Thursday, August 18, 2016

किसी द्रोणाचार्य ने हमारा अंगूठा नहीं मांगा! पलाश विश्वास

किसी द्रोणाचार्य ने हमारा अंगूठा नहीं मांगा!

पलाश विश्वास

अपने गांव बसंतीपुर में पहले पहल जब मैं बहुत छोटा था,स्कूल से मुझे सख्त नफरत थी।हमारे घर में शिक्षा पर बहुत जोर था।पिताजी महज कक्षा दो तक पढ़े।ताउजी छठीं तक।चाचाजी अपने करिश्मे से डाक्टर बने।तो पिताजी स्वाध्याय से भाषाओं से जूझना सीख गये।

दिनेशपुर में बाकी गांव तो 1952 में ही बस गये। लेकिन बसंतीपुर, पंचाननपुर और उदयनगर के लोग अभी विजयनगर के तंबू शिविर में थे। 1956 में दिनेशपुर में तराई बंगाली उद्वास्तुसमिति की अगुवाई में इन गांवों को बसाने और शरणार्थी इलाकों में पुनर्वास की दूसरी तमाम मांगो को लेकर आंदोलन की शुरुआत हुई।

सुंदरपुर गांव के राधाकांत मंडल अध्यक्ष थे समिति के तो पिताजी महासचिव।दिनेशपुर से तमाम गांवों के लोग जुलूस बनाकर बाल बच्चों बूढ़े और बीमार,महिलाओं के साथ पैदल चलकर  16 किमी दूर रुद्रपुर पहुंचे।धरने पर बैठे।आमरण अनशन हुआ। फिर पुलिस ने उन्हें उठाकर बाजपुर के पास लंबाबाड़ा के जंगल में फेंक दिया।तब हम और हमारे तमाम दिनेशपुरी मित्र जनमे ही न थे।

उस आंदोलन के किस्से बताने के लिए हमारे गांव में कार्तिक साना और दिनेशपुर में सुधारंजन राहा के अलावा शायद बहुत कम ही लोग होंगे।बहरहाल उसी आंदोलन की वजह से दिनेशपुर में अस्पताल ,आईटीआई, स्कूल वगैरह खुले।शरणार्थियों को कृषि कर्ज मिले।जंगल आबाद करने के लिए मशीनों की मदद मिली।फिर 1956 में ही एकमुश्त बस गये बसंतीपुर गांव। पंचाननपुर गांव और उदयनगर गांव।

इसी पंचाननपुर के दीप्ति सुंदर मल्लिक दिनेशपुर स्कूल से लेकर  जीआईसी, डीएसबी तक हमारे साथ थे।वे भी विशुद्ध संगीतज्ञ हैं।

मेरी जन्मतिथि हमारे प्राइमरी स्कूल के गुरुजी पीतांबर पंत ने 1958 लिख दिया।उन्हें आशंका थी कि कहीं बीच में अटक गया तो उम्र के कारण कहीं मेरी पढ़ाई रुक न जाये।तमाम शरणार्थी बंगाल की मतुआभूमि से थे।हरिचांद ठाकुर गुरुचांद ठाकुर और जोगेंद्रनाथ मंडल के अनुयायी।

इसलिए दिनेशपुर इलाके में उन दिनों जनमे बच्चों में से किसी की कोई कुंडली नहीं बनी। फिर पिताजी कम्युनिस्ट थे।ज्योति बाबू के साथ आंदोलन में भी शरीक थे बंगाल में विभाजन के तुरंत बाद।

हम सबके जन्म के बारे में 1956 आधार वर्ष है।

हरिकृष्ण ढाली से लेकर तमाम मित्र आंदोलन के पहले या बाद में जनमे। जैसे हमारे दिवंगत मित्र चरबेटिया शरणार्थी शिविर में जनमे।

एक यह भी मानक जनम का कि कौन चरबेटिया में जनमा तो कौन बंगाल के राणाघाट,काशीपुर या उल्टाडांगा शरणार्थी शिविर में।

हमारे ही गांव के हमसे साल भर बड़े खोकन,रणजीत,विशाखा, दिवंगत कमला दीदी का जन्म विजय नगर तंबू शिविर में हुआ।

1956 में आंदोलन हुआ।आंदोलन के बाद गांव में क्वार्टर बने।उसके बाद लोग बसे।फिर उस गांव में पहला बच्चा मैं जनमा। मेरे बाद टेक्का और उसके बाद हरि।फिर क्रमवार।यही साठ के दशक तक बसंतीपुर के बच्चों की जन्मगाथा है।

हमें बताया गया कि बांग्ला पौष महीने में रविवार को मेरा जन्म हुआ। पौष महीना का मतलब है दिसंबर से जनवरी। जनवरी 1956 में इस हिसाब से मेरा जन्मदिन नहीं हो सकता। दिसंबर 1956 के आखिरी दो रविवार के किसीदिन बसंतीपुर की शरणार्थी दुनिया में मेरा अवतरण हुआ।

मतुआ आंदोलन की वजह से हमारे घर में कम से कम सन 67 तक दो दो शिक्षकों को रखने का रिवाज था।एक पाठ्यक्रम के लिए।दूसरा संगीत के लिए।इसके अलावा हमारे चाचाजी जी भी पहले के शिक्षकों में रहे हैं।जिन्होंने पाठ भूलने के लिए मीरा दीदी को हवा में उछाल दिया और गांव वालों ने उनसे कहा कि आप डाक्टर ही भले, पढ़ाइये मत।लेकिन आखिरी वक्त तक हमारे ताउजी बसंतीपुर के संगीत शिक्षके बने रहे।

उनके अलावा हमारे घर में थे बिजनौर के घासियाला से आये ब्रजेन मास्टार। हमारे साझा परिवार के सभी बच्चे उनसे सुर साधते रहे। लेकिन मैं हमेशा सुर ताल व्याकरण से बाहर रहा।मजे की बात है कि ब्रजेन मास्टर का संगीत न सीखने के बावजूद मैं ही सबसे प्रिय छात्र रहा।

दशकों बाद जब आखिरीबार कुछ साल पहले सविता के साथ मैं उनके गांव वाले घर में गया,उनकी आंखों की रोशनी गायब हो चुकी थी। लेकिन मेरी आहट से ही ही उन्होंने पहचान लिया।आवाज लगायी, पलाश!

बसंतीपुर के अभिभावकों में सबसे बुजुर्ग थे वरदाकांत मंडल और हरि ढाली। चाचाजी के बाद हरि ढाली शिक्षक बने।सारे बच्चों के रिंग मास्टर थे कृष्ण के पिताजी मांदार मंडल।

कैशियर शिशुवर मंडल हिलाब किताब और लिखत पढ़त के जिम्मेवार थे तो सेक्रेटरी अतुल शील गांव की आंतरिक सुरक्षा के जिम्मेदार।

पिताजी को बाहरी मामलों से निपटने के लिए उन्होंने स्वतंत्र कर दिया था।

जात्रा पार्टी की जिम्मेदारी निवारण साना और नरेंद्र मंडल की थी।ज्ञानेंद्र मंडल उनके साथ।

बैठकें बुलान की जिम्मेदारी चैचान मंडल की थी।

मतुआ महोत्सव के सर्वेसर्वा थे ललित गुसाई,जिनके घर पूरे तराई में सबसे बड़ा मतुआ महोत्सव होता रहा है जहां मतुआ माता वीणापानी देवी भी जाती रही हैं।

बसंतीपुर में पूरी की पूरी एक स्वायत्त सरकार थी।तब से लेकर आज तक बसंतीपुर में किसी ने किसी के खिलाफ कोई मामला मुकदमा नहीं किया।

मुझे खुशा है कि इस चरम दुर्योग में वह साझा परिवार अब भी टूटा नहीं है।पुराने सारे अभिभावक एक कार्तिक साना के अलावा और विधूदा के अलावा अब दिवंगत हैं।

भाई पद्म लोचन नियमिततौर परगांव का आंखों देखा हाल मुझे नहीं तो सविता को बताता रहता है।छोटी से छोटी बात।

अब तो बसंतीपुरवाले जैसे हमारे सबसे पहले मित्र टेक्का यानी नित्यानंद मंडल भी फेसबुक पर हैं।

हम हजार मील की दूरी पर भी बसंतीपुर में जीते हैं और हमारी तमन्ना है कि मरें जब तब बसंतीपुर में ही आखिरी सांस ले हम।

अपने दिवंगत घरवालों के साथ ही शामिल हो जाये हमारी मिट्टी।

हमें संतोष है कि हमारे अभिभावकों ने बसंतीपुर की ऐसी बुनियाद रखी कि अब उस गांव में कोई भूखा सोता नहीं है।

कोई अपढ़ नहीं है।

और न कोई बेरोजगार है।

इसकी मूल पटकथा अस्मिताओं और पहचान से मुक्त होने की कथा है।उस गांव में बसने वाले लोग अलग अलग जाति के पूर्वी बंगाल के अलग अलग जिलों के रहने वाले थे।लेकिन बंगाल के शरणार्थी शिविरों से लेकर,चरबेटिया कैंप, विजयनगर,1956 के आंदोलन और 1958 के ढिमरी ब्लाक जनविद्रोह ने उन्हें एक परिवार बना दिया।

इस परिवार की पृष्ठभूमि मतुआ थी।

हरिचांद गुरुचांद मतुआ आंदोलन का प्रस्थानबिंदु भूमि सुधार,संसाधनों का बंटवारा,कर्म संस्कृति, स्त्री अधिकार, जाति उन्मूलन और शिक्षा आंदोलन से बना था।

वह दलित आंदोलन नहीं था आज की तरह ।सत्ता में बागेदारी का  आंदोलन भी न था वह। न था वह पहचान और अस्मिता का
आंदोलन।बल्कि पहचान और अस्मिता को तोड़ने का आंदोलन था वह।समाज को आत्मसात करने का आंदोलन।

वह समाज की मुख्यधारा से खुद को और अपने समाज को जोड़ने के सशक्तीकरण का आंदोलन था।

बसंतीपुर के सारे के सारे लोग विभिन्न जातियों के होने के बावजूद तीन ब्राह्मण परिवारों,एक कायस्थ परिवार और दो चार ओबीसी परिवारों के अलावा दलित ही थे।

वे पुनर्वास से लेकर मताधिकार और जमीन की लड़ाई साथ साथ लड़ते रहे।

उन्होंने खुद को कभी अस्पृश्य नहीं माना और न किसी को उन्होंने अस्पृश्य बनाने की इजाजत दी।

हम जन्मजात शासकों यानी ब्राह्मणों के बराबर थे।

मेरे सारे के सारे शिक्षक,जिन्होंने मेरे जीवन की पटकथा लिख दी,वे ब्राह्मण ही थे। पीतांबर पंत से लेकर ताराचंद्र त्रिपाठी तक।

लेकिन हम उनके लिए कभी कोई एकलव्य न थे।

उन सबने हमारे साथ अर्जुन जैसा ही सलूक किया।

उन सबने हमें चक्रव्यूह तोड़ने की विधि बतायी।

किसी ने हमारा अंगूठा नहीं मांगा।

इसके पीछे बसंतीपुर की करिश्माई पृष्ठभूमि का सबसे बड़ा हाथ है।

बसंतीपुर में कितने शिक्षक आये और गये।सन 1960 के  आसपास की स्मृतियां हमारे पास हैं। तब प्रफुल्ल मास्टर की अगुवाई में बसंतीपुर की बांग्ला पाठशाला चलता था।

प्रफुल्ल मास्टर जात्रा के बेहतरीन कलाकार थे।तब हमारे घर में ।अवनि मास्टर बंगाल से आये थे और ब्रजेन मास्टर संगीत सिखाते थे।स्कूल का टिफिन से पहले का सारा वक्त मुझे स्कूल में पकड़कर ले जाने का युद्ध समय होता था। बिना युद्ध मैंने कभी आत्मसमर्पण किया ही नहीं।

बांधकर वे ले जाते थे स्कूल।स्कूल पहुंचते ही मैं प्रफुल्ल मास्टर के कंधे पर सवार हो जाता था।जब तक छुट्टी न होती थी,उनके कंधे पर ही सवार रहता था।

बसंतीपुर में ऐसे अत्याचार सहने वाले असंख्य मास्टर राधिका, कैलाश,पुलिन मंडल से लेकर अवनि मिस्त्री तक की लंबी श्रृंखला थी।

हमें शांत किया मैडम ख्रिस्टी ने। बसंतीपुर बसते न बसते कुंडु परिवार बंगाल में वापस चला गया।तराई का जंगल उन्हें रास नहीं आया।प्रफुल्ल मास्टर का स्कूल उसी खाली क्वार्टर में लगता था।

वहीं चित्तरंजनपुर कन्या प्राइमरी स्कूल की अध्यापिका मैडम ख्रिस्टी को ठहराया गया।

वे बहुत सुंदर थीं।एकदम वैजयंती माला जैसी।गोरी चिट्टी। जैसे पूरी की पूरी सेब की फसल हो कोई।

हमें उन्होंने अपने बस में कर लिया।चित्तरंजनपुर स्कूल में हम जुलूस बनाकर बीच में बहती पहाड़ी नदी पार करके जाते थे।

जब बरसात में उस नदी में बाढ़ आती थी,तब अर्जुनपुर सिखों के गांव में लगता था स्कूल।रायपुर से लेकर विजयनगर और पंचाननपुर के बच्चे तक वहीं आते थे।सरदार तोता सिंह या सरदार वचन सिंह के घर लगता था स्कूल।

हम बसंतीपुर के बच्चों को और मैडम ख्रिस्टी को गन्नारस की कड़ाही में बैठाकर नदीपार ले जाते थे सिख नौजवान और फिर उसीतरह लौटाते थे।

उनमें से कई आतंकवादी करार दिये गये और पुलिस ने मुठभेड़ में मार दिये।वे गोलियों के जख्म हमेशा के लिए हमारे सीने में दर्ज हो गये।

मैडम ख्रिस्टी का स्थानांतरण जब तक हुआ, हम आधी कक्षा में थे।बसंतीपुर का बांग्ला स्कूल सत्तर के दशक तक अलग चला रहा था।उसे सरकारी मान्यता न थी। वह मन्यता शायद सन 65 या सैसठ में मिली।

अवनि काका हमारे ही परिवार में थे।पिताजी के बहुत जोर देने पर भी वह मीजिल परीक्षा पास करने के बाद आगे पढ़ने कोतैयार नहीं हुए और बसंतीपुर पाठशाला में शिक्षक हो गये।वहीं से उन्होंने ट्रेनिंग लीं।फिर टीचर बन गये परमानेंट।उनके असामयिक निधन के बाद उनका बेटा प्रताप भी टीचर ही बना।

मैडम ख्रिस्टी ने बहलाकर जैसे मुझे स्कूल में डाला,मैं उसे तजिंदगी बाहर निकल ही नहीं पाया।आज भी मुझे नहीं मालूम कि वे हिंदू थीं या ईसाई।हाईस्कूल में वीणा पांडेय जब जीवविज्ञान पढ़ाने आयीं तब उनमें हमने मैडम ख्रिष्टा का नये सिरे से आविस्कार किया।

फिर डीएसबी में की तमाम अध्यापिकाएं जिन्होंने मुझे पढाया या नहीं भी पढ़ाया, मधुलिका दीक्षित, अनिल बिष्ट, नलिनी कुमार जैसी अंग्रेजी की शिक्षिकाएं, समाजशास्त्र में प्रेमा तिवारी,इतिहास की बुजुर्ग शिक्षिका शाकंभरी देवी, गणित की कविता पांडेय, हिंदी की उमा भट्ट में हमने मैडम ख्रिष्टी को फिर फिर देखा।

मैडम ख्रिष्टी जाते जाते हमें हरिदासपुर पाठशाला में छोड़ गयी पीतांबर पंत के हवाले।यह 1961 - 62 का वाकया होगा।देवला दीदी और हमारी सबसे बड़ी दीदी मीरा दीदी की अगुवाई में हम हरिदासपुर पाठशाला दाखिल हो गये।तब से वह गांव हमारा दूसरा घर हो गया।
पांचवी में पढ़ते पढ़ते देवला दी और मीरा दीदी की शादी हो गयी।हम लोग कमला दीदी के सुपुर्द हो गये।उसके बाद पीतांबर पंत ने घर और स्कूल में एक साथ ऐसा मोर्चा जमाया कि हमारे लिए पढ़ने के सिवाय और कोई विकल्प ही नहीं था।

गणित के सवाल हल करने का नशा पंत जी ने लगाया।उनका बड़ा बेटा भुवन तब दसवीं में पढ़ता था। जगदीश हमारे साथ था। उसकी लंबी सी चुटिया थी।उस चुटिया को रस्सी से बांधकर जगदीश को पंत जी लटका दिया करते थे।उसके बाद हम लोगों की हिम्त ही नहीं होती थी कि हम उनके आदेश का उल्लंघन करें।

उन्हींकी लगायी गणित की लत की वजह से बचपन में हमने बहुत मार खायी।

खेत खलिहान में बहुत काम रहता था। चाचाजी डाक्टर थे। पिताजी सामाजिक कार्यकर्ता।सब बिजी थे। ताउजी अकेले तीनों भाइयों की जमीन की खेती बाड़ी संभालते थे।लेकिन वे संगीत के पक्के कलाकार भी थे।हम सबके जिम्मे खेती बाड़ी के तमाम बेहद जरुरी काम थे।गाय भैंसो, बैलों को घास पानी देने का काम,खेतों तक कलेवा पहुंचाने का काम,पौधघर की रखवाली का काम,खलिहान पर पहरेदारी ये सब हमारे जिम्मे थे।जो प्राथमिकता में सबसे ऊपर थे।

लेकिन हम या तो पढ़ने में मगन रहते थे या हिसाब लगाते थे।

चिड़िया अक्सर खेत चुग जाती थी। दादी गाय भैंसों और बैलों पर और तब पाली जाती बकरियों पर खूब ध्यान देती थीं।इसके बावजूद हम चरागाहों में उन्हें छोड़ या भैंस की पीठ पर सवार पुस्तकें बांचते रहते थे। जब तब ढोर डंगर दूसरों के खेत में जाकर लहलहाती फसल में मुंह मार देते थे।

बसंतीपुर में हम बच्चे किसी का कुछ भी नुकसान करने के बाद पार पा जाते थे।लेकिन नदी पार सिखों के खेतों में नुकसान होने पर दोनों गांवों के बीच जंग के हालात हो जाते थे।

तब मांदार बाबू और सरादार तोता सिंह सरदार वचन सिंह मामले का निपटारा करते थे। हम लोगों की मरम्मत जरुर इस फैसले की अहम हिस्सा हुआ करती थी।

दिनेशपुर हाईस्कूल में प्रधानाचार्य कुंदनलाल साह से हमारी शत्रुता और उनके अद्भुत अभिभावकत्व की कथा हमने पहले भी सुनायी हैं। हम अगंरेजी में पीसी रेन के ग्रामर के अभ्यास के दिनों सुरेश चंद्र शर्मा की बेतें आज भी भूल नहीं सकते।

प्रेम प्रकाश बुधलाकोटी और महेश चंद्र वर्मा ने पहली बार बताया और समझाया कि शिक्षक सबसे बड़ा मित्र होता है।

फिर साल भर के लिए शक्तिफार्म स्कूल में अंग्रेजी के हैदर अली,हिंदी के प्रसाद जी और बाकी टीचरों ने हमें अहसास दिलाया कि शिक्षकों की मित्रता दरअसल क्या होती है।

जीआईसी नैनीताल के हमारे शिक्षकों के बारे में ताराचंद्र त्रिपाठी के बारे में हमने बार बार लिखा है।हमारी कुंडली जीआईसी के शिक्षकों ने ही बना दी।जगदीश चंद्र पंत,हरीश चंद्र सती,रमेश चंद्र सती,लोहनी जी,ओलाजी,शिक्षकों की वैसी टीम दुनिया में और कहीं है या नहीं मुझे नहीं मालूम।लेकिन हमारे लिए तो वही इस दुनिया की सर्वश्रेष्ठ फैकल्टी है।

हालांकि हमने कैम्ब्रिज,आक्सफोर्ड और हावर्ड के नाम भी
सुने हैं।लेकिन छात्र मित्र छात्र अभिभावक जीआईसी की सातवें दशक की टीम से बेहतर शिक्षकों की कोई टीम कहीं हो सकती है,मुझे इसका यकीन नहीं आता।

डीएस बी में डा.बटरोही,शेखर पाठक,चंद्रेश शास्त्री,फ्रेडरिक स्मेटचेक जैसे तमाम शिक्षक हमारे लिए बेहतरीन मित्र ही रहे आजीवन।बीए में पढ़ते हुए थोड़ा टकराव अंग्रेजी के कैप्टेन एलएम साह से हुआ जरुर,लेकिन एमए में जाते जाते वे हमारे सबसे अंतरंग शिक्षकों में शामिल होगया।उनसे ज्यादा अनुशासित,उनसे ज्यादा स्मार्ट उनसे ज्यादा हैंडसाम और हर खेल में माहिर दूसरा कोई शिक्षक हमने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जेएनय़ू तक में नहीं देखा।

डा. मैनेजर पांडेय हमारे शिक्षक नहीं रहे कभी। लेकिन साहित्य के पैमाने तय करने में अवधारणाओं को साफ करने में उनसे हुई मुठभेड़ें बहुत काम आयीं।ऐसी मुठभेड़ डा. मानस मुकुल दास के साथ भी हुई।जिसने हमें कविता की समझ दी।

नाट्यविधा में हमारे गुरु हैं नैनीताल के जहूर आलम और कोलकाता में गौतम हालदार। तो दृश्य माध्यम के गुरु हैं परम मित्र दोनों फिल्मकार राजीव कुमार और जोशी जोसेफ।इंटरनेट में गुरु है जनसत्ता कोलकाता के तमाम सहकर्मी,खासकर डा.मांधाता सिंह।

लेकिन हमारे सौंदर्यबोध के एकमात्र शिक्षक रहे हैं हमारे प्रिय अशिक्षक,शायद मित्रमंडली में सबसे ज्यादा अराजक गिरदा ने।
गद्य में हमारे शिक्षक रहे हैं शैलेश मटियानी और शेखर जोशी,जिनके साथ रहकर हमने बहुत कुछ सीखा।

तो वैकल्पिरक मीडिया में हमारे शिक्षक आनंद स्वरुप वर्मा, वीरेन डंगवाल और पंकज बिष्ट हैं।जो हमारे शिक्षक नहीं सहीं मायने में बड़े भाई, परिवार के सदस्य और घनिष्ठ मित्र हैं।

पत्रकारिता में हम प्रभाष जोशी को अपना शिक्षक कतई नहीं मानते।हमारे पहले पत्रकारिता शिक्षक दैनिक पर्वतीय के महेश दाज्यू और परम मित्र पवन राकेश,फिर पर्यावरण वीर शेखर पाठक और नैनीताल समाचार के राजीव लोचन साह रहे। फिर दिनमान के संपादक रघुवीर सहाय।

पेशेवर पत्रकारिता में दैनिक आवाज के दिवंगत बीडीएस शर्मा गुरुजी ही हमारे शिक्षक रहे हैं।जिन्होंने हमें खबर बनानी और संपादकीयलिखना  तक सिखाया।उनके साथ थे बीहार के वरिष्ठतम पत्रकार सतीशचंद्र जी।

हमने अपने इन गुरुओं को.इनके अलावा जिनका उल्लेख नहीं कर पाया,उनमें से किसी को सही मायने में कभी कोई गुरुदक्षिणा नहीं दी।
आज शिक्षक दिवस पर उन सबको प्रणाम।

आज इसलिए कि शायद अब जिंदगी दूसरा मौका ही न दें।सविता की बड़ी इच्छा थी कि हम अपनी प्रकाशित किताबों को अपने शिक्षकों को समर्पित करें।

मेरी दो ही किताबें छपीं।एक पिताजी के संघर्ष के नाम और दूसरा बसंतीपुर वालों को।फिर कोई किताब आयी नहीं और न अब आयेगी।

हमारी अंगूठा न मांगने वाले उनतमाम गुरुओं जो दिवंगत हैं या जीवित,उनकों मेरा सारा जीवन समर्पित है।

अगर इस जीवन का काना कौड़ी मूल्य भी है,तो वे स्वीकार करने की कृरपा करें।

गुरुजी प्रणाम।


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