Wednesday, February 3, 2016

तानाशाह (उदयप्रकाश) वह अभी तक सोचता है कि तानाशाह बिल्‍कुल वैसा ही या फिर उससे मिलता-जुलता ही होगा यानी मूंछ तितलीकट, नाक के नीचे बिल्‍ले-तमगे और भीड़ को सम्‍मोहित करने की वाकपटुता जबकि अब होगा यह कि वह पहले जैसा तो होगा नहीं अगर उसने दुबारा पुरानी शक्‍ल और पुराने कपड़े में आने की कोशिश की तो वह मसखरा ही साबित होगा भरी हो उसके दिल में कितनी ही घृणा दिमाग में कितने ही खतरनाक इरादे कोई भी तानाशाह ऐसा तो होता नहीं कि वह तुरन्‍त पहचान लिया जाये कि लोग फजीहत कर डालें उसकी चिढ़ाएं, छुछुआएं यहां तक कि मौके-बेमौके बच्‍चे तक पीट डालें अब तो वह आयेगा तो उसे पहचानना भी मुश्किल होगा

उदयप्रकाश ने एक कविता लिखी थी जिसमें वो बताते हैं कि अगर हिटलर अब भी वैसी ही तितलीकट मूंछें रखकर आयेगा तो बच्‍चे भी उसे दौड़ा लेंगे। क्‍या अपने बात बहादुर फेकुचन्‍द पर गमले फेंकती महिलाओं व काले झण्‍डे दिखाते नौजवानों को देखकर ये कविता साकार होती नजर नहीं आ रही है।
तानाशाह (उदयप्रकाश)
वह अभी तक सोचता है
कि तानाशाह बिल्‍कुल वैसा ही या
फिर उससे मिलता-जुलता ही होगा
यानी मूंछ तितलीकट, नाक के नीचे
बिल्‍ले-तमगे और
भीड़ को सम्‍मोहित करने की वाकपटुता
जबकि अब होगा यह
कि वह पहले जैसा तो होगा नहीं
अगर उसने दुबारा पुरानी शक्‍ल और पुराने कपड़े में
आने की कोशिश की तो
वह मसखरा ही साबित होगा
भरी हो उसके दिल में कितनी ही घृणा
दिमाग में कितने ही खतरनाक इरादे
कोई भी तानाशाह ऐसा तो होता नहीं
कि वह तुरन्‍त पहचान लिया जाये
कि लोग फजीहत कर डालें उसकी
चिढ़ाएं, छुछुआएं
यहां तक कि मौके-बेमौके बच्‍चे तक पीट डालें
अब तो वह आयेगा तो उसे पहचानना भी मुश्किल होगा

No comments:

Post a Comment