गुलामी की जंजीरें तोड़नी है तो जो जहां हों,चीखो!
इतना चीखों कि उनकी मिसाइलें दम तोड़ दें!
इतना चीखो कि मनुस्मृति तिलिस्म ढह जाये!
क्योंकि चीख से बड़ा कोई हथियार नहीं है और न भाषा और न अस्मिता कोई दीवार है औऱ खामोशी मौत है।
पलाश विश्वास
मेरी पूरी जिंदगी जड़ों को समर्पित,अपने स्वजनों के लिए,दुनियाभर के मेहनत आवाम,काले अछूत पिछड़े और शरणार्थियों के लिए,जल जंगल जमीन नागरिकता और इंसानियत के हक हकूक के लिए,मुहब्बत और अमनचैन के लिए मेरे दिवंगत पिता के जुनूनी प्रतिबद्धता की विरासत के मुताबिक खुद को इसके काबिल बनाने में बीता है क्योंकि खुद बेहद बौना हूं।
मेरे पिता विभाजनपीड़ित हिंदू शरणार्थी थे और धू धू दंगाई आग में जलते मेरठ के अस्पताल में सैन्य पहरे में कैद दंगों में मारे जा रहे मुसलमानों और नई दिल्ली में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सफदरगंज अस्पताल के पिछवाड़े नारायण दत्त तिवारी के घसीटकर सुरक्षित ठिकाने ले जाने के दौरान जो खून की नदियां उनके दिलोदिमाग से निकलती रही हैं,उसी का वारिस हूं मैं।
मैंने अपने पिता से सीखा है कि जब दसों दिशाओं में कयामत कहर बरपाती है तो अपनों को बचाने का सबसे कारगर तरीका यह है कि दसों दिशाओं के मुखातिब खड़े दम लगाकर चीखो।
पिता ने ही यह सिखाया कि चीख से बड़ा कोई हथियार नहीं है और न भाषा और न अस्मिता कोई दीवार है औऱ खामोशी मौत है।
मनुस्मृति ईरानी को आज दिल्ली यूनिवर्सिटी में विश्व उर्दू कॉन्फ्रेंस के सरकारी आयोजन का उद्धाटन करना था. Z कैटेगरी सुरक्षा प्राप्त होने के बावजूद वे नहीं आई. डर था कि स्टूडेंट्स विरोध करेंगे.
मनमोहन सिंह से सीखना चाहिए, जिन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए 15 मिनट तक मुर्दाबाद के नारों के बीच JNU में अपना भाषण दिया, स्टूडेंट्स से मेमोरेंडम लिया और फिर गए. नरेंद्र मोदी से नहीं, जिनके भाषण में मुर्दाबाद लगते ही सुरक्षाकर्मी स्टूडेंट्स को खींचकर ले गए.
स्मृति जी, ऐसा भागना - छिपना कब तक चलेगा? वह भी दिल्ली यूनिवर्सिटी में, जहां RSS के बगलबच्चा संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का स्टूडेंट्स यूनियन पर कब्जा है.


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