Friday, February 5, 2016

सच, आखिर हम कब तक तमाशबीन बने देखते रहेंगे, कहीं मैं न फँस जाऊँ? मुझे क्या? इन तर्कों से अपनी रक्षा करते रहेंगे। हम क्यूँ भूल जाते हैं कि कभी तमाशा हम भी हो सकते है, कभी बारी हमारी भी आ सकती है। हम सबको थोड़ा-थोड़ा ही सही फायजा और सावित्री जैसा बनना ही होगा।

Nitesh Pokar to Mini Parliament
तमाशा
अपोलो हॉस्पिटल, सिकंदराबाद के डॉक्टर्स अंतरागिरी से पिकनिक मना कर लौट रहे थे कि अचानक ड्राइवर ने गाड़ी रोकी। भीड़ जमा थी, वो नीचे उतरा और वापस आकर कहने लगा, आगे एक्सीडेंट हुआ है, एक आदमी की मौत हो गयी है, रास्ता खुलने में टाइम लगेगा। ये जगह कोई दोराहा था, शायद इसी वजह से एक्सीडेंट हुआ होगा। किसी ने खिड़की से देखकर कहा, नीचे रेस्टॉरेन्ट दिखता है, चलो वहीं चलकर बैठते हैं। सब उसी तरफ जाने लगे लेकिन प्रशिक्षु (इंटर्न) डॉ. फायजा और डॉ. सावित्री को लगा, वे डॉक्टर हैं, एक्सीडेंट हुआ है, कम से कम वे वहाँ जाकर देखें तो सही माजरा क्या है? भीड़ तो फोटो और वीडियो बनाने में जुटी थी, कोई उन्हें आगे आने ही नहीं दे रहा था जैसे तमाशा लगा हो। जब उन्होंने बताया कि वे डॉक्टर है और मुआयना करना चाहती हैं तब कहीं जाकर बात बनी।
उन्होंने देखा उस व्यक्ति के आँखों की पुतलियों में में हल्की सी पर हरकत थी यानि जिसे सब मृत मान चुके थे उसमें अभी साँसे थी। दूसरे ही क्षण वे अपने को असहाय महसूस करने लगी, कुछ भी तो नहीं था उनके पास और घायल के पास समय नहीं था। कुछ भी हो कोशिश करने की ठानी, डॉ. फायजा उसके सीने को पम्प करने लगी। डॉ. सावित्री ने देखा, उसकी जीभ बेजान होने लगी है। ऐसे में जीभ ही गले में फँस व्यक्ति का दम घोंट देती है। उसके पास पेन था, जीभ पर पेन रख उसे दबाए रखा और साथ ही लोगों से अखबार लाने को कहा। अखबार से पाइप बनाया और उसे मुँह से ऑक्सीजन देने लगी। फायजा अपना काम कर ही रही थी। पच्चीस मिनट तक वे ऐसा करती रहीं, हार उन्होंने मानी नहीं इसलिए वे जीत गयीं, उसकी साँसे लौट आयीं थी।
सच, आखिर हम कब तक तमाशबीन बने देखते रहेंगे, कहीं मैं न फँस जाऊँ? मुझे क्या? इन तर्कों से अपनी रक्षा करते रहेंगे। हम क्यूँ भूल जाते हैं कि कभी तमाशा हम भी हो सकते है, कभी बारी हमारी भी आ सकती है। हम सबको थोड़ा-थोड़ा ही सही फायजा और सावित्री जैसा बनना ही होगा
गुलामी की जंजीरें तोड़नी है तो जो जहां हों,चीखो!
इतना चीखों कि उनकी मिसाइलें दम तोड़ दें!
इतना चीखो कि मनुस्मृति तिलिस्म ढह जाये!
क्योंकि चीख से बड़ा कोई हथियार नहीं है और न भाषा और न अस्मिता कोई दीवार है औऱ खामोशी मौत है।
पलाश विश्वास
मेरी पूरी जिंदगी जड़ों को समर्पित,अपने स्वजनों के लिए,दुनियाभर के मेहनत आवाम,काले अछूत पिछड़े और शरणार्थियों के लिए,जल जंगल जमीन नागरिकता और इंसानियत के हक हकूक के लिए,मुहब्बत और अमनचैन के लिए मेरे दिवंगत पिता के जुनूनी प्रतिबद्धता की विरासत के मुताबिक खुद को इसके काबिल बनाने में बीता है क्योंकि खुद बेहद बौना हूं।

मेरे पिता विभाजनपीड़ित हिंदू शरणार्थी थे और धू धू दंगाई आग में जलते मेरठ के अस्पताल में सैन्य पहरे में कैद दंगों में मारे जा रहे मुसलमानों और नई दिल्ली में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सफदरगंज अस्पताल के पिछवाड़े नारायण दत्त तिवारी के घसीटकर सुरक्षित ठिकाने ले जाने के दौरान जो खून की नदियां उनके दिलोदिमाग से निकलती रही हैं,उसी का वारिस हूं मैं।

मैंने अपने पिता से सीखा है कि जब दसों दिशाओं में कयामत कहर बरपाती है तो अपनों को बचाने का सबसे कारगर तरीका यह है कि दसों दिशाओं के मुखातिब खड़े दम लगाकर चीखो।

पिता ने ही यह सिखाया कि चीख से बड़ा कोई हथियार नहीं है और न भाषा और न अस्मिता कोई दीवार है औऱ खामोशी मौत है।

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