Saturday, April 30, 2016

पल प्रतिपल : समकालीन रचनाशीलता की त्रैमासिकी / 79



पल प्रतिपल : समकालीन रचनाशीलता की त्रैमासिकी / 79
अंतत:पल प्रतिपल का 79वां अंक प्रेस में। एक दायित्त्व जिसका बोध विश्व पुस्तक मेला से लेकर अब तक मेरे लिए एक नैतिक संताप का कारण बना हुआ था उससे अंशत: उबर पाने की स्थिति में हूँ। सपना तो यही देखा था कि यह अंक विश्व पुस्तक मेला पर आता। अनेक कारणों से ऐसा नहीं हो सका। फिर वित्तीय वर्ष के अंत के दबाव ने घेर लिया। परन्तु इसे मेरा आप स्पष्टीकरण मत समझें कई बार ऐसा होता है कि कुछ चीज़ें थोड़ा देर से आने पर थोड़ी और पक जाती हैं। जब यह अंक बहुत जल्द आपके हाथ में होगा इसे आप स्वयं महसूस कर पाएंगे। पिछले अंक की तरह यह अंक भी 'कथा का समकाल' पर एकाग्र है. अनेक बेहतरीन रचनाओं के साथ जो संभवतया देर तक याद रखी जाएँगी।
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