बिहार के जूनियर मोदी जी कहते हैं कि एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पद पर अन्य पिछडा वर्ग को आरक्षण नहीं ही मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि इस पद के आवेदक क्रिमी लेयर में आते हैं, जिन्हें ओबीसी आरक्षण के अंतर्गत नहीं माना जाता।
मोदी जी, आप कंप्लीट घनचक्कर आदमी हैं।
पहली बात तो यही कि एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पद पर सीधीे नियुक्तियां होती हैं। ये सिर्फ प्रमोशन के पद नहीं हैं। इन पदों पर शिक्षण का अनुभव रखने वाले अस्टिटेंट प्रोफसर के पद पर कार्यरत लोग आवेदन करते हैं। इस पद का बेसिक वेतमन 15,600 रूपये है। गणित आता हो तो इसे 12 गुणा कर लीजिए। क्या यह उस 6 लाख की वार्षिकी आमदनी तक पहुंचता है, जो क्रिमी लेयर में जाने की शर्त है। इतना तो आपको पता ही होगा कि सरकारी नौकरों की आय मूल वेतन मानी जाती है, देय भत्ते उसमें नहीं जोडे जाते। अगर भत्ते जोडे जाएं तो एक क्लर्क का बच्चा भी क्रिमी लेयर में आ जाएगा। इतना ही नहीं स्वयं आवेदक की आय पर क्रिमी लेयर नहीं लागू होता बल्कि उसकी पैतृक पारिवारिक आय के आधार पर तय होता है।
मोदी जी, आपके तर्क के अनुसार तो अस्टिटेंट प्रोफेसर के पद पर भी ओबीसी तबकों को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। अनेक लोग स्थायी नियुक्ति से पूर्व एडहॉक पर पढाते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी समेत कई सेंट्रल यूनिवर्सिटियों में इन एडहॉक लोगों को अस्टिटेंट प्रोफेसर का वेतन दिया जाता है, जो लभगग 60 हजार रूपये प्रतिमाह होता है। तो, ये तो क्रिमी लेयर में आ गये! आपके अनुसार इन्हें अस्टिटेंट प्रोफेसर पद पर स्थायी नियुक्ति में भी ओबीसी आरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
आप आदमी हैं या पाजामा?
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