जिसकी आत्मा मरी नहीं है।
जिसका विवेक सोया नहीं है।
जिसका वजूद मिटा नहीं है।
जो इस मुक्तबाजारी भोग कार्निवाल में महज कबंध नहीं है,उन तमाम लोगों का खुल्ला आवाहन है कि अवतार की तरह अंतरिक्ष युद्ध में भी तमाम वैज्ञानिक पारमाणविक आयुधों और आत्मघाती तकनीकों के खिलाफ मनुष्यता के हक में,कायनात की तमाम नियामतों,बरकतों और रहमतों के लिए,सत्य,अहिंसा,समता और न्याय के इस महायुद्ध में अपना पक्ष चुन लें और खामोशी तोड़ें।
पलाश विश्वास
पिता ने ही यह सिखाया कि चीख से बड़ा कोई हथियार नहीं है और न भाषा और न अस्मिता कोई दीवार है औऱ खामोशी मौत है।
आजादी,हिंदुत्व का एजंडा और लोकतंत्र की शोकगाथाओं की नरसंहारी दंतकथाओं के कारपोरेट मुक्तबाजारी महोत्सव में अचरज है कि इस मुल्क की जमीन के गोबर माटी पानी में इंसानियत का जज्बा अभी खत्म हुआ नहीं है।
हमने खुद को हाशिये पर खड़ा आखिरी आदमी कभी नहीं माना है और न किसी देव देवी ,अवतार,स्वामी या भूदेव या भूदेवी के आगे घुटने टेककर कोई वरदान मांगी है और न हम वैदिकी सभ्यता के कोई देवर्षि,ब्रहमर्षि हैं जो इस दुनिया पर हुकूमत के लिए और मौत के बाद भी अपना ही वर्चस्व कायम करने के लिए तपस्या करता हो और इंद्रासन डोलने पर किसी मनमोहिनी या मेनका कोभेजने की देरी है कि जातियों,कुनबों अौर अस्मिताओं के जलजले में महाभारत हरिकथा अनंत में देश कुरुक्षेत्र बन जाये।
हम जन्मजात उन मिथकों के खिलाफ खड़े हैं,जिसका उत्कर्ष महाविलाप है और जिसका कथासार जन्मजन्मांतर का कर्मफल है और जिसकी परिणति निमित्र मात्र मनुष्य के लिए अमोघ मनुस्मृति है,असहिष्णुता की वैदिकी हिंसा है और शंबुक हत्या नियतिबद्ध है,जिसकी अभिव्यक्ति हजारोंहजार हत्याओं और आत्महत्याओं,युद्धों और गृहयुद्धों का यह अनंत बेदखली विध्वंस है।
पिछवाड़े में शुतुरमुर्ग बने रहने के लिए खेतों, खलिहानों, जंगल,पहाड़ और लसमुंदर,रण और मरुस्थल की सारी सुगंध समेटकर मेरा वजूद बना नहीं है और न स्वर्णगर्भ से समुचित दीक्षा के बुगतान के बाद मैं कोई महायोद्धा हूं।अभिमन्यु भी नहीं हूं।माता के गर्भ से चक्रव्यूह का भेद जाना है तो निःश्स्त्र रथी महारथी के हाथों बिना मतलब मारे जाने के लिए निमित्तमात्र भी नहीं हूं।
मेरे सीने में अबभी इस देश के किसानों और आदिवासियों की आजादी की खुशबू जिंदा है,जो गुलाम कभी नहीं हुए और उनकी अनंत लडाई की जमीन पर खड़ा मेरी खुली युद्धघोषणा है कि सत्तर का दशक फिर जाग रहा है और अबकी दफा हम हरगिज बिखरेंगे नहीं और उस महाश्मशान की राख में जो भारती की आत्मा रची बसी है,उस अग्निपाखी के पंखों पर सवार इस मनुस्मृति के तमाम दुर्गों पर हम निर्णायक वार करेंगे।
जिसकी आत्मा मरी नहीं है।
जिसका विवेक सोया नहीं है।
जिसका वजूद मिटा नहीं है।
जो इस मुक्तबाजारी भोग कार्निवाल में महज कबंध नहीं है,उन तमाम लोगों का खुल्ला आवाहन है कि अवतार की तरह अंतरिक्ष युद्ध में भी तमाम वैज्ञानिक पारमाणविक आयुधों और आत्मघाती तकनीकों के खिलाफ मनुष्यता के हक में,कायनात की तमाम नियामतों,बरकतों और रहमतों के लिए,सत्य,अहिंसा,समता और न्याय के इस महायुद्ध में अपना पक्ष चुन लें और खामोशी तोड़ें।
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नरेंद्र मोदी जी,
देश के शीर्ष अस्पताल और मेडिकल कॉलेज AIIMS के कई प्रोफेसर आज डॉ. कुलदीप कुमार के समर्थन में धरने पर बैठ गए. एम्स के इतिहास में पहली बार किसी प्रोफेसर को निकाला जा रहा है इसलिए एम्स प्रोफेसर एसोसिएशन पहली बार धरने पर है.
उन्हें उम्मीद है कि आप सुनवाई करेंगे. इसलिए उन्होंने समर्थन करने वालों को फिलहाल धरने पर बैठने या प्रदर्शन करने से मना किया है.
यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है कि AIIMS के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर कुलदीप कुमार स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा के खिलाफ धरने पर बैठ गए. एआरटी क्लिनिक के चीफ के नाते डॉक्टर कुलदीप को जब मरणासन्न एचआईवी मरीजों की देखभाल करनी चाहिए, तब उन्हें धरने पर बैठने को किसने मजबूर किया.
मोदी जी, आपके निवास से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित देश के शीर्ष मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के इतिहास में पहली बार कोई टीचर धरने पर बैठा है.
एम्स के तमाम प्रोफेसरों की संस्था ने डॉ. कुलदीप कुमार के उत्पीड़न की निंदा की है. नड्डा और मिश्रा से एक बार पूछिए तो कि कुलदीप कुमार को हटाने में उनकी व्यक्तिगत दिलचस्पी क्यों है. उन्होंने चिट्ठी में कोई आरोप तक नहीं लगाया है. इसलिए भी जानना जरूरी है कि हटा क्यों रहे हैं.



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