Wednesday, June 8, 2016

Ground Dalit Report-7 गाँव-श्यारोली, (सवाईमाधोपुर) जहाँ आज भी दलितों का मंदिर प्रवेश वर्जित है

Ground Dalit Report-7
गाँव-श्यारोली, (सवाईमाधोपुर)
जहाँ आज भी दलितों का मंदिर प्रवेश वर्जित है


Ground Dalit Report-7
गाँव-श्यारोली, (सवाईमाधोपुर)
जहाँ आज भी दलितों का मंदिर प्रवेश वर्जित है
राजस्थान का जिला सवाईमाधोपुर रणथम्भोर टाइगर उद्यान के लिए विख्यात है लेकिन ये जिला अब दलित अत्याचार के मामलें में कुख्यात हो रहा है |डांग इलाका होने के कारण सरकार ने डांग विकास बोर्ड बनाकर यहाँ विकास के कुछ लक्ष्य भी हासिल कर लिए हों परन्तु दलित अत्याचार के मामलों में कोई कमी नहीं आई है | इनमे से कुछ ही मामले सामने आ पाते है लेकिन अधिकांश मामलों में तो रिपोर्ट ही दर्ज नहीं हो पाती और सेंकडो मामले जाति पंचायत करके दबा दिए जाते है | यहाँ पुलिस प्रशासन से ज्यादा राजनेताओं की चलती है और जिस जाति का नेता यहाँ से सांसद व विधायक होता है वह निर्णय करता है की किसमें चालान करना है और किसमें मामलें में झूठ कायम करना है |
इसी जिले की गंगापुर तहसील के वजीरपुर थानान्तर्गत गाँव श्यारोली में लगभग सभी जातियों के 1000 परिवार है, जिनमे जाट व जाटब (अनुसूचित जाति) बराबर 250-250 परिवार है| अन्य अनुसूचित जातियों में कोली, वाल्मीकि, बलाई, धोबी परिवार शामिल है| इस गाँव में आबादी के हिसाब से दलितों की हिस्सेदारी तो समान है परन्तु गाँव की परम्परा के नाम पर दलितों को मंदिर में जाने की अनुमति तक नहीं हैं |
गाँव में पुरातन समय का बना हुआ एक भैरव मंदिर है जिस पर प्रत्येक शनिवार मेला लगता है और जहाँ हजारों यात्री बाहर से भी आते है| गाँव के उक्त मंदिर में पूजा अर्चना का काम हेमराज भोपा करता है | आप अंदाज़ा लगा सकते है की इस अन्धविश्वास के काल में जहाँ हजारों लोग प्रति शनिवार आते हो वहां कितना चढ़ावा आता होगा | इसलिए गाँव के ही लोगों ने दिनांक 14/2/2013 को देवस्थान विभाग से एक ट्रस्ट रजिस्टर्ड करवा लिया परन्तु राजनीतिक प्रभाव के चलते 9/9/2015 को हेमराज भोपा को ट्रस्ट का अध्यक्ष बना दिया गया जिससे इसके प्रभाव और बढ़ गए|
इस मंदिर पर दलितों को जाने की मनाही है लेकिन गाँव के युवा दलित नेता मांगी लाल जाटब ने अपने कुछ साथियों सहित दिनांक 3/10/2015 को इस गलत परम्परा को तोड़ने का प्रयास किया तो जैसे गैर दलितों की नाक ही कट जायगी, ऐसा मानकर उनसे बलराम, ओमवीर पुत्र विजय सिंह जाट,उदयसिंह जाट , देवीसिंह ,छोट्या गुर्जर , भगवत ब्राह्मण आदि भीड़ गए और वहां उपस्थित दलित समुदाय के मांगीलाल, रेतिलाल, रामस्वरूप, शंकर, समय सिंह, हरिचरण, भगवान् सिह, रामचरण, राजू, शिवचरण व अन्य के साथ गाली गलोच कर धक्का मुक्की की गयी | दलितों ने इसकी सूचना पुलिस को भी दी परन्तु वहां वही हुआ जैसा पुलिस का रवैया रहता है और उनकी रिपोर्ट को ठन्डे बस्ते में डाल दिया आखिर दलितों ने इसे अपने सम्मान के खिलाफ मानकर कोर्ट का रास्ता अखत्यार किया और बमुश्किल दिनांक 6/11/2015 को रिपोर्ट दर्ज हो पायी |
जब प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो गयी तो आरोपियों ने पुनः दलित बस्तियों में आकर उन्हें धमकाया और कहा की आस पास के सभी गाँवो के लोग तुम्हे गाँव में रहने लायक नहीं छोड़ेंगे और गाँव छोडनें की धमकी तक देनें लगे | कुछ लोगों को डराकर घरों से ले गए और खाली कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिए , इसकी सूचना भी दलितों ने पुलिस को दी परन्तु पुलिस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा | दलितों ने अपने इस प्रकरण की शिकायत सभी उच्च अधिकारियों तक को दी परन्तु परिणाम वही ढ़ाक के तीन पात निकला |
पुलिस जैसा दलितों के मामलो में प्रायः करती है वही किया और प्रकरण को दिनांक 4/12/2015 को यह कहकर झूठा साबित कर दिया की एस.सी. वर्ग के लोग मंदिर में निर्माण काम करते है फिर मंदिर में जाने से रोकने की बात गलत है, इसके अलावा गर्भ गृह में जाने से कोनसा लाभ होने वाला है, दर्शन तो बाहर से भी हो जाते है औरगर्भ गृह में केवल पुजारी ही जा सकता है | आस पास के सभी मंदिरों में यही व्यवस्था है| पुलिस ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में यह भी अंकित किया है कि करौली जिले के प्रसिद्ध मंदिरों जैसे मदन मोहन जी मंदिर ,कैला देवी मंदिर ,रणथम्भोर के गणेश मंदिर (पुलिस का यह उदाहरण बिल्कुल गलत है , लेखक स्वयम केवल सत्य जानने के लिए रणथम्भोर के गर्भ गृह में गया है)
यद्यपि इस प्रकरण में जागरूक दलितों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है परन्तु वहां से भी क्या दलितों को न्याय मिल पायेगा, कहा नहीं जा सकता | लेखक ने पीड़ित पक्ष से इस बारे में पूर्ण वाकया जाना तो पता चला की उन्हें मंदिर में दर्शन करने की कोई चाह नहीं है उन्होंने तो केवल सम्मान के लिए ये कदम उठाया है|
देश की शासन व्यवस्था जिस संविधान के द्वारा संचालित है उसी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता का अंत कर दिया गया लिखा है| 1976 में बना नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम भी छुआछूत को समाप्त करने के लिए बनाया गया है| 1989 में अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम भी बना | 31 दिसम्बर 2015 में संशोधित अधिनियम आया जो 26 जनवरी 2016 से लागू हो गया और इसके नियम भी 14 अप्रेल 2016 से मान्य हो गए है, लेकिन सारे कानूनों को पुलिस ताक पर रख कर वही करती है जो उसे करना है या जो राजनेता चाहते है| ऐसा कब तक चलेगा | दलित वर्ग को एक साथ मिलकर इसके लिए आवाज बुलंद करनी होगी और जाति की जंजीरों को तोड़कर एक होना पड़ेगा तभी हमें हमारा हक मिल पायेगा चाहे वह सामाजिक हो,चाहे राजनितिक हो, चाहे आर्थिक हो |
गोपाल राम वर्मा (लेखक सामाजिक न्याय व विकास समिति के सचिव है )
इनसे gopal_dhra@yahoo.co.in , snvsbharatpur@gmail.com ,
मो. 9414427200 पर संपर्क किया जा सकता है

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