाशित लगभग सभी कहानियाँ चर्चित रही हैं। शिवेंद्र, राकेश मिश्र, उमाशंकर चौधरी, तरुण भटनागर, आशुतोष और सीमा आज़ाद की कहानियों पर अलग अलग आलोचकों ने विस्तार से लिखा है। वरिष्ठ आलोचक अरुण होता ने सत्यनारायण पटेल की कहानी 'मिन्नी, मछली और सांड ' पर परिकथा के नए अंक में विस्तृत टिप्पणी की है। पल प्रतिपल 79 भी जल्द ही पाठकों तक पहुंचेगा उस अंक में भी महत्वपूर्ण कथाकारों की बेहतरीन कहानियां पढ़ने को मिलेंगी ऐसा हम विश्वास दिलाते हैं।
मिन्नी, मछली और साँड
अरुण होता
अरुण होता
हिन्दी कहानी को एक भिन्न शैली प्रदान करने वाले सत्यनारायण पटेल ने मालवा अँचल को अपनी कथा-भूमि बनाई है। सत्यनारायण के अब तक तीन कहानी-संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। उपन्यास ‘ गाँव भीतर गाँव ’ को पाठकों ने ख़ूब सराहा भी है। जीवन की सच्चाई को अपनी कथा की ज़मीन बनाने वाले सत्यनारायण की तीन कहानियाँ सन 2015 में प्रकाशित हुई हैं। पहल-100 में ‘ न्याव ’ पल प्रतिपल-78 में ‘ मिन्नी, मछली और साँड, और ‘ वागर्थ ’ में एक कहानी। परंतु ‘ मिन्नी, मछली, और साँड ’ की चर्चा ज़रूरी प्रतीत होती है । यूँ तो सत्यनारायण के यहाँ क़िस्सा कहानी को पठनीयता प्रदान करता है, लेकिन उनके क़िस्से सिर्फ़ क़िस्से नहीं होते हैं। इनके बहाने वे सामाजिक यथार्थ की कई परतें भी उद्घाटित करते चलते हैं। लोक-जीवन और लोक-सँस्कृति के प्रति कहानीकार का अथाह प्रेम कथा की दुनिया से उभरकर सामने आता है।
‘मिन्नी, मछली और साँड, शीर्षक कहानी खेल की दुनिया के अंतर्विरोधों और उसके तंत्र को उघाड़ती है। खेल की राजनीति को भी पाठकों के सामने उजागर करती है। आज की दुनिया में क्रिकेट की जनप्रियता असंदिग्ध है। इसकी जन-प्रियता हेतु बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चालाकियों की भूमिका कम नहीं रही हैं तो कुछ विलीन होने के कगार पर हैं। समाज की बदलती मानसिकता भी इसके लिए कम ज़िम्मेदार नहीं है। खेल में पैसा महत्त्वपूर्ण हो गया है, पैसा के लिए खेला जा रहा है। सट्टा बाज़ार खेल का अंग बन रहा है। फुटबॉल और कबड्डी को अभी ज़रूर प्रोमोट करना शुरू हुआ है। लेकिन तैराकी, कुश्ती,गुल्लीडंडा आदि सैकड़ों देसी खेलों का प्रोत्साहन तो क्या नोटिस तक नहीं ली जा रही है। अपने लोक को विस्मृत और विलुप्त होते देखकर संवेदनशील सह्रदय की आत्मा स्वाभाविक रूप में व्यथित होता है । इस व्यथा का परिणाम है- ‘मिन्नी, मछली और साँड ’।
पूरी कहानी पढ़ लेने के बाद ऎसा प्रतीत होता है कि कहानीकार ने किसी सच्ची घटना पर आधारित विषय को अपनाया है। मिन्नी मालिनी और कोच मैथ्यू के माध्यम से तैराक के भीतर समुद्र की मछली को शब्दों के रूप में चित्रित किया है । मिन्नी की माँ आराधना अपनी बेटी का पूरा साथ देती है। वह चाहती है कि मिन्नी को भी तैराकी में राष्ट्रीय स्तर पर पदक हासिल हो। तैराकी में मेहनत तो दम फुला देने वाली, लेकिन पैसा और इज़्ज़त न के बराबर। मिन्नी जैसी तैराक की झोली में कई स्वर्न पदक पड़े होने पर भी पूरा मुहल्ला नहीं जानता उसे। लेकिन टीम इंडिया साधारण क्रिकेट मैच भी जीत जाए तो प्रधानमंत्री बधाई देते हैं । इतना ही नहीं, तैराकी कुंड पर कोच का सख़्त अनुशासन तो घर में माँ का। बच्चे की इच्छा और अनिच्छा का कोई सवाल नहीं रह जाता। ऎसे में स्वाभाविक विकास बाधित होता ही है।
प्रसंगतया इस कहानी में साइकिल चैंपियन और बाद में भारत का कोच रह चुका स्वदेश का बड़ा भाई, स्वदेश आदि के खेल मंत्रालय से परेशान हो खेल छोड़ देने का भी उल्लेख मिलता है ।मंत्रालय की राजनीति से हमारे अपने खेलों का दम घोंटते चले जा रहे है । प्रतिभा का असम्मान और कम प्रतिभा वालों को आगे बढ़ाकर देश का ही नहीं, खेल का भी अपमान किया जा रहा है । पहलवानी में स्वर्ण पदक धारी खिलाड़ी पंचर बना रहा है। मिन्नी भी तैराकी छोड़ कोई छोटी-मोटी नौकरी की तलाश में है। मिन्नी जो मछली बनकर समुद्र में तैरना चाह रही थी, उसके पदक उसे ‘ अनजान अजगर,मगर,घड़ियाल,साँड आदि बनकर मखौल उड़ा रहे हैं, उपहास और अट्टहास कर रहे हैं ।लेकिन मिन्नी, ओलंपिक में क्वालिफाई करने के लिए मेहनत करते वक़्त घायल हो जाती है। उसकी रीढ़ की हड्डी टूट जाती है। आॉपरेशन हुआ। हिदायत दी गई कम्पलीट बेड रेस्ट की। ओलंपिकमें पदक का सपना बस सपना बनकर रह गया। माँ और कोच का सपना भी साकार न हो सका।
इस कहानी की विशेषता यह है कि कहानी एक घनात्मक सोच के साथ पूरी होती है। अपनी बेटी की इस स्थिति में भी आराधना भीतर ही भीतर कसमसाती बुदबुदाती- ‘ बग़ैर लड़े कुछ ठीक नहीं होता। कभी नहीं होता।’ लड़ना ही एकमात्र उपाय। ‘ सपनों के खेत चरते काले साँडों के हर झुँड के ख़िलाफ़। चलो, हम साँडों के झुँड को खदेड़ दें, धरती से बाहर ।’ कहना न होगा कि देसी खेलों के हत्यारे साँड कौन हैं ?
खेल संसार पर आधारित चंद कहानियाँ पाई जाती हैं। इस दृष्टि से इस कहानी का महत्त्व तो है ही, कहानी के चलते यह अधिक प्रभावी हुई है। सत्यनारायण पटेल की इस कहानी में उनका समय और सामाजिक यथार्थ बख़ूबी के साथ व्यंजित हुए हैं ।
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अरुण होता
( साभारः परिकथाः जनवरी-फरवरी 2016 में अरुण होता के विस्तृत लेख का अंश )
‘मिन्नी, मछली और साँड, शीर्षक कहानी खेल की दुनिया के अंतर्विरोधों और उसके तंत्र को उघाड़ती है। खेल की राजनीति को भी पाठकों के सामने उजागर करती है। आज की दुनिया में क्रिकेट की जनप्रियता असंदिग्ध है। इसकी जन-प्रियता हेतु बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चालाकियों की भूमिका कम नहीं रही हैं तो कुछ विलीन होने के कगार पर हैं। समाज की बदलती मानसिकता भी इसके लिए कम ज़िम्मेदार नहीं है। खेल में पैसा महत्त्वपूर्ण हो गया है, पैसा के लिए खेला जा रहा है। सट्टा बाज़ार खेल का अंग बन रहा है। फुटबॉल और कबड्डी को अभी ज़रूर प्रोमोट करना शुरू हुआ है। लेकिन तैराकी, कुश्ती,गुल्लीडंडा आदि सैकड़ों देसी खेलों का प्रोत्साहन तो क्या नोटिस तक नहीं ली जा रही है। अपने लोक को विस्मृत और विलुप्त होते देखकर संवेदनशील सह्रदय की आत्मा स्वाभाविक रूप में व्यथित होता है । इस व्यथा का परिणाम है- ‘मिन्नी, मछली और साँड ’।
पूरी कहानी पढ़ लेने के बाद ऎसा प्रतीत होता है कि कहानीकार ने किसी सच्ची घटना पर आधारित विषय को अपनाया है। मिन्नी मालिनी और कोच मैथ्यू के माध्यम से तैराक के भीतर समुद्र की मछली को शब्दों के रूप में चित्रित किया है । मिन्नी की माँ आराधना अपनी बेटी का पूरा साथ देती है। वह चाहती है कि मिन्नी को भी तैराकी में राष्ट्रीय स्तर पर पदक हासिल हो। तैराकी में मेहनत तो दम फुला देने वाली, लेकिन पैसा और इज़्ज़त न के बराबर। मिन्नी जैसी तैराक की झोली में कई स्वर्न पदक पड़े होने पर भी पूरा मुहल्ला नहीं जानता उसे। लेकिन टीम इंडिया साधारण क्रिकेट मैच भी जीत जाए तो प्रधानमंत्री बधाई देते हैं । इतना ही नहीं, तैराकी कुंड पर कोच का सख़्त अनुशासन तो घर में माँ का। बच्चे की इच्छा और अनिच्छा का कोई सवाल नहीं रह जाता। ऎसे में स्वाभाविक विकास बाधित होता ही है।
प्रसंगतया इस कहानी में साइकिल चैंपियन और बाद में भारत का कोच रह चुका स्वदेश का बड़ा भाई, स्वदेश आदि के खेल मंत्रालय से परेशान हो खेल छोड़ देने का भी उल्लेख मिलता है ।मंत्रालय की राजनीति से हमारे अपने खेलों का दम घोंटते चले जा रहे है । प्रतिभा का असम्मान और कम प्रतिभा वालों को आगे बढ़ाकर देश का ही नहीं, खेल का भी अपमान किया जा रहा है । पहलवानी में स्वर्ण पदक धारी खिलाड़ी पंचर बना रहा है। मिन्नी भी तैराकी छोड़ कोई छोटी-मोटी नौकरी की तलाश में है। मिन्नी जो मछली बनकर समुद्र में तैरना चाह रही थी, उसके पदक उसे ‘ अनजान अजगर,मगर,घड़ियाल,साँड आदि बनकर मखौल उड़ा रहे हैं, उपहास और अट्टहास कर रहे हैं ।लेकिन मिन्नी, ओलंपिक में क्वालिफाई करने के लिए मेहनत करते वक़्त घायल हो जाती है। उसकी रीढ़ की हड्डी टूट जाती है। आॉपरेशन हुआ। हिदायत दी गई कम्पलीट बेड रेस्ट की। ओलंपिकमें पदक का सपना बस सपना बनकर रह गया। माँ और कोच का सपना भी साकार न हो सका।
इस कहानी की विशेषता यह है कि कहानी एक घनात्मक सोच के साथ पूरी होती है। अपनी बेटी की इस स्थिति में भी आराधना भीतर ही भीतर कसमसाती बुदबुदाती- ‘ बग़ैर लड़े कुछ ठीक नहीं होता। कभी नहीं होता।’ लड़ना ही एकमात्र उपाय। ‘ सपनों के खेत चरते काले साँडों के हर झुँड के ख़िलाफ़। चलो, हम साँडों के झुँड को खदेड़ दें, धरती से बाहर ।’ कहना न होगा कि देसी खेलों के हत्यारे साँड कौन हैं ?
खेल संसार पर आधारित चंद कहानियाँ पाई जाती हैं। इस दृष्टि से इस कहानी का महत्त्व तो है ही, कहानी के चलते यह अधिक प्रभावी हुई है। सत्यनारायण पटेल की इस कहानी में उनका समय और सामाजिक यथार्थ बख़ूबी के साथ व्यंजित हुए हैं ।
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अरुण होता
( साभारः परिकथाः जनवरी-फरवरी 2016 में अरुण होता के विस्तृत लेख का अंश )


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