Tuesday, February 9, 2016

वह बदलती हुई दिल्ली की आसान गुलाबी कहानियां नहीं लिखता। वह बस्तर के जंगलों में दमन से नीली पड़ी पीठ और टभकते हुए ज़ख़्मों की दास्तान लिखता है। वह राज्य की ख़ौफ़नाक हिंसक मशीनरी और नक्सली समूहों की आत्मघाती कार्रवाइयों के बीच घिरे गांववालों की सिहरा देने वाली लाचारी पर अपनी उंगली रखता है। यह हृदयेश जोशी की फितरत है। पत्रकारिता के लिए मुश्किल होते समय में वह एक मुश्किल पत्रकार है जो दूसरों को भी चुनौती देता है और अपना भी इम्तिहान लेता रहता है। 'लाल लकीर' ऐसे ही इम्तिहान का नाम है। जब पत्रकार छोटी छोटी रिपोर्ट्स के लिए पिट रहे हैं, जब सरकारों के ग्रीन हंट के दायरे में मासूम गांववाले और दुस्साहसी पत्रकार भी आ रहे हैं, तब उसने एक ऐसी किताब लिख डाली है, जो सरकार को भी आईना दिखाती है और नक्सलियों को भी। बुधवार को इस उपन्यास का लोकार्पण है। हृदयेश जोशी को बधाई। और अपनी अनु (सिंह चौधरी ) को भी, जो सुलझी हुई संपादक के तौर अपना लोहा मनवाती है।


वह बदलती हुई दिल्ली की आसान गुलाबी कहानियां नहीं लिखता। वह बस्तर के जंगलों में दमन से नीली पड़ी पीठ और टभकते हुए ज़ख़्मों की दास्तान लिखता है। वह राज्य की ख़ौफ़नाक हिंसक मशीनरी और नक्सली समूहों की आत्मघाती कार्रवाइयों के बीच घिरे गांववालों की सिहरा देने वाली लाचारी पर अपनी उंगली रखता है।
यह हृदयेश जोशी की फितरत है। पत्रकारिता के लिए मुश्किल होते समय में वह एक मुश्किल पत्रकार है जो दूसरों को भी चुनौती देता है और अपना भी इम्तिहान लेता रहता है। 'लाल लकीर' ऐसे ही इम्तिहान का नाम है। जब पत्रकार छोटी छोटी रिपोर्ट्स के लिए पिट रहे हैं, जब सरकारों के ग्रीन हंट के दायरे में मासूम गांववाले और दुस्साहसी पत्रकार भी आ रहे हैं, तब उसने एक ऐसी किताब लिख डाली है, जो सरकार को भी आईना दिखाती है और नक्सलियों को भी। बुधवार को इस उपन्यास का लोकार्पण है। हृदयेश जोशी को बधाई। और अपनी अनु (सिंह चौधरी ) को भी, जो सुलझी हुई संपादक के तौर अपना लोहा मनवाती है।

No comments:

Post a Comment