"सविता उवैं, जोंधैया अथवइं चलइ मंद पुरवइया
कोइली कों कों, कुतवा पों पों, चों चों करैं चिरइया
बर्ध दुवउ पागुरि मा लागे, गाय पल्हानि हुंकारइ
टाटिया फारे बछरा झाँकइ, रहि रहि मूड़ निकारइ
टेंटे पर लरिका का दाबे मेहरी द्वारु बहारइ
बड़का भइया गेंदु बनाये सूखे ब्याल उछारइ
कोइली कों कों, कुतवा पों पों, चों चों करैं चिरइया
बर्ध दुवउ पागुरि मा लागे, गाय पल्हानि हुंकारइ
टाटिया फारे बछरा झाँकइ, रहि रहि मूड़ निकारइ
टेंटे पर लरिका का दाबे मेहरी द्वारु बहारइ
बड़का भइया गेंदु बनाये सूखे ब्याल उछारइ
बिटिया थिरकइं पांवन पहिरे सनई की झुनझुनियां
देखि करेजा बित्तन बाढ़इ यह किसान की दुनिया
देखि करेजा बित्तन बाढ़इ यह किसान की दुनिया
('किसान की दुनिया' से -वंशीधर शुक्ल )

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