Wednesday, June 22, 2016

गलियों का मनोविज्ञान पुरुषवादी सोच के साथ यौनकुंठा से जुड़ा लगता है। क्योंकि गालियां पुरुष तो खैर देते ही हैं... कुछ मात्रा में महिलायें भी देती हैं। यह विचित्र है कि गालियां कैसे दे पाते हैं जबकि सबके घरों में महिलाएँ हैं। अगर भारत की बात करूँ तो यहाँ कायदे से कम होनी चाहिए गालियां क्योंकि यहाँ रक्षाबंधन, कन्या पूजन, नवरात्र, बालिका दिवस, मदर्स डे, माता महिमा आदि भरपूर है। यह विरोधाभास अधिक दुःख देता है। सभ्य समाज को चाहिए कि वह शेष समाज को गालियों से मुक्त बनाने में सहयोग करे।

   
Piyush Kumar
June 22 at 11:16pm
 
गलियों का मनोविज्ञान पुरुषवादी सोच के साथ यौनकुंठा से जुड़ा लगता है। क्योंकि गालियां पुरुष तो खैर देते ही हैं... कुछ मात्रा में महिलायें भी देती हैं। यह विचित्र है कि गालियां कैसे दे पाते हैं जबकि सबके घरों में महिलाएँ हैं। अगर भारत की बात करूँ तो यहाँ कायदे से कम होनी चाहिए गालियां क्योंकि यहाँ रक्षाबंधन, कन्या पूजन, नवरात्र, बालिका दिवस, मदर्स डे, माता महिमा आदि भरपूर है। यह विरोधाभास अधिक दुःख देता है। सभ्य समाज को चाहिए कि वह शेष समाज को गालियों से मुक्त बनाने में सहयोग करे।

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