कल रात सपने में मुझे नाथू राम मिला
Laxman Singh Bisht Batrohi

कल दिन भर मन अशांत था. पूरी रात एक ही सपना खंड-खंड आता रहा.
एकदम बचपन में गाँव में मेरा एक दोस्त था नाथू राम. कक्षा एक से पांच तक हम दोनों ने साथ पढ़ा. नाथू राम के पिता ढोली थे. शिल्पकारों का गाँव हमारे गाँव से हटकर नीचे गधेरे के पास था. सवर्ण वहां नहीं जाते थे, किसी की जरूरत पड़ने पर खेत की धार पर से हांका लगाकर शिल्पकारों को बुलाया जाता था.
मगर नाथू राम मेरा संसार था. हम दोनों हमेशा साथ रहते, उनके गाँव में पानी छूने की भी मनाही थी, लेकिन मैं उसके घर में ही पानी पीता, कभी-कभी खाना भी खाता. मेरी समझ में नहीं आता था कि मुझे उसके घर का पानी पीने से क्यों मना किया जाता है, प्रतिक्रिया में अनेक बार उसके घर वालों की मनाही के बावजूद हम दोनों एक ही थाली में खाना खाते.
कल रात के सपने में उसके साथ बचपन में घटी सारी घटनाएँ एक-एक कर दिमाग में तैरती रहीं. उम्र वही थी, वही कपड़े, वही खेत-पगडंडियाँ. वैसी ही हवा, पेड़ों की वही सरसराहट. ढोल बजाते उसके पिता का वैसा ही गंदलाई आँखों वाला चेहरा. पूरी रात का सपना था इसलिए जिंदगी भर घटी घटनाएँ अलग-अलग बिम्बों के साथ सपने में आती रहीं.
यहाँ पर सिर्फ उस अंतिम दृश्य को बताना चाहता हूँ. हम दोनों बड़े हो गए हैं, शायद अपनी वर्तमान उम्र के बराबर ही. हम दोनों नैनीताल में घूम रहे हैं. मेरे मुँह से उसके लिए वह वर्जित शब्द निकलता है, जो हमारे पुरखे उनके पुरखों के लिए प्रयोग में लाते थे. एकाएक वह मेरा कॉलर पकड़कर मुझे धमकाने लगता है कि मेरी हिम्मत कैसे हुई इस शब्द को बोलने की. वह मुझे मल्लीताल थाने की ओर घसीटते हुए ले जाने लगता है. इसके बाद मेरी नींद खुल गयी.
(इस पूरे घटनाक्रम में मेरी ओर से कुछ भी जोड़ा नहीं गया है.)
एकदम बचपन में गाँव में मेरा एक दोस्त था नाथू राम. कक्षा एक से पांच तक हम दोनों ने साथ पढ़ा. नाथू राम के पिता ढोली थे. शिल्पकारों का गाँव हमारे गाँव से हटकर नीचे गधेरे के पास था. सवर्ण वहां नहीं जाते थे, किसी की जरूरत पड़ने पर खेत की धार पर से हांका लगाकर शिल्पकारों को बुलाया जाता था.
मगर नाथू राम मेरा संसार था. हम दोनों हमेशा साथ रहते, उनके गाँव में पानी छूने की भी मनाही थी, लेकिन मैं उसके घर में ही पानी पीता, कभी-कभी खाना भी खाता. मेरी समझ में नहीं आता था कि मुझे उसके घर का पानी पीने से क्यों मना किया जाता है, प्रतिक्रिया में अनेक बार उसके घर वालों की मनाही के बावजूद हम दोनों एक ही थाली में खाना खाते.
कल रात के सपने में उसके साथ बचपन में घटी सारी घटनाएँ एक-एक कर दिमाग में तैरती रहीं. उम्र वही थी, वही कपड़े, वही खेत-पगडंडियाँ. वैसी ही हवा, पेड़ों की वही सरसराहट. ढोल बजाते उसके पिता का वैसा ही गंदलाई आँखों वाला चेहरा. पूरी रात का सपना था इसलिए जिंदगी भर घटी घटनाएँ अलग-अलग बिम्बों के साथ सपने में आती रहीं.
यहाँ पर सिर्फ उस अंतिम दृश्य को बताना चाहता हूँ. हम दोनों बड़े हो गए हैं, शायद अपनी वर्तमान उम्र के बराबर ही. हम दोनों नैनीताल में घूम रहे हैं. मेरे मुँह से उसके लिए वह वर्जित शब्द निकलता है, जो हमारे पुरखे उनके पुरखों के लिए प्रयोग में लाते थे. एकाएक वह मेरा कॉलर पकड़कर मुझे धमकाने लगता है कि मेरी हिम्मत कैसे हुई इस शब्द को बोलने की. वह मुझे मल्लीताल थाने की ओर घसीटते हुए ले जाने लगता है. इसके बाद मेरी नींद खुल गयी.
(इस पूरे घटनाक्रम में मेरी ओर से कुछ भी जोड़ा नहीं गया है.)

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