'उत्तर प्रदेश घरेलू कामगार यूनियन' के नेतृत्व में घरेलू कामगारों का अपनी मांगों को लेकर कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन
लखनऊ, 18 मई। लखनऊ के घरेलू कामगारों ने आज अपनी मांगों को लेकर कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया और उनके प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी के माध्यम से प्रदेश के श्रम मंत्री को अपनी मांगों का ज्ञापन सौंपा।
श्रम विभाग में अनिवार्य पंजीकरण, न्यूनतम वेतन, साप्ताहिक छुट्टी एवं अन्य अवकाशों का निर्धारण, स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा, पी.एफ़., पेंशन, ई.एस.आई. एवं उत्पीड़न से बचाव के लिए ठोस प्रावधान घरेलू कामगारों की प्रमुख मांगें थीं। उनका कहना था कि यथाशीघ्र क़ानून बनाकर सरकार को ये मांगें पूरी करनी चाहिए तथा घरेलू कामगारों से जुड़ी योजनाओं के वित्त-पोषण के लिए 'घरेलू कामगार कल्याण कोष' की स्थापना की जानी चाहिए।
प्रदर्शन-स्थल पर सभा को संबोधित करते हुए कहा स्त्री मज़दूर संगठन की कात्यायनी ने कहा कि घरेलू मज़दूर मेहनतकशों के बीच का सबसे अधिक उपेक्षित, उत्पीड़ित, सबसे अधिक असंगठित तथा क़ानूनी तौर पर अरक्षित है। केंद्र और राज्यों की सरकारों ने घरेलू कामगारों के साथ लगातार छल किया है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने 2013 में घरेलू कामगारों से संबंधित कंवेंशन पारित किया, लेकिन भारत सरकार ने अभी तक उसका अनुमोदन नहीं किया है। घरेलू कामगारों के लिए क़ानून के दो विधेयक 2008 और 2010 में सरकार के सामने रखे गए, पर सरकार ने या संसद में बैठी किसी पार्टी ने ऐसा क़ानून बनाने की दिशा में कोई पहल नहीं ली। यही हाल राज्य सरकारों का रहा है। केवल तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश और राजस्थान की सरकारों ने कुछ बेहद कमजोर क़ानूनी प्रावधान करके या नोटिफि़केशन जारी करके घरेलू मज़दूरों को पंजीकरण, न्यूनतम वेतन और अवकाश की सुविधाएं देने जैसी घोषणाएं की हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन पर भी अमल नहीं हो रहा है। उत्तर प्रदेश में कहने को समाजवादी सरकार है, लेकिन यहां के लाखों घरेलू मज़दूरों को कोई भी सुरक्षा प्राप्त नहीं है।
'उत्तर प्रदेश घरेलू कामगार यूनियन' की संयोजक शाकम्भरी ने कहा कि घरेलू कामगारों के लिए क़ानून बनाने के लिए सरकार यदि जल्द से जल्द विशेष कमेटी की घोषणा नहीं करती है और सदन के आगामी सत्रों में इसके लिए विधेयक पेश करने की घोषणा नहीं करती है तो पूरे प्रदेश में घरेलू कामगारों का आंदोलन तेज़ करना होगा। जब तक कानून बने तब तक सरकार अधिसूचना और शासनादेश द्वारा भी पंजीकरण, न्यूनतम मज़दूरी, सुनिश्चित कार्यदिवस, अवकाश आदि के अधिकार घरेलू मज़दूरों को दे सकती है, जैसा कि कुछ राज्य सरकारों ने किया भी है।
यूनियन की संयोजन समिति की सदस्य शिप्रा ने कहा कि राज्य के साथ ही केंद्र की सरकार पर भी दबाव बनाना होगा कि वह केंद्रीय स्तर पर यथाशीघ्र घरेलू मज़दूरों के लिए क़ानून बनाए। उन्होंने कहा कि विलासिता व अमीरों की चीज़ों की ख़रीद पर उपकर (सेस) लगाकर 'घरेलू श्रमिक कल्याण कोष' बनाकर सरकार घरेलू मज़दूरों के पी.एफ., पेंशन, दुर्घटना बीमी, ई.एस.आई., आदि मांगों को आसानी से पूरा कर सकती है। उन्होंने कहा कि क़ानून बनने के साथ ही श्रम विभागों में ऐसी व्यवस्था और ऐसा मेकेनिज्म बनाना होगा कि उक्त क़ानून पर प्रभावी अमल की गारंटी हो सके। हमें घरेलू मज़दूरों के लिए क़ानून ही नहीं, बल्कि उसके प्रभावी अमल के लिए भी लंबी लड़ाई लड़नी होगी।
प्रदर्शन के दौरान सिटी मजिस्ट्रेट ए.सी. मिश्र ने सभास्थल पर आकर घरेलू कामगार महिलाओं तथा उत्तर प्रदेश घरेलू कामगार यूनियन के प्रतिनिधियों से मुलाकात की तथा जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम संबोधित मांगपत्रक स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि इसे तत्काल आवश्यक कार्रवाई के लिए आगे बढ़ाया जायेगा। मांगपत्रक की प्रतिलिपि प्रदेश के श्रम मंत्री, श्रम आयुक्त और राज्यपाल को भी भेजी गयी है।
यूनियन ने यह संकल्प प्रकट किया कि इन मांगों के माने जाने तक उत्तर प्रदेश के घरेलू कामगार चुप नहीं बैठेंगे। इन मांगों को लेकर पूरे प्रदेश में घरेलू कामगारों के बीच व्यापक अभियान चलाया जायेगा और अधिक बड़े पैमाने पर आंदोलन खड़ा किया जाएगा। लखनऊ के घरेलू कामगारों पर विशेष ज़िम्मेदारी है क्योंकि सूबे की सरकार यहीं बैठती है। आज हमने सरकार के कानों तक अपनी आवाज़ पहुँचाई है लेकिन इनको कुम्भकर्णी नींद से जगाकर कार्रवाई करने के लिए मजबूर करने तक हमें बार-बार दस्तक देते रहना होगा।
प्रदर्शन में लखनऊ के निशातगंज, बाबा का पुरवा, भीखमपुरवा, नया पुरवा, चिनहट, बाबूगंज, जुगौली आदि अनेक इलाकों की घरेलू कामगारों ने भाग लिया।








लखनऊ, 18 मई। लखनऊ के घरेलू कामगारों ने आज अपनी मांगों को लेकर कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया और उनके प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी के माध्यम से प्रदेश के श्रम मंत्री को अपनी मांगों का ज्ञापन सौंपा।
श्रम विभाग में अनिवार्य पंजीकरण, न्यूनतम वेतन, साप्ताहिक छुट्टी एवं अन्य अवकाशों का निर्धारण, स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा, पी.एफ़., पेंशन, ई.एस.आई. एवं उत्पीड़न से बचाव के लिए ठोस प्रावधान घरेलू कामगारों की प्रमुख मांगें थीं। उनका कहना था कि यथाशीघ्र क़ानून बनाकर सरकार को ये मांगें पूरी करनी चाहिए तथा घरेलू कामगारों से जुड़ी योजनाओं के वित्त-पोषण के लिए 'घरेलू कामगार कल्याण कोष' की स्थापना की जानी चाहिए।
प्रदर्शन-स्थल पर सभा को संबोधित करते हुए कहा स्त्री मज़दूर संगठन की कात्यायनी ने कहा कि घरेलू मज़दूर मेहनतकशों के बीच का सबसे अधिक उपेक्षित, उत्पीड़ित, सबसे अधिक असंगठित तथा क़ानूनी तौर पर अरक्षित है। केंद्र और राज्यों की सरकारों ने घरेलू कामगारों के साथ लगातार छल किया है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने 2013 में घरेलू कामगारों से संबंधित कंवेंशन पारित किया, लेकिन भारत सरकार ने अभी तक उसका अनुमोदन नहीं किया है। घरेलू कामगारों के लिए क़ानून के दो विधेयक 2008 और 2010 में सरकार के सामने रखे गए, पर सरकार ने या संसद में बैठी किसी पार्टी ने ऐसा क़ानून बनाने की दिशा में कोई पहल नहीं ली। यही हाल राज्य सरकारों का रहा है। केवल तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश और राजस्थान की सरकारों ने कुछ बेहद कमजोर क़ानूनी प्रावधान करके या नोटिफि़केशन जारी करके घरेलू मज़दूरों को पंजीकरण, न्यूनतम वेतन और अवकाश की सुविधाएं देने जैसी घोषणाएं की हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन पर भी अमल नहीं हो रहा है। उत्तर प्रदेश में कहने को समाजवादी सरकार है, लेकिन यहां के लाखों घरेलू मज़दूरों को कोई भी सुरक्षा प्राप्त नहीं है।
'उत्तर प्रदेश घरेलू कामगार यूनियन' की संयोजक शाकम्भरी ने कहा कि घरेलू कामगारों के लिए क़ानून बनाने के लिए सरकार यदि जल्द से जल्द विशेष कमेटी की घोषणा नहीं करती है और सदन के आगामी सत्रों में इसके लिए विधेयक पेश करने की घोषणा नहीं करती है तो पूरे प्रदेश में घरेलू कामगारों का आंदोलन तेज़ करना होगा। जब तक कानून बने तब तक सरकार अधिसूचना और शासनादेश द्वारा भी पंजीकरण, न्यूनतम मज़दूरी, सुनिश्चित कार्यदिवस, अवकाश आदि के अधिकार घरेलू मज़दूरों को दे सकती है, जैसा कि कुछ राज्य सरकारों ने किया भी है।
यूनियन की संयोजन समिति की सदस्य शिप्रा ने कहा कि राज्य के साथ ही केंद्र की सरकार पर भी दबाव बनाना होगा कि वह केंद्रीय स्तर पर यथाशीघ्र घरेलू मज़दूरों के लिए क़ानून बनाए। उन्होंने कहा कि विलासिता व अमीरों की चीज़ों की ख़रीद पर उपकर (सेस) लगाकर 'घरेलू श्रमिक कल्याण कोष' बनाकर सरकार घरेलू मज़दूरों के पी.एफ., पेंशन, दुर्घटना बीमी, ई.एस.आई., आदि मांगों को आसानी से पूरा कर सकती है। उन्होंने कहा कि क़ानून बनने के साथ ही श्रम विभागों में ऐसी व्यवस्था और ऐसा मेकेनिज्म बनाना होगा कि उक्त क़ानून पर प्रभावी अमल की गारंटी हो सके। हमें घरेलू मज़दूरों के लिए क़ानून ही नहीं, बल्कि उसके प्रभावी अमल के लिए भी लंबी लड़ाई लड़नी होगी।
प्रदर्शन के दौरान सिटी मजिस्ट्रेट ए.सी. मिश्र ने सभास्थल पर आकर घरेलू कामगार महिलाओं तथा उत्तर प्रदेश घरेलू कामगार यूनियन के प्रतिनिधियों से मुलाकात की तथा जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम संबोधित मांगपत्रक स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि इसे तत्काल आवश्यक कार्रवाई के लिए आगे बढ़ाया जायेगा। मांगपत्रक की प्रतिलिपि प्रदेश के श्रम मंत्री, श्रम आयुक्त और राज्यपाल को भी भेजी गयी है।
यूनियन ने यह संकल्प प्रकट किया कि इन मांगों के माने जाने तक उत्तर प्रदेश के घरेलू कामगार चुप नहीं बैठेंगे। इन मांगों को लेकर पूरे प्रदेश में घरेलू कामगारों के बीच व्यापक अभियान चलाया जायेगा और अधिक बड़े पैमाने पर आंदोलन खड़ा किया जाएगा। लखनऊ के घरेलू कामगारों पर विशेष ज़िम्मेदारी है क्योंकि सूबे की सरकार यहीं बैठती है। आज हमने सरकार के कानों तक अपनी आवाज़ पहुँचाई है लेकिन इनको कुम्भकर्णी नींद से जगाकर कार्रवाई करने के लिए मजबूर करने तक हमें बार-बार दस्तक देते रहना होगा।
प्रदर्शन में लखनऊ के निशातगंज, बाबा का पुरवा, भीखमपुरवा, नया पुरवा, चिनहट, बाबूगंज, जुगौली आदि अनेक इलाकों की घरेलू कामगारों ने भाग लिया।








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