Tuesday, March 8, 2016

''मंच'' हम मंच पर गए ही नहीं और हमें बुलाया भी नहीं उंगली के इशारे से हमें अपनी जगह दिखाई गई हम वहीं बैठ गए; हमें शाबाशी मिली और 'वे' मंच पर खड़े होकर हमारा दुख हमसे ही कहते रहे। 'हमारा दुख हमारा ही रहा कभी उनका हो नहीं पाया....' हमने अपनी शंका फुसफुसायी वे कान खड़े कर सुनते रहे फिर ठंडी साँस भरी और हमारे ही कान पकड़ हमें ही डांटा माफ़ी माँगो; वर्ना...! - वाहरू सोनवणे (प्रसिद्ध आदिवासी कवि)

''मंच''
हम मंच पर गए ही नहीं
और हमें बुलाया भी नहीं
उंगली के इशारे से
हमें अपनी जगह दिखाई गई 
हम वहीं बैठ गए;
हमें शाबाशी मिली
और 'वे' मंच पर खड़े होकर
हमारा दुख हमसे ही कहते रहे।
'हमारा दुख हमारा ही रहा
कभी उनका हो नहीं पाया....'
हमने अपनी शंका फुसफुसायी
वे कान खड़े कर सुनते रहे
फिर ठंडी साँस भरी
और हमारे ही कान पकड़
हमें ही डांटा
माफ़ी माँगो; वर्ना...!
- वाहरू सोनवणे
(प्रसिद्ध आदिवासी कवि)

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