आजकल हिंदी आलोचना के सामने एक चुनौती है साहित्य में व्यापक पाठक समुदाय की गहरी दिलचस्पी पैदा करना और उसे बनाए रखना। यह आलोचना का एक सांस्कृतिक और सामाजिक दायित्व भी है। प्रायः अभिजनवादी दृष्टि वाले आलोचक साहित्यिक रचना की ऐसी व्याख्या करते हैं कि वह रहस्यमय वस्तु बन जाती है। तब साहित्यिकता की पहचान मुट्ठी भर विशिष्ट रसिकों के लिए सुरक्षित हो जाती है। ऐसी स्थिति में अगर साधारण पाठक उस रहस्यमय साहित्यिकता से आतंकित होकर साहित्य से दूर ही रहें तो क्या आश्चर्य। साहित्य का समाजशास्त्र इस बनावटी रहस्यमयता का पर्दाफाश करके साहित्य के सामाजिक रूप और अर्थ को उजागर करता है जिससे साधारण पाठक उसकी ओर आकर्षित होता है। साहित्य का समाजशास्त्र व्यापक सामाजिक प्रक्रिया के भीतर क्रियाशील संपूर्ण साहित्य प्रक्रिया की विभिन्न गतियों और परिणतियों की व्याख्या करते हुए साहित्य के वास्तविक सामाजिक स्वरूप की पहचान कराता है और उसमें साधारण पाठकों की दिलचस्पी जगाता है। इस तरह वह रचना और आलोचना दोनों की सामाजिक सार्थकता बढ़ाता है। आलोचना जब रचना की सामाजिकता की पहचान के बदले आलोचक के वाग्विलास और बौद्धिक व्यायाम का साधन बन जाती है तब वह अपनी सामाजिक सार्थकता खो देती है। आजकल हिंदी में ऐसी आलोचना खूब चल रही है। इस स्थिति में साहित्य का समाजशास्त्र आलोचना की सामाजिक सार्थकता की रक्षा का एक माध्यम बन सकता है।
साहित्य के समाजशास्त्र की दो मुख्य धाराएँ हैं: मीमांसापरक ओर अनुभववादी। एक में साहित्य के सामाजिक महत्व का अर्थ का विश्लेषण होता है और दूसरी धारा में साहित्य के सामाजिक अस्तित्व का। पहली धारा साहित्य में समाज की अभिव्यक्ति की खोज करती है और दूसरी समाज में साहित्य की वास्तविक स्थिति की पहचान। पहली को प्रायः साहित्यिक समाजशास्त्र या समाजशास्त्रीय आलोचना कहा जाता है और दूसरी को साहित्य का समाजशास्त्र। इस पुस्तक में दोनों धाराओं की विभिन्न दृष्टियों और पद्धतियों का विवेचन है।
साहित्य के समाजशास्त्र की दो मुख्य धाराएँ हैं: मीमांसापरक ओर अनुभववादी। एक में साहित्य के सामाजिक महत्व का अर्थ का विश्लेषण होता है और दूसरी धारा में साहित्य के सामाजिक अस्तित्व का। पहली धारा साहित्य में समाज की अभिव्यक्ति की खोज करती है और दूसरी समाज में साहित्य की वास्तविक स्थिति की पहचान। पहली को प्रायः साहित्यिक समाजशास्त्र या समाजशास्त्रीय आलोचना कहा जाता है और दूसरी को साहित्य का समाजशास्त्र। इस पुस्तक में दोनों धाराओं की विभिन्न दृष्टियों और पद्धतियों का विवेचन है।

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