चाटुकार शब्द के बहाने....... ......
मैं देश के सभी शिक्षकों से अनुरोध करूंगा कि अपने रिटायरमेंट के बाद चाटुकारों पर जरूर लिखें.... एक और बात, राजेंद्र यादव विश्वविद्यालय को कब्रिस्तान कहने के संदर्भ में अक्सर कहा करते थे कि ---ज्यादा साहित्यकार विश्वविद्यालय से नहीं बल्कि इस चार दीवारी से बाहर के होते हैं। इसकी एक व्याख्या तो यह भी है कि ---विश्वविद्यालयी साहित्यकार जमीनी हकीकत से जुड़ नहीं पाते हैं.... और यह जमीनी अलगाव उनके अंदर उत्तम-कोटि के चाटुकार ही पैदा करते हैं...................... इसलिए हे मित्रों, इन चाटुकारों को सस्ते में मत लेना.... यह ठीक वैसे ही है जैसे 'देव से बड़े डायन'(डायन शब्द को स्त्री-सम्बोधन न समझें)।
मैं जानता हूँ उत्तम क़िस्म के लोग इसे पढ़कर मंद-मंद मुस्कुरा रहे होंगे।
......................... (प्रतिक्रिया अवश्य दें)

Majdoor Jha
ऐसा नहीं है कि सभी बातें हवाई ही होती हैं या सभी बातों का आधार हो यह भी अनिवार्य नहीं. आजकल हर कोई हर किसी को चाटुकार शब्द से ही नवाज़ रहा है. पटना-धांधली-प्रकरण में सबसे अधिक जो शब्द प्रचलन में आया है वह भी चाटुकार ही है. तो ऐसा मान लेना भी मैं गलत ही समझता हूँ कि इस शब्द का कोई आधार नहीं होगा। लेकिन दिलचस्प बात तो यह है कि इसे हर एक दूसरे पर और दूसरा पहले पे चेपे जा रहा है। जो सचमुच चाटुकार ही होते हैं उनकी पहली ही शर्त होती है कि इस शोरबाजी से वो किनारा कर लें ताकि न वो किसी को कहें और न उन्हें कोई कहे। दूसरे किस्म के वे लोग होते हैं जो चाटुकारिता की पंक्ति में खड़े तो रहते हैं लेकिन उनका नंबर नहीं आ पाने के कारण उन्हें मौका नहीं मिलता है. इस दूसरे किस्म के लोग बड़े विद्रोही क़िस्म के होते हैं, जहां आपने उनकी बातों का विरोध किया या कोई प्रश्न किया ये आपके माथे पे इस चाटुकार शब्द को ऐसे चिपका देंगे जैसे दीवार में अमिताभ के ऊपर--'मेरा बाप चोर है'. जैसे नकसलवाद का प्रभावहीन रूप में जिंदा रहना सरकार के हित में होता है उसी तरह दूसरे क़िस्म के लोग तीसरे क़िस्म के लोगों को बात बात पे चाटुकार बोलते रहें यह उत्तम क़िस्म के चाटुकारों के हित में होता है। वे बड़े प्रसन्न होते हैं इन लड़ाइयों से. तीसरे क़िस्म की चर्चा इसलिए नहीं कर रहा हूँ क्योंकि उन बेचारों को इस भीड़ में धोखे से एंट्री मिल जाती है और इस एंट्री का भुगतान वो ज़िंदगी भर करते हैं. इनको नुकसान बाँकी के दोनों क़िस्म के लोगों से रहती है जिसका सम्पूर्ण फाइदा पहले क़िस्म के चाटुकार उठाते हैं. ये पहले क़िस्म के चाटुकार बड़े अव्वल दर्जे के मायावी होते हैं. इनका प्रमुख लक्षण है---कहानियाँ बनाना, मेघावी छात्रों की ओर शिक्षकों के ध्यान को तोड़ना, शिक्षकों को हमेशा सावधान रखना और बताते रहना कि बाँकि के छात्रों से आपको कितना खतरा है? या यह बताना कि आमुख छात्र आपको कितना गाली देता है। समझना मुश्किल हो जाता है कि शिक्षक छात्र को परीक्षित कर रहा है या छात्र शिक्षक को. इससे अंततः वो शिक्षकों का ध्यान सम्पूर्ण रूप में अपने ऊपर प्राप्त कर लेते हैं और इस प्राप्ति में दूसरे क़िस्म के मूर्ख सहयोगियों से वो सहयोग प्राप्त करते जाते हैं। उनके चाटुकार-चाटुकार की शोरबाजी के कारण हीं उत्तम क़िस्म के चाटुकारों को ऐसा करने का समय भी मिलता है और उनका नाम भी छिपा रह जाता है.....मैं देश के सभी शिक्षकों से अनुरोध करूंगा कि अपने रिटायरमेंट के बाद चाटुकारों पर जरूर लिखें.... एक और बात, राजेंद्र यादव विश्वविद्यालय को कब्रिस्तान कहने के संदर्भ में अक्सर कहा करते थे कि ---ज्यादा साहित्यकार विश्वविद्यालय से नहीं बल्कि इस चार दीवारी से बाहर के होते हैं। इसकी एक व्याख्या तो यह भी है कि ---विश्वविद्यालयी साहित्यकार जमीनी हकीकत से जुड़ नहीं पाते हैं.... और यह जमीनी अलगाव उनके अंदर उत्तम-कोटि के चाटुकार ही पैदा करते हैं...................... इसलिए हे मित्रों, इन चाटुकारों को सस्ते में मत लेना.... यह ठीक वैसे ही है जैसे 'देव से बड़े डायन'(डायन शब्द को स्त्री-सम्बोधन न समझें)।
मैं जानता हूँ उत्तम क़िस्म के लोग इसे पढ़कर मंद-मंद मुस्कुरा रहे होंगे।
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