Indresh Maikhuri
हरीश रावत ने मंत्रिमंडल की पहली बैठक में अपने चहेते खनन वालों के लिए रियायतों की झड़ी लगा दी.जब हरीश रावत बार-बार,”बहुत काम करना है,बहुत काम करना है” की रट लगाए हुए थे तो ऐसा लग रहा था कि बेचारे को प्रदेश की चिंता खाए जा रही है.पर पहला ही फैसला देख कर समझ में आ गया कि ये तो अपने दुलारे खनन माफियाओं की चिंता में दुबले हुए जा रहे थे.जब वे बार-बार स्वयं को गंगलोड़ा कह रहे थे तब भी उनके दिमाग में स्टोन क्रशर ही चल रहे थे,जहाँ पीस कर गंगलोड़े को महीन पाउडर बना दिया जाता है.रावत साहब ने जैसे आनन-फानन में स्टोन क्रशर वालों के हक़ में फैसला लिया,उससे रावत जी का स्टोन क्रशर वालों के प्रति ममत्व साफ़ झलक रहा था.दो महीने से बेचारे बच्चे बिलख रहे थे,कलप रहे थे कि हमारे माईबाप कब आयेंगे और हमारा संकट कब हरेंगे.माईबाप गद्दी में बैठे और कलपते-बिलखते बच्चों का संकट हर लिया.जाओ खूब नदियाँ उजाडो,स्टोन क्रशर लगाओ,फीस कम,अनुमति का झंझट ख़त्म. डी.एम. ही दे देगा अनुमति, वो भी पांच साल में एक बार.स्टोन क्रशर वालो,खनन वालो,तुम तहसीलदार पर,एस.डी.एम. पर रोज गाडी चढ़ाना,डी.एम. तुमको पाचं साल में अनुमति दे देगा.दूसरा कारनामा तो रावत साहब ने और गजब कर डाला.अपने खिलाफ सी.बी.आई.जांच की सिफारिश अपने ही मंत्रिमंडल से वापस करवा डाली.कहा गया कि राज्य सरकार की एस.आई.टी. यानी विशेष जांच दल स्टिंग की जांच करेगा.मंत्रिमंडल के मुखिया की जांच होनी थी.सिफारिश की राज्यपाल ने यानि मुखिया के ऊपर के प्राधिकारी ने.लेकिन वापस किसने ली?मुखिया के मंत्रिमंडल में उनके अधीनस्थ मंत्री ने.जांच कौन करेगा-एस.आई.टी.- वह भी मुख्यमंत्री के अधीन.मुख्यमंत्री के अधीन काम करने वाली एजेंसी जांच करेगी कि मुख्यमंत्री ने भ्रष्ट आचरण तो नहीं किया !”बॉस इज ऑलवेज राईट” सूत्र वाक्य वाले सरकारी तंत्र में जांच कैसी होगी,समझ ही सकते हैं.जांच करवाते ही क्यूँ हो?इस मामले को भी पिसवा डालो,स्टोन क्रशर में.जिनके लिए इतनी रियायतें की हैं,वे उपकार का इतना बदला तो चुका ही सकते हैं !
बस इतना और समझा दीजिये कि क्या यही वाला है वो लोकतंत्र,जिसको बचाने के लिए आप हलकान हुए जा रहे थे और ऐसा ही वाला लोकतंत्र है,जिसपर भाजपा और कांग्रेस से छिटके हुओं को पूर्ण नियंत्रण चाहिए था?
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