Wednesday, June 29, 2016

छुट्टियों के दौरान गुपचुप तरीके से ईसी बुलाकर 'स्मृति बॉय' ने JNU लाइब्रेरी का नाम बाबा साहेब अंबेडकर के नाम पर रखना तय किया है. संघ/बीजेपी का अंबेडकर और दलित प्रेम नागमणि के रहस्य की तरह नहीं है. दलितों से नफ़रत का इनका लम्बा इतिहास है. अभी दादर के ऐतिहासिक अम्बेडकर भवन के जमींदोज़ किये जाने की ख़बर सबको मिल गयी होगी.

Mithilesh Priyadarshy
छुट्टियों के दौरान गुपचुप तरीके से ईसी बुलाकर 'स्मृति बॉय' ने JNU लाइब्रेरी का नाम बाबा साहेब अंबेडकर के नाम पर रखना तय किया है.
संघ/बीजेपी का अंबेडकर और दलित प्रेम नागमणि के रहस्य की तरह नहीं है. दलितों से नफ़रत का इनका लम्बा इतिहास है. अभी दादर के ऐतिहासिक अम्बेडकर भवन के जमींदोज़ किये जाने की ख़बर सबको मिल गयी होगी.
अंबेडकर को आगे कर जेएनयू की संस्कृति पर हमला करना संघियों का मास्टर स्ट्रोक है. ज़ाहिर है, अंबेडकर का नाम जुड़ने से इस नामकरण के ख़िलाफ़ जाने का साहस कोई छात्र संगठन नहीं कर पाएगा.
और तब ये आसानी से अंबेडकर, सुभाष चन्द्र बोस, पटेल से होते हुए सावरकर, दीनदयाल उपाध्याय, हेडगेवार के नाम पर जेएनयू के सड़कों, भवनों का नाम रख पाएंगे. यह इनका बाबा साहेब के प्रति कोई सम्मान या प्रेम का मामला नहीं है. असल में अपने लिए आगे का रास्ता खोलने की यह एक क़वायद है.
जेएनयू की स्थापना के समय इसी आशंका के मद्देनज़र यहां के होस्टलों का नाम विभिन्न नदियों जैसे, कावेरी, गोदावरी, पेरियार, लोहित, माही, मांडवी आदि के नाम पर रखा गया था कि आने वाली सरकारें अपने मुताबिक़ नामकरण के मामले में जेएनयू के साथ छेड़छाड़ न कर सकें. विश्वविद्यालय के नाम को छोड़कर जोकि जवाहरलाल नेहरू के नाम पर है, यहाँ कुछ भी किसी नेता के नाम पर नहीं है.
ऐसे में संघ/भाजपा के एजेन्टों द्वारा जेएनयू के किसी भवन, सड़क आदि का नामकरण करना जेएनयू संस्कृति पर एक सुनियोजित हमला है. इसे जेएनयू के सभी छात्र संगठनों को समझना होगा.

दुनिया बदलने की जिद न हो तो नहीं बदलेगी दुनिया! जाति उन्मूलन के लिए भी कोई मुहम्मद अली चाहिए जो राष्ट्र, राष्ट्रवाद, धर्म, सत्ता, कैरिय...
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