Dilip Khan
दसवीं क्लास में पढ़ने वाला एक लड़का सुबह स्कूल को निकला। भाई को सुरक्षा बलों ने पीटकर सड़क पर छोड़ रखा था। देखकर लड़का भाग गया और बंदूक उठा ली। हिज़्बुल का कमांडर बन गया। पिछले साल, पहले भाई मारा गया, अब वो यानी हिज़्बुल का कमांडर बुरहान वानी। बुरहान के जनाज़े में हज़ारों लोग आए। सरकार ने मोबाइल, इंटरनेट, ट्रेन सबकुछ ठप कर दिया। कर्फ्यू लगा दी। लेकिन हिंसा जारी रही। कश्मीरी भी मारे जा रहे हैं और सुरक्षा बल भी।
पिछले डेढ़-दो दशकों में कश्मीर में मिलिटेंसी का सबसे उग्र दौर चल रहा है। और सबसे ख़तरनाक भी। इस बार बंदूक स्थानीय लोगों ने उठाया है, पाकिस्तानियों ने नहीं। बंदूक के सहारे कश्मीर को एक करने की कोशिश का जवाब बंदूक से दिया जा रहा है। कश्मीर के लोगों की बात तो सुननी पड़ेगी। कश्मीर आज़ाद हो या भारत में रहे, ये तय करने वाला मैं कोई नहीं, लेकिन कश्मीरियों से भारत ने जो “जनमत संग्रह’ का वादा किया था, वो पूरा होना चाहिए। फिर चाहे कश्मीर भारत में रहे या फिर आज़ाद रहे.. ये उनकी मर्जी।

No comments:
Post a Comment